अंतर्नाद
कविता...तेरे शहर में फिर आसरा ढूंढने निकला हूँ!
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Monday, October 5, 2009
निष्ठुर
भूख थे वहाँ कतार में खड़े
और
पेट उनके, आग में पक रहे थे
चेहरे पहले लार लार हुए
फिर सूख कर लटक गये
इंतेज़ार में,
जीभ पपड़ीदार हुए फिर
आस में भोजन के
मगर शर्म नही आयी उसे.
वो भीतर
आसन पे विराजमान
अपने
दप-दप करते चेहरे के साथ
मजे से
चढ़ावे खाता रहा.
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