Sunday, March 6, 2022

उम्मीद का विकल्प कुछ नहीं है



उम्मीद से शुरू करते हैं युद्ध की कविता

कविता चाहे कोई भी हो
उम्मीद का होना जरूरी मानते आए हैं कवि
और  युद्ध के परिणाम में क्योंकि मुझे कोई उम्मीद नजर नहीं आती 
मैं सोचता हूं उम्मीद को कविता के शुरुआत में रख देना ठीक रहेगा 
और अगर बाद में आ जाए तो बाद में फिर देख लेंगे 
क्योंकि युद्ध के बाद का क्या पता

तो पहली उम्मीद तो यह 
कि खत्म हो यह युद्ध शीघ्र ही 
और दूसरी कि आगे से तकनीकों का ठीक से इस्तेमाल हो युद्ध में 
क्योंकि यह उम्मीद करना कि आगे से युद्ध ना हो
नासमझी की उम्मीद लगेगी
तो रोबोट से लड़े जाएं युद्ध, रोबोट मारे जाएं 
और ठिकाने बर्बाद किए जाने किए जाने हो अगर
तो रोबोट के ठिकाने तबाह किए जाएं
राष्ट्राध्यक्ष मान ले अपनी हार या जीत रोबोटिक हार या जीत के आधार पर 
अपने नाक के लिए या नाकामियों को छिपाने के लिए तथाकथित अपनों को तबाह ना करें राष्ट्राध्यक्ष

मिलती-जुलती एक उम्मीद और कि
आम अवाम को दूर रखा जाए युद्ध से
उन्हें बंकरो में ना जाना पड़े, 
मजबूरी में चलकर देश की सरहद न लांघने पड़े
बच्चे स्कूल जाते रहे तथा कारखानों और अस्पतालों में काम होता रहे

सबसे अच्छा तो शायद यह होगा कि
किसी वीडियो गेम की तरह खेल लिए जाएं युद्ध
सारी दुनिया के संगठन उस युद्ध को माने सचमुच का युद्ध
मीडिया उसे उसी तरह का दिखाएं
लोग उसी तरह डरें और चर्चा करें आशंकाओं के बारे में
फिर सारी दुनिया लोहा मान ले जीतने वाले का 
और हुकूमत सौंप दे उसके हाथों में 

और फिर जब किसी राष्ट्राध्यक्ष को लगे 
कि वह ज्यादा ताकतवर हो गया है 
कि उसके पास एक अच्छी सेना है जो अच्छा खेल सकती है युद्ध को
तो ललकार ले जिसको चाहे उसे

कूल मिलाकर मेरा इतना कहना है
राष्ट्राध्यक्ष खोजें युद्ध का कोई एक नया तकनीकी विकल्प 
जैसे उपनिवेशवाद के बाद खोजा गया नव-उपनिवेशवाद!

युद्ध का विकल्प हो सकता है 
उम्मीद का भी हो सकता है क्या?

Saturday, December 4, 2021

आवाज के सुनाई देने तक

आवाज अगर कहीं है 
तो वह निकल आएगी 
कहीं से भी, कभी ना कभी
और किसी न किसी को जरूर सुनाई दे जाएगी

सुनाई दिए जाने तक 
ठहर कर इंतजार करती है वह
अनसुना करो तो तेज होने लग जाती है
या फिर कोई और कान तलाशने निकल जाती है
अपने होने और निकलने की जगह बदल सकती है आवाज 
वह दबकर ज्यादा देर नहीं रहती

बहुत समय से दबाई गई आवाज का भी 
समय के किसी न किसी बिंदु पर निकल जाना  तय है
हां पर निकलने का रास्ता और तरीका वो खुद तय करेगी

कभी इस तरह निकलती है वह 
कि लगता है निकलने की ही आवाज है
और कभी इस तरह कि निकलने का पता ही नहीं चलता
हर तरफ सिर्फ आवाज ही आवाज

आवाज को साथ बैठने के लिए
कोई दूसरी आवाज जरूर चाहिए होती होगी
पर क्या शोर वाली जगहों पर कई आवाजें एक साथ बैठी होती है और कर रही होती है बतकही 
या फिर क्या रो रही होती हैं एक साथ बैठकर कई आवाजें 
या फिर यूं भी कि तोड़े जाने के खिलाफ वह हो रही होती हो लामबंद

नहीं मालूम कि 
आवाज को तोड़ते जाने से आखिर में क्या मिलेगा
और जो मिलेगा उस आवाज के कण को क्या कहेंगे
क्या वह एटम जैसी कोई चीज होगी 
जिससे कोई आणविक विस्फोट भी हो सकता है 

तो फिर क्या कोई विस्फोट होने वाला है
क्योंकि आवाज को तोड़े जाने का सिलसिला जारी है

क्या तुम सुन पा रहे हो 
तुम्हारी आवाज को कोई आवाज दे रहा है

Tuesday, November 9, 2021

तुम्हारी यादों के ठीक सामने

दिवाली है,
बोनस में थोड़ा वक्त मिला है 
यादों की सफाई कर रहा हूं

कुछ समय के लिए छोड़ दो तो
कई तरह के झाड़ झंखाड़ उग आते हैं 
और खड़े हो जाते हैं 
उन यादों के सामने
जिन्हें मन अपने ड्राइंग रूम में 
ठीक सामने रखना चाहता हैं 
कि आते जाते जब जरा सी भी फुर्सत हो 
तो उसके ठीक पास बैठने का सुकून हासिल हो

कुछ तो 
मकड़ी के जालों जैसे हैं
बड़ी आसानी से साफ हो जा रहे हैं 
और यादों की तस्वीर खुलकर साफ सामने आ जाती है
और कुछ जिद्दी, पुरानी जमी काई की तरह
छुड़ाए नहीं छूट रहे
ज्यादा खुरच दो 
तो तस्वीर का कोई हिस्सा ही 
साथ में बाहर लेकर आ जाए इस तरह
जैसे यादों के देह पर कोई घाव

सफाई के दौरान मिली हैं कई ऐसी भी यादें 
जो टूटे-फूटे रद्दी के सामानों के अंबार के पीछे दबकर लगभग खो सी गई थी 
पर जब मिल गई तो लगा वे वही थी, कहीं खोई नहीं थी

करीने से लगा दी है
एक-एक कर झाड़ पोछ कर 
कई यादों को सहेज कर रख दिया है
ड्राइंग रूम में ठीक सामने तुम्हारी यादों को रखा है
वहां साफ सफाई होती रहेगी

© ओम आर्य

Saturday, May 29, 2021

हाथी का समाचार!

एक हाथी है जो घोड़े बेच कर सो रहा है 
जबकि जंगल में हाहाकार मचा है 
कोई उसे जगाने जाए 
तो वह पागल होने लगता है

एक समाचार है 
जो लगातार तोड़ने के प्रयास में है
वह न तोड़ पाने के दबाव में टूटता जा रहा है

एक समाचार वाचक है जो जानबूझकर भूल गया है 
समाचार और विचार में फर्क
उसका सारा जोर इस बात पर है 
कि किस तरह समाचार में विचार जोड़ा जाए, आवाज का हथोड़ा जोड़ा जाए
कि वह ब्रेकिंग हो जाए

आप कह सकते हैं 
कि हाथी के घोड़े बेच कर सोने वाली बात में समाचार और समाचार वाचक क्या कर रहा है
तो मैं कहूंगा हाथी की नींद
इसलिए नहीं टूट रही क्योंकि समाचार टूट गया है!

Sunday, May 16, 2021

तुम बताओ अपना हम अपना क्या बताएं!

तुम बताओ अपना हम अपना क्या बताएं!
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जब तुम पूछते हो हमारा हाल और हम कहते हैं कि हम ठीक हैं 
तो हमें सही सही पता नहीं होता कि हम कितने ठीक हैं 
और ना ही तुम्हें पता चल पाता होगा कि हम कितने ठीक हैं जब हम बताते हैं

कोई पूछता है तो बिल्कुल सही सही नहीं 
पर एक हद तक हम आकलन कर लेते हैं कि सामने वाले को 
अपने ठीक होने के बारे में कितने संक्षिप्त या विस्तार से बताना है 
और वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हाल किस तरह पूछा छा गया है 
या पूछने वाला कौन है

यह अजीब समय है 
कि इस समय में खैरियत पूछना और जानना कितना जरूरी हो गया है हर किसी के बारे में 
पर उतना ही मुश्किल हो गया है जानकर कुछ कर पाना

संवेदनाएं कोई वस्तु नहीं है 
कि उन्हें ऑनलाइन भेजा या मंगाया जा सके, 
उन्हें बिना गले लगे या लगाए, 
अप्रत्यक्ष रूप से, पहुंचाने या प्राप्त करने का कोई तरीका अभी सामने नहीं आया है
पर हम किसी तरह इमोटिकॉन्स के सहारे चला रहे हैं अपना काम
पर सदमे के लिए नहीं बना है अभी तक कोई इमोटिकॉन भी 
जब सब कुछ जज्बात में धंसा हुआ सा होता है

एक तरफ हम पर 
सकारात्मक बने रहकर अपने दुखों को इग्नोर करते रहने का बोझ है
और दूसरी तरफ 
हम इतने दुखों में शामिल हैं कि शामिल होने के लिए दुख कम पड़ रहे हैं!

© ओम आर्य