Sunday, March 8, 2009

बाहें खोलो परमात्मा !

मैं चाहता हूँ
कि मेरा बहाव हो
तुम्हारे सागर की तरफ़
उमड़ता-उफनता
बदहवास भागता
तीव्र आवेग और प्यास से भरा
दौड़ा चला जाता हो मेरा पानी
तुम्हारे अथाह्पन में समां जाने के लिए

ऐसा हो कि
तुम्हारी गहराई में गहरे उतर कर
तेरी लय ताल में बहते हुए
मेर सारे किनारे टूट जाएँ
और मुश्किल हो जाए
मेरे लिए अपना स्वयं बचाना

मैं चाहता हूँ
मैं तुझमें अवस्थित हो जाऊं
और मेरा चाहना तुम्हारा चाहना हो जाए

तुम अपनी देह में मुझे
जगह तो दोगे न परमात्मा
मैं आता हूँ
अपनी बाहें खोले रखना !

Saturday, March 7, 2009

जीवन परमात्मा है

जिंदगी
जो भी उगा दे
तुम्हारी मिटटी में
अपना लो उसे

जिन्दगी
जो भी पका दे
तुम्हारे पतीले में
खा लो उसे

जिंदगी
जो भी सुना दे
तुम्हारे कानो में
सुर दो उसे

जिंदगी
जो भी दिखा दे
मान लो सच उसे

परमात्मा के बनाये जीवन में
परमात्मा हीं दीखता है,
परमात्मा हीं बजता है,
परमात्मा ही खिलता है,
परमात्मा हीं मिलता है .

Wednesday, March 4, 2009

उम्मीद

दरार पड़ते समय दर्द होता है
और
दर्द होने से दरारें पड़ती हैं

दर्द और दरार दोनों हीं क्रमवार हैं
एक के पीठ पे एक

दरारें पड़ रही हैं
दर्द हुआ जा रहा है

दर्द हुआ जा रहा है
दरार पड़ती जा रही है

कुछ समय बाद दर्द नही होगा
दर्द होने के लिए पानी जरूरी है बदन में

फ़िर शायद दरार भी नही होगा
क्रम टूटेगा

पर चाहता हूँ क्रम टूटे नही
पानी बचा रहे
क्यूंकि जब तक
एक भी बूँद पानी है
चमन के लौटने की उम्मीद है

Tuesday, March 3, 2009

सतह पर सवाल

किससे मिलूं
और किससे छिप कर निकल जाऊं
कि मिलने पर
कौन मुस्कुराएगा एक सच्ची मुस्कान

किससे खुलूं
और किससे नही
कि खुलने पर
कौन नही उठाएगा
फायदा मेरे कमजोरियों का

किसे दूँ उंगली
और किसे हाथ
कि हाथ बढ़ाने पर
कौन नही चाहेगा मेरे पहुँचा पकड़ना

क्या करूँ मैं

क्या वास्ता रखने के लिए
रखूं सिर्फ़ वास्ता
और शामिल हो जाऊं
उन्ही लोगों के भीड़ में
जो संशय और सवाल दोनों
एक साथ पैदा करते हैं

या फ़िर
इसी तरह जीता रहूँ
संशय और सवाल के बीच
ख़ुद को धकेलते हुए

Monday, March 2, 2009

बनने और टूटने के फलस्वरूप

जितनी बनाई मैंने
वे सब टूटी
कुछ वजह से,कुछ बेवजह भी

फ़िर उन्हें जोड़ा भी
जो टूट गयीं थीं
कुछ जुड़ीं भी, कुछ नही भी

जो जुड़ीं
वे फ़िर से भी टूटीं

उनके अलावा वो भी टूटीं
जो मैंने नही बनाई
पर जो अपने आप बनी हुई थीं पहले से हीं

आज की तारीख में
कुल जमा एक भी नही है
जो टूटी नही हो
एक बार भी

और
मैं अपने बदन पे
न जाने कितनी गांठें लिए
जी रहा हूँ.