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Saturday, March 26, 2011

कुछ किया जाए कि कविता को सहारा हो

समझा जाए किसी कविता को ठीक कविता हीं की तरह, कोई भी कविता इससे ज्यादा और क्या चाहेगी और कवि को भी इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहना चाहिए। मौन में उसके उतर कर, कान लगा कर सुनी जाए उसकी आवाज। वो कहे रोने को तो जरूर रोया जाए, उसका तड़पना महसूस किया जाए और जरूरत हो तो तड़पा जाये साथ उसके। कुछ किया जाए कि कविता को सहारा हो। कविता में अगर आग है, तो आप कहीं से भी हो, आग जरूर लायें और तपायें अपनी आग को कविता की आग में। कविता को झूठ न समझा जाए, न हीं उसे जोड़ कर देखा जाए कवि के शब्दों से। कविता के अपने शब्द होते हैं, नितांत अपने और अगर आप उन्हें जला भी दें तो आवाजें आयेंगीं। दरअसल कविता का लिख दिया जाना कवि द्वारा हार स्वीकार कर लिया जाना है कि अब कविता के बारे में उससे कुछ नहीं किया जा सकेगा और तब जिम्मेवारी आपकी बनती है

Tuesday, February 8, 2011

रूह में नंगे जाना होता है...

मैं चलता गया था उसकी तरफ
निरंतर
दूरी कितनी तय हुई मालूम नही

रास्ते में मै कही ठहरा नही जिस्म पर
और वो भी
रूह से पहले तक
दिखायी नही दी एक बार भी

अचानक से हुआ कि छू लूं
जैसे ही दिखी पर
अदृश्य हो गयी हाथ बढाते ही
तब लगा मैं
लिबास साथ लिये आ गया था

लौटना पड़ा मुझे
रूह में नंगे जाना होता है...

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Thursday, December 30, 2010

कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है

जब से प्रेम और कविताओं के बारे में
यह कहा जाने लगा है कि
वे अब महज वस्तुएं हैं
मैं बाजार में पड़े उत्पादों से
आँख मिलाने से कतराता हूँ

मेरे लिए प्रेम, कवितायें हैं
उनका अभाव कचोटती हुई कवितायें हैं
और प्रेम के पश्चात
अस्तित्व में आया प्रेम का अभाव
और भी ज्यादा कचोटती हुई कविता

और कभी जब तुम्हें भेजने के लिए
मैंने 'पैक' की थीं कवितायें
तब भी वे वस्तुएं नहीं थीं
वे कभी भी वस्तु नहीं हुईं मेरे लिए

तुम्हारी आँखें,
जहाँ मैं मजबूत दीखता था
वहां भी झांकते हुए डर लगता है
जिसकी वजह वो अंदेशा है
कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है
और वहां उन आँखों के समंदर में
कविताओं की तैरती हुई लाश देखना
बेहद डरावना होगा

पर अंजाम से बेपरवाह होकर
मुझे देखना है एक बार तुम्हारी आँखों में
जहाँ मेरी तैरती हुई लाश हो सकती है
या फिर वो विश्वास
जिसे आँख भर, भर कर
मैं भष्म कर सकूं वो आवाजें
जिनमें कहा जाता है कि
प्रेम और कवितायें महज वस्तुएं हैं अब

और तब देखना चाहूँगा
बाजार में पड़े वस्तुओं की लिजलिजी स्थिति !!

