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Tuesday, August 10, 2010

कवि का डर टूटा नहीं है अब तक !

जाना नहीं हुआ उस तरफ
ताकने का मन नहीं हुआ बिलकुल भी
बहुत दिन हुए
देखी नहीं कोई कविता

अभी जिधर कविता का होना है
उधर पत्थर फेंकती औरतें हैं,
जीप जलाते मासूम
और देखते हीं गोली मार देने के लिए
तत्पर हथियारबंद

उसकी तरफ देखने से
कभी भी लग सकती है आँख में गोली

कविता जब खो देती है विश्वास
उसके साथ जाने में डर लगता है
और कवि का डर
टूटा नहीं है अब तक

***

Wednesday, May 12, 2010

जरूरतें रात के वक़्त ज्यादा रोती थीं

लगभग हर सेकेंड
वे एक बच्चे को जन्म देती थीं
और वे खुद सात की संख्या में
हर घंटे मर जाती थीं

वे कुछ ऐसी दुनिया की औरतें थीं
जो सिर्फ आंकड़ों में विकसित होती थी

जिस शहर में
प्रधानमंत्री का निवास स्थान था
उसमें सब-सहारा से भी अधिक कुपोषित लोग थे
मगर सरकार का यह कहना था
कि ऐसा सिर्फ जनसँख्या ज्यादा होने की वजह से था

बच्चों को उनके पैदा होते हीं
हाथ में दुःख थमा दिया जाता था
दुःख जब बजता था
वे बच्चे मुस्कुराते थे
दुःख को झुनझुने की तरह काम लेने वाली
ये एक अलग दुनिया थी

बच्चों को
रात में थप्पड़ खाए बिना नींद नहीं आती थी

मार खाकर वे रोते हुए थक कर
खाली पेट सो जाते थे
ये तरीका उस दुनिया की माओं ने इजाद किया था

उनकी माओं के स्तन
कभी इतने विकसित नहीं होते थे
कि उनमें दूध आ सके
और उनके पिता
उस शहर की सड़कों पे रिक्शा चलाते थे
जहाँ प्रधानमंत्री रहते थे
और जहाँ सड़कों के किनारे
फूटपाथ बनाने पे स्थाई रोक थी
क्यूंकि सरकार मानती थी
कि पैदल चलने वाले कहीं से भी जा सकते थे
इसलिए सड़कों को सिर्फ तेज गाड़ियों के लिए छोड़ दिया जाए

हालांकि,
सरकार ये खुल कर नहीं बताती थी
कि पैदल चलने वाले लोग दरअसल
विकास की रफ़्तार में खड्डे थे
पर प्रयत्नशील थी कि
२०२० तक सारे खड्डे भर दिए जाएँ
और इसलिए आंकड़ों पे
अंधाधुंध काम हो रहा था

विकास के इस षड़यंत्र में
पानी दो रुपये प्रति घूँट बेचा जाता था
और ये कोशिश की जा रही थी
कि लोग भोजन खरीदने से पहले
दांतों की संडन रोकने के लिए टूथपेस्ट खरीदें
क्यूंकि प्रधानमंत्री पे
टूथपेस्ट की बिक्री बढाने के लिए
कई तरह के दबाब थे

तो इस तरह
विकास के इस नए युग में
चूँकि सड़कों के किनारे फूटपाथ नहीं थे
उन सभी बच्चों के पिता
अपने रिक्शों पे सोते थे
और ज्यादातर रातों को
उनके सपने नीचे गिर कर टूट जाते थे
और तब उनकी जरूरतें ज्यादा रोती थीं

***

Thursday, April 22, 2010

लडकियां चोटी बांधना भूलती जाती थीं

मेरे अन्दर एक डार्क जोन बन गया था
वहां पानी नहीं पहुँचता था
और मुझे पसीझने के लिए भी
पानी दूर से लाना पड़ता था

नदियाँ एक थीं
पर उनका पानी बंटा हुआ था
पानी को बिना महसूस किये नहा लिए जाना
आम बात थी

आज की रात आप एक औरत हैं
ऐसा उसे किसी ने न तो कहा था
और न हीं महसूसा था

वो अपने चुम्बनों को
होठों से नहीं उतार पायी थी कभी
वो अकेली कमाऊ लड़की थी उस घर के लिए

दहेज़ विरोधी कानून उनंचास साल पहले बन गया था
पर बहुत सारे लड़कियों की शादी अभी भी नहीं होती थी
और बहुत जन्म भी नहीं ले पाती थी

बच्चे सुबह से उठ कर खेलने लगते थे
या काम करने लगते थे
आम जनों में यह बात फ़ैल गयी थी
कि पढ़-लिख कर आदमी बेकार हो जाता है

स्कूली युनिफोर्म पहने बच्चे
ढाबों पे चाय पिलाते थे
या साईकिल की दुकानों पे
पंक्चर ठीक करते थे

या फिर वे ऐसी जगहों पे भेंड चराते हुए देखे जाते थे
जहाँ मुश्किल से कोई घास होती थी

स्कूल का मास्टर कभी -कभी आता था
उसके दारू की दूकान बहुत चलती थी

दूध वाले, सब्जी वाले और परचून की दूकान वाले सभी को
तकनीकों का बहुत अच्छा ज्ञान था
और वे उसका भरपूर इस्तेमाल भी करते थे
कोई घोंड़े की लीद से धनिया बनाता था
तो कोई हीपोलीन से पनीर

कुछ लोग जिन्दगी के इस पार रह जाते थे
कुछ उस पार
सरकार पुल नहीं बना पाती थी

सरकार को जब भ्रष्टाचार करना होता था
तो वो विकास की परियोजनाएं लाती थीं

लडकियां चोटी बांधना भूलती जाती थीं
चोटी बाँधने वाली लडकियां अब प्यार नहीं की जाती थीं

देह से ऊपर गया प्यार
और पैसे से ऊपर गयी मानवता
दोनों हीं उनके ज्ञान में नहीं था
या वे इसे मूर्खतापूर्ण मानते थे

मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा मिल जाती थी
पर लोगों का
कानून से भरोसा उठा हुआ हीं रहता था

वे जानते थे कि एक दिन सब मारे जायेंगे
पर वे अंतिम व्यक्ति होना चाहते थे
मरने के मामले में ...