रात जब दो बजा देती है
और लाख कोशिशों के बावजूद
हर्फ़ उतार नहीं पाते उसकी आगोश कों
कागज़ पे
मैं कंही भी, जो भी मिल जाए,
उसमें समां जाने के लिए
निकल पड़ता हूँ सुनसान सड़क पर।
मैं लिपट जाता हूँ नीम से
और लिपटा रहता हूं
सोंचते हुए देर तक
नीम की लम्बी उम्र और
और बिना आगोश के जीने की उसकी विवशता के बारे में।
मैं फटकारता हूँ
ख़ुद को उसकी विवशता पर
और छोड़ देता हूँ अपनी शक्ल को
रोता हुआ हो जाने के लिए
यह जानते हुए
कि इस अँधेरी रात में किसी के बिना देखे
धीमे-धीमे रोना सम्भव है,
पर रोना धीरे-धीरे तेज हो जाता है
और मुझे पकडनी पड़ती है अपनी शक्ल
रोते-रोते यह भी सोंचता हूँ
कि मैं निश्चित रूप से अब प्यार नही करता उससे
और इसलिए हीं नही उतार पाता
उसकी आगोश को कागज़ पर
और फ़िर और जोर से रोने लगता हूँ प्यार के ख़त्म हो जाने पर,
पर यह शायद प्यार हीं होगा,
जो ख़त्म होने पे मुझे रुलाता है
इन सबके बावजूद
मैं हमेशा ये सोंचता हूँ
कि दो बजने और
कागज़ पे आगोश न बना पाने की
उसकी भी अपनी रुलाई होगी
जिसे रोने के लिए वह अपने मुंह में कपडे कोंच लेती होगी
क्यूंकि रात कों दो बजे उसके लिए घर के बाहर जाना संभव नहीं होता होगा
और उसे तो नीम भी नही मिलता होगा !