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Wednesday, May 27, 2009

तुझे देखा है कई बार ख्वाब में

तुझे देखा है कई बार ख्वाब में
सोचता हूँ कोई शेर लिखू तेरे किताब में

बडी देर तक आंखे रही बेचैन
जो छिपा लिया तुने चेहरा हिजाब में

जाने कब तक लहरे रक्श करती रही
जाने किसने मिला दी समंदर शराब में

तुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार को
तुम्हे क्या पता कौन बह गया उस शैलाब में

हम पीते है, हमे मालूम है
कितना तो नशा है उनकी नजर में और कितना शराब में

करे जो कोई सवाल आडे- तिरछे तुमसे तो
कह देना उनसे कि तुम रहते हो खुदा के रुआब में