तुम तक लौटना है
और राह बनती नहीं
कई बार यूँ हुआ है कि
रखता गया हूँ
लब्जों को एक के ऊपर एक
और लगा है राह तुम तक पहुँचने की
मिल गयी अब
पर फिर जाने क्या होता है
एक एक कर सारे लब्ज मुंह मोड़ लेते है
और तय किये सारे रास्ते
फिर सामने आ खड़े होते हैं
अब जबकि भर चुका है
मेरी हवा में इतना शीशा
और मेरे पानी में इतना पारा
मुझे लौटना हीं होगा तेरे गर्भ में ओ मेरी नज़्म
और फिर जन्मना होगा अपने मूल ताम्बई रंग में
पाक होकर
मुझे तुम तक लौटना हीं लौटना है
पर जो मैं न लौट सकूं तुम तक
तो तुम आगे बढ़ आना ओ मेरी नज़्म
मुझमें अब बहुत शीशा और पारा है...
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नहीं मालूम, कौन मिल गया है... इस देह के किन्हीं तहों में बसता है... न कहीं ठहरने देता है और न भटकने.... इतना मालूम है कि कुछ ढूंढता है.....पर क्या, ये नहीं मालूम! यही करता रहा है...
Wednesday, January 26, 2011
मुझमें अब बहुत शीशा और पारा है...
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Wednesday, January 5, 2011
अपना थका शरीर तुम्हें सौपने के लिए कितनी वजह काफी है
जानता हूँ
पाँव उठा कर मेज पर रख लेने से,
तान कर घुटने बजा लेने से,
कंधे झटक लेने और पीठ सिकोड़ लेने से
या उँगलियाँ मोड़ कर फोड़ लेने से
इस आनुवंशिक थकान को मिटाया नहीं जा सकेगा
पर क्या इतनी वजह काफी है
हार मान लेने के लिए
और सौंप देने के लिए तुम्हें
अपना थका हुआ शरीर ?
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पाँव उठा कर मेज पर रख लेने से,
तान कर घुटने बजा लेने से,
कंधे झटक लेने और पीठ सिकोड़ लेने से
या उँगलियाँ मोड़ कर फोड़ लेने से
इस आनुवंशिक थकान को मिटाया नहीं जा सकेगा
पर क्या इतनी वजह काफी है
हार मान लेने के लिए
और सौंप देने के लिए तुम्हें
अपना थका हुआ शरीर ?
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