Tuesday, April 2, 2019

अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं !

मैंने छुए अल्फाज उसके
और उसने मेरी ख़ामोशी पे अपने हाथ रखे,
कभी पहले हुई कविता फिर कविता हुई


फिर वो मॉनसून हुई
और मैं बारिश,
सूखे गिले सारे गीले हुए


हंसी वाले उसके दो होंठ फिर खुल कर
चूमने लगे बादल
मुझे ठीक से पता नहीं कब बरसने लगी बूंदे,
धरती पर
टप-टप
हर तरफ हँसने की गीली तस्वीरें


जैसे हीं कविता फिर
विस्तार लेकर निराकार हुई
मैं उसमें गुम होकर आकार हुआ


जाने ये सब कितनी जल्दी हुआ
कि जरा सी देर में सब भर गया,
आँख भी, ख्वाब भी
और आँखों में अरसे से बने ख्वाब के घाव भी


अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं
उन्हें अभी और भरना है









Friday, March 22, 2019

उसके लिए जो खोलता है मुझे

वो लौट आया है!

वो लौट आया है
वे दिन, लौट आये हैं उसके साथ

मगर, ये लगभग तय सा है कि
वे दिन जो लौट आए हैं उसके साथ,
फिर लौट जाऐंगे उसके साथ हीं

सांसें कितनी उठ रही हैं उंची
ख्यालों में, तमाम तरह के जुर्म हो रहे हैं इकठ्ठा
रातों के होने के ढंग में भी सपनों से खलल है
और मेरी बाहें फैली हुईं हैं
उन थोड़े से उन दिनों को बांधने के लिए
जो मुठ्ठी भर हैं

वो जो रोकता है और वो जो खोलता है
उसके दरम्यान उठती
आंधियों को रोकते-रोकते बारिश को आंखों तक आते अभी-अभी देखा मैंने

ये जानने के बावजूद कि
वे दिन जो लौट आये हैं उसके साथ
वे दिन फिर लौट जाऐंगे उसके साथ हीं
हम कुछ अफसोस फिर से रख लेंगे संजो कर
अगली बार की वसंत के लिए!!


Saturday, February 24, 2018

विरोध के लिए प्रेम!

मैं तुम्हारे इश्क में डूब जाना चाहता हूँ
इतने गहरे डूबना कि
वो प्रदर्शित हो सके

तुम्हारे या फिर किसी और के इश्क में भी
डूबना स्वीकार्य है मुझे

यह तब है
जब मुझे बताया जा रहा है
कि प्रेम करने के खतरे असहनीय रुप से बढ गये हैं
और विरोध करने के भी

क्यूंकि मेरा डर मेरे विरोथ को दबा देता है
मैं किसी के भी प्रेम में डूब कर
प्रेम और विरोध के खतरों के विरोध में होना  चाहता हूँ

पर तुम्हारे प्यार में डूबना ज्यादा अच्छा रहेगा न
पुरजोर विरोध के लिए!

Saturday, January 6, 2018

पानी चला गया है मुझसे कई गुना दूर

पानी चला गया है मुझसे दूर
मुझसे कई गुना दूर

वो कस कर भींच लेता था जब कभी
तो नसें सींच जाती थीं  
और मुझे भरते हुए उसका उतरते जाना
एक झरने की तरह था 
जिसके बाद कल-कल निर्मल हर तरफ

सोंचती हूँ
वो अब कहां बहता होगा
मेरी सूखी आँखों में उसके तलाश की एक तस्वीर है
जिसे उलट-पलट कर
किसी भी तरफ से देखने पर
वह बहता हुआ दिखाई नहीं देता   

वह बहता हुआ दिखाई नहीं देता   
कि अब बहने को
एक नितांत अकेलापन है जिसमें
कुछ बेमानी आवाजें टकराती हुई शोर करती हैं
जो बिलकुल हीं बे-पानी है

मैं चाहती हूँ
कि बहुत पीछे छूट गयी इस नदी को
वो वह पहला प्रेम-पत्र फिर भेजे
जिसे लिखते हुए वह पिघल कर पानी हुआ था
और अपनी छींटों से मुस्का दे मुझे 

वो आये
भींचे और फुटाये मुझमें फव्वारे
बहाए मुझे कल-कल 
कि यात्रा पूर्ण हो समंदर तक की 


Saturday, December 30, 2017

कुछ है जो ख़त्म होने को है


वो जो नहीं है अब
और जिसने मंझधार वक्त के किसी छोर पर जाकर
किनारा कर लिया
उसकी गिनती एक में ख़त्म नहीं होती

मुझे नहीं मालूम कितनी आहें भरीं उसने किनारे पे बैठ कर
या नहीं भरीं एक भी
पर मैं तब भी
किनारे की तरफ तेज दौड़ कर जाती लहरों में
उसे छू कर थपथपाना चाहता था
और कहना चाहता था कि रुक जाओ
यह जानते हुए भी कि वक्त की अपनी रवायतें हैं
और यह भी कि वो रुकेगा नहीं 

उसके जाने के साथ
भीतर बहुत सारी चीजों ने  
एक साथ दूर होकर
मुझे मंझधार की उबडूब में छोड़ा 

वह प्यार था या नहीं
यह विवेचना का विषय हो सकता है
पर वह एक नहीं होता है
उसमें कई चीजें एक जगह इकठ्ठा होती हैं
और इसका पता उसके जाने के बाद हीं चलता है 

वो अब नहीं है पर बिलकुल हीं नहीं हो ऐसा नहीं है
उससे जुड़ा हुआ बहुत कुछ अभी भी है
कुछ है जो ख़त्म हो कर उस मंझधार में जीवित है
कुछ है जो खत्म होने को है
और कुछ है जो चलता रहेगा जब तक कि
वो ख़त्म नहीं हो जाता

और कुछ के बारे में यह कहना मुमकिन नहीं
कि वे कब ख़त्म होती है और कब फिर चलने लगती हैं
पर मैं उस समय में डूब कर ख़त्म हो जाने के बावजूद
उसे हीं देखता हूँ जो अब नहीं है

और वो जो अब नहीं है
वो सिर्फ बीता साल नहीं है

और उसकी गिनती एक में खत्म नहीं होती !