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Saturday, June 12, 2010

बंजर होने के ठीक पहले

चूहे दौड़ते थे
उनके पीछे कुछ और चूहे दौड़ते थे
और उनके पीछे कुछ और

उनकी दौड़ पेट तक हीं सीमित नहीं थी

वे दिमाग की नसों तक पहुँच चुके थे
और पूरे वक़्त
दौड़-दौड़ कर उँगलियों से
वासनाएं खुजाने में लगे रहते थे

वे अलग-अलग कई बिल बनाते थे
और नए इजाद किये तरीकों से खाते थे
और खाने के लिए
किसी भी हद तक जाते थे

ये बात सिर्फ चूहों तक सीमित होती तो
कुछ किया जा सकता था
पर चूहों के ऊपर प्रचलित
सारी कहावतें
अब आदमी के ऊपर
आराम से इस्तेमाल होती थीं


किसी पुरानी किताब के अनुसार

अच्छा वक़्त
गैर नवीकरणीय ऊर्जा की भांति था
इस युग को होश आने से पहले हीं

जिसका क्षय हो जाना तय था

बची हुई पीढ़ी की मस्तिष्कों में
भूख स्थायी रूप से काबिज हो चुका था

कुछ समाजशास्त्री
सारी वैज्ञानिक खोजों को
भुला दिए जाने के तरीके ढूंढ रहे थे

आत्माएं
बंजर होती जा रही थीं
और उनपे फिर से शरीर लगना
नामुमकिन सा था

संघर्षरत प्रकृति ने अपना आखरी आस भी
छोड़ दिया था

कवि अपनी देह में हाथ लगा चुका था
क्योंकि उसके पास
अब बेचने को कुछ नहीं बचा था

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Friday, October 23, 2009

फूली नही समा रही है पृथ्वी !

आदमी मुस्कुराता है

नही हमेशा,
कभी-कभी हीं सही
पर अभी भी
जारी है आदमी का मुस्कुराना

आदमी हमेशा हँसता-मुस्कुराता रहे
मुस्कुराने के मौके तलाशे और तराशे
ऐसी मेरी चाहत है और प्रार्थना भी

मुझे फक्र है
हर मुस्कुराते हुए आदमी पर
जो इस सनातन दुःख के बीच
मुस्कराहट इन्सर्ट करने की हिम्मत रखता है

मेरी कल्पना में
अक्सर जीवित हो उठता है वो दृश्य
जिसमें छह अरब लोग
एक साथ मुस्कुरा रहे हैं

उस दृश्य में
धरती का आयतन
वर्तमान से कई गुणा ज्यादा है
दरअसल, फूली नही समा रही है पृथ्वी
उस दृश्य में

उस दृश्य में मुस्कुराते हुए
देख रही है वो मुझे
और मैं उसे.