पोंछ-पोंछ कर
जमा रहा है एक-एक स्वर
कोई, इन
बेतरतीब पड़े
धूल से पटे दराजों में
रैक और किचेन की पट्टियों पे
सन्नाटे ने अकेला महसूस करते हुए
शायद तहखाने में
पकड़ लिया है एक कोना
स्वर लहरियां दौड़ रही हैं पूरे घर में
आँगन में अरसे से सूखा पड़ा संगीत
भींग रहा है
यूँ लग रहा है जैसे
मौन का खाली घर बस रहा है