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Saturday, November 6, 2010

चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

आज दिवाली के दिन
तारों से भरी धरती के बीच चाँद सिर्फ ख्याल में है

आतिशबाजियों के शोर
ख्यालों में खलल डालते हैं
और चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

धूप खोलना
और सुखाना रिश्तों पे गिर आयी सीलन
और खरोंच आ जाये तो करना कुछ मलहम जैसा
थी तुम्हारी आदत
कभी धूप और कभी बारिश के लिए
और कभी धूप में होती बारिश को महसूसने के लिए
चलते चले जाना धरती के छोर तक
मेरे साथ चलते हुए
अब ये सब सिर्फ ख्याल में हैं

धुप और बारिश के अभाव में
अब ख्याल भी पतझड़ होने लगे हैं
और जब मेरा पतझड़
मुझपे बडबडाने लगता है
और रात देर तक पत्तियों का गिराना नहीं रोकता
मैं पलट कर जबाब देने के बजाये
अपनी नंगी होती शाखें लेकर
निकल जाना पसंद करता हूँ
चुपचाप तुम्हारी कविताओं में

पर अब तुम्हारी कवितायें चलती चली जाती हैं
और धरती का वो छोर नहीं आता



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Sunday, October 24, 2010

वे कंधे नहीं पहुंचे अब तक

जहाँ बैठ कर मैं रोया था
वहां अभी तक
तुम्हारे कंधे नहीं पहुंचे

मैं अक्सर टाल जाता हूँ
वहां से गुजरना,
वहां बैठ कर सुबकता हुआ मैं
तेज कर देता है अपना रोना
मुझे देखते हीं

पर अक्सर नहीं भी टाल पाता
और ये देखने पहुँच हीं जाता हूँ
कि शायद तुम्हारे कंधे पहुँच गए हों अब

मैं जानता हूँ
कहाँ होंगे तुम्हारे कंधे अभी
और अगर पहुंचूं वहां मैं
तो तुम रोक न पाओ और बढ़ा दो उन्हें
पर जाने कौन है
जो जिद पे अड़ा है कि
वे कंधे वहां क्यूँ नहीं पहुंचे अभी तक
जहाँ बैठ कर मैं रोया था


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Monday, September 13, 2010

हम चाहते हैं कि समंदर हो जाएँ !

हम पिघल गए थे
पर इतना नहीं कि समंदर हो सकें

हम चाहते थे कि समंदर हो जाएँ
और खोदते जाते थे
गहरा करते जाते थे अपना सीना
पर कवितायें तब भी
रह जा रही थीं अधूरी

हमारे चारो तरफ अभी भी बर्फ थी
जिन्हें पिघलना था
ताकि कवितायें आर-पार जा सकें और
हमें अभी भी सीखना था
नौ महीने पेट में रखने का सब्र
और सब्र की असुविधा भी
ताकि कवितायेँ पूरी जन्में

दरअसल
हमें अपनी बूंद का बाँध
बार-बार तोडना था
ताकि हम भी हो सकें समंदर
और हमारे किनारे बस सकें दुखों के नगर...

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Tuesday, September 7, 2010

सपनो से भरी एक कविता बाकी है!

यहाँ जीते हुए
हमेशा यह याद रखना जरूरी सा लगता है
कि यहाँ से वहां
वक़्त तीन दसमलव पांच घंटे आगे चलता है
और जब तक मैं सही वक़्त तक पहुंचूं
पीछे छूट जाने का भय काबिज हो जाता है

हालांकि यहाँ भी
जागने और सोने के लिए
सुबह और रात है
पर तुम्हारी अनुपस्थिति में
वक़्त का कोई न कोई कोना
नींद की पकड़ से
बाहर छूट जाता है
और मेरी सुबह वक़्त के
उसी कोने से शुरू होती है

इच्छा होती है कि
तुम्हें एक दफा गहरी नींद में
यहाँ के वक़्त में सोता देखूं
तो शायद नींद का वो कोना पकड़ में आ जाए।

नींद के अभाव में
सपनो से भरी एक कविता अभी बाकी है

Friday, August 20, 2010

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो

वे टूटें
भूकंप के मकानों की तरह
और फटें
बादलों की तरह
हम कहीं दूर सूखे में बैठ कर
देखें उनका टूटना और फटना
लिखे उनके दुख और खुश होवें

टूट पड़ें सड़क पे
लाल बत्ती के हरी होते हीं
और बाजू में
बच कर निकलने के लिए संघर्ष करते
साइकिल वाले की साँसों का
उथल-पुथल देखते हुए
पार कर जाएँ सफ़र

रात की तेज बारिश में
बह गयी हों सारी यादें
तब भी सुबह उठ कर हम टाल जाएँ
खुद से बातें करना
और समय पे पहुँच जाएँ दफ्तर

दाल सौ रुपये किलो जाए
तो उसके साथ हम बेंच दे
अपनी मासूमियत

वो जलाएं हमें
और हम खींचें कश
मनहूस वक्त के छल्ले हर तरफ घूमते हों

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो
और हमारा क्या
हमारे दिमागों में पतझड़ का मौसम हो
और वहां पहुँचने वाली नसें सूखी.
____

Saturday, August 14, 2010

कवितायेँ बचाती है हरीतिमा

हर नयी कविता
जगह बनाती है
दूसरी नयी कविता के लिए

प्रकृति के हर जीव की तरह
कवितायेँ भी रखती हैं अपना बीज
स्वयं में हीं
और लगातार बचाती हैं हरीतिमा

***


जरूरी होती हैं कवितायेँ

कवितायेँ न हो
तो हो सकता है मैं भी
किसी कटघरे में होऊं
और मुझ पर कोई मुकदमा हो

जब तक कवितायें हैं
तब तक मुझे आस है
कि कुछ और लोग भी बचते रहेंगे
कटघरे में होने से

***

Tuesday, August 10, 2010

कवि का डर टूटा नहीं है अब तक !

जाना नहीं हुआ उस तरफ
ताकने का मन नहीं हुआ बिलकुल भी
बहुत दिन हुए
देखी नहीं कोई कविता

अभी जिधर कविता का होना है
उधर पत्थर फेंकती औरतें हैं,
जीप जलाते मासूम
और देखते हीं गोली मार देने के लिए
तत्पर हथियारबंद

उसकी तरफ देखने से
कभी भी लग सकती है आँख में गोली

कविता जब खो देती है विश्वास
उसके साथ जाने में डर लगता है
और कवि का डर
टूटा नहीं है अब तक

***

Friday, July 16, 2010

उनकी शक्लें ढह गयी हैं आँखों में

यह बहुत बुरा है कि
कुछ भी नहीं है मेरे पास अभी
जिसकी शक्ल कविता हो

और पीछे जो भी कहा था मैंने
उनकी शक्लें भी
ढहती जा रही हैं मेरी आँखों में

कविता निकल गयी है मुझसे
जो कवि में
चुन-चुन कर प्रेम संजोती है,
आशा रोपती है
और जरिया बनती है कवि होने के लिए

मैं पूरा कर आया हूँ
वह वक़्त
जिसके बाद एक कवि
बलात्कारी हो जाता है,
पेंड काटता है
और पैसे कमाता है

*****

Tuesday, July 6, 2010

किसी भी तरह इस सन्नाटे की पकड़ ढीली हो...

***
हम भरे हुए बादल हैं
इस इंतज़ार में कि
कस कर भींचें जाएँ

हम बरसने को प्यासे हैं

हमने बहुत आसमान नापें हैं
आवारों की तरह
भदभदा जाने की चाह में

और रोके भी रखा है खुद को
कहीं भी भदभदा जाने से

हम इन्तिज़ार में हैं
क्यूंकि बीता वक़्त बीत गया है
और आने वाला अभी पहुंचा नहीं है

हम हैं बेवक्त बरस जाने
और बेमतलब भदभदा जाने से
जानबूझ कर बचते हुए

****
लहरों की आवाजों में खराशें हैं
गला रुंधा सा लगता है
और सारे शब्द सिथुए हो गए हैं

मैं इन्तिज़ार में हूँ
कि वो आये कहीं से भी,
चाहे सहलाये , चाहे बातें करे
या फिर झकझोड़ दे इस सन्नाटे को

वो आये कि
किसी भी तरह
इस सन्नाटे की पकड़ ढीली हो

*****
बंद कमरे में
पालथी मारे बैठे हैं
साँसों के दो पुलिंदे

कोई भी उठ कर
दरवाजे नहीं खोल रहा

*****

Wednesday, June 30, 2010

***

जिनको भी दुःख हो
वे आयें
समझे मेरी छाती को
अपनी छाती
पीटे उसे
रोयें
और थक कर सो जाएँ
उठ कर भूल जाएँ
अपने काम में लग जाएँ

कि ये दुःख कभी कम होने वाला नहीं...

***

Sunday, June 20, 2010

जब रातें सारी ख्वाब में बर्बाद होती हों !

जब कवितायें लिखना हो एक आदत
और बिना कोशिशों के छूटती जाती हों सब आदतें
लिखते वक़्त बहुत सारी पंक्तियाँ
रह जाती हों बाहर
और भींग कर गल जाती हों बारिश में

जब बैठ जाते हों हम
टेबल पर पाँव फैला कर पिता के सामने
भूल जाते हों अपने स्वभाव या संस्कार

या फिर ताक़ पे रख देते हों
बदन में इतना दर्द रहता हो
कि एक के बाद एक सारी इतवारें रहती हों दुखी

जब यादें लगातार आती हों
और लगता हो कि वे आएँगी हीं
और हार कर रोना छोड़ दिया गया हो
और यह समझ लिया गया हो
कि रिश्तों को संभालना होता है इकतरफा हीं

जब यह फर्क करना होता हो मुश्किल
कि हवाएं हिलाती हैं डालियों को
कि वे गर्मी से बेहाल होकर
खुद करती हैं पंखा

जब अनजानी किसी चिड़िया की सुरीली आवाज
सिर्फ इक आवाज भर हो
और कान सिर्फ उन आवाजों को
देते हों तवज्जो
जो खरीदे गए हुए हों
और बिलकुल ऐसा हीं आँख के साथ भी होता हो

जब किसी भी तरह की आवाज
खलल डालती हो
किसी भी तरह के आवाज में,
नींदें खुलने के बजाये हमेशा टूटती हों
और सुबह

सारी रात ख्वाब में बर्बाद हो जाने का
रहता हो अफ़सोस

वह बढ़ा देती है
अपना माथा और होंठ
कि चूमें जाएँ
और कवितायें घूम कर

उस तरफ चली जाती हैं
----------

Monday, April 26, 2010

दिल भात की पतीली का ढक्कन हो गया है

मैं जानती हूँ
तुमने देख ली होगी
मेरे होंठों पे वो कांपती हुई कशिश
और उनपे बार-बार जीभ फेर कर
भिंगाने की मेरी विवशता
और भांप ली होगी वो कमजोरी भी
जिसकी वजह से कोई
किसी की बांहों में निढाल हो जाता है

उस कुछ देर की मुलाक़ात में
अब बताऊँ भी तो
सदा गतिमान होने का दंभ भरने वाला
ये वक़्त क्या मान लेगा
कि वो ठहर गया था

वो धौंकनी सी जलती हुई मेरी सांस थी
जिसपे तुमने अपने पसीने वाले हाथ
रख दिए थे
और कैसे छनाके की आवाज हुई थी
मेरे रोम में
जैसे जलते कोयले पे

किसी ने पानी उड़ेल दिया हो

खुदा जानता है
कि वो दिन का वक़्त था
नहीं तो चाँद के सारे दाग धुल जाने थे

तुम तो चले आये थे,
मुझे तो याद भी नहीं
क्या वादे किये तुमने अपनी सीली आँखों से
मेरे लिए तो
वो नमी हीं काफी थी

थपकियाँ दे-दे कर सुलाती रहती हूँ
धडकनों को तब से मैं,
दिल तेज आंच पे चढ़ी
भात की पतीली का ढक्कन हो गया है

Thursday, April 8, 2010

जरूरतें, विश्वास और सपना


जब तुम घोंप आये
उसकी पीठ में छुरा
मैंने देखा
उसके खून में पानी बहुत था

जिन मामूली जरूरतों को लेकर
तुम घोंप आये छुरा
उन्ही जरूरतों ने
कर दिया था उसका खून पानी

**
तुम बार-बार खोओगे
विश्वास
कहीं सुरक्षित रख के

वे इधर-उधर हो जाते हैं
रोजमर्रा की
कुछेक जरूरी चीजों के हेर-फेर में

***
बहुत तेजी से
बदल रही हैं कुछ जरूरतें
सपनो में

जैसे घर एक जरूरत था पहले
पर अब एक सपना है

****
वक्त भाग कर
जल्दी-जल्दी दिन गुजारता है
जब उसे
इक रात की जरूरत होती है

और रात
नींद की जरूरत में
वक़्त को सो कर गुजार देती है
*****

Tuesday, March 30, 2010

आवाज की हमने कभी नही सुनी !

सुबह-सुबह इक ख्वाब गिर गया है आँख से
नींद काँप उठी थी शोर से

आवाज,
जिसकी अन्तिम स्थिति मौन होनी चाहिए थी
संगीत से निकल कर
शोर हो चुकी है

हमारे समानांतर
परन्तु तेज बढ़ते हुए
यह हिला देगी
एक दिन इस पूरी कायनात को

केवल वही कान बचे रह जायेंगे
जो सुन पायेंगे
कर्णातीत ध्वनियों को

सुनने के सम्बन्ध में कुछ भी हो सकता है
जिसके बारे में अभी से तय करना
मामले को कम गंभीरता से लेना है

गलती हमारी है
हमने कभी
ये जानने की कोशिश नही की
कि दिनानुदिन बढती हुई चीखों में
वह चीख-चीख कर क्या कह रही है

आवाज की हमने कभी नही सुनी !!

Thursday, March 25, 2010

अपने दुखों को सार्वजनिक करने से बचते हुए...

1]

वे कहीं भी और कितना भी रो सकते हैं
चाहे सड़क पे जोर-जोर से
या फिर कविता में चुप-चुप

कवि होने से
उन्हें मिली हुई है इतनी छूट
और ऐसा मान लिया गया है कि रोना
उनके काम का हिस्सा है
और इसलिए उस पर ज्यादा कान देने की जरूरत नहीं है

हाँ...कभी-कभी ताली बजाई जा सकती है
अगर वह बहुत सुन्दर या संगीतबद्ध रोये तो

उन्हें गाडियों के शोर के बीच
अपनी हेलमेट के भीतर चेहरा छुपाते हुए
या चलती ट्रेन के शौचालय में
नहीं रोना होता,
जैसा कि वे लोग करते हैं जो कवि नहीं हैं

2]

आम आदमी पे आजकल
खुश दिखाई देने का एक अतिरिक्त दबाब है.
जब भी हम मिलते हैं
उसके चेहरे पे दीखता है एक भाव
वैसा, जैसे कि उसने अभी रोना शुरू हीं किया हो
और बीच में हीं मुस्कुराना पड़ गया हो

तमाम तरह के दुखों के बीच से गुजरते हुए,
वे थकते रहते हैं खुश दीखते रहने की कोशिश में
और करते चलते है
कई तरह के दुखों कों स्थगित
किसी उपयुक्त समय और मौके के लिए

साथ हीं साथ
वे डरते भी रहते हैं
नकारात्मक दृष्टिकोण रखने के
नकारात्मक परिणामों से
और इसलिए
आधे से ज्यादा खाली ग्लास कों
जबरदस्ती आधे से ज्यादा भरा देखते हैं

वे लगातार जीते रहते हैं खुश रहने के दबाब को
और एक दिन मर जाते हैं
तब उनके चेहरे पे
खुश दिखाई पड़ते रहने की वेदना उभरी हुई होती है

3]

अपने दुखों को
सार्वजनिक करने से बचना सिखाया जाता है उन्हें,
उन्हें नहीं बताया जाता
कि कब और कैसे रोयें वे,
नहीं सिखाया जाता उन्हें रोने का सही इस्तेमाल

धीरे-धीरे जब बