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Monday, March 1, 2010

उस नीम के पेंड के पत्ते !

मैं अटक जाता हूँ
उस नीम के पेंड पे,
जब भी कोई रंग हो,रौशनी हो
या फिर बसंत हो, बहार हो

आज भी होली पे
शाम तक डोलते रहेंगे मेरी शाख पे
उदासी के सफ़ेद रंग में
सूखे हुए
उस नीम के पेंड के पत्ते

मैं अटक जाता हूँ
उस नीम के पेंड पे
जो कभी गुलमोहर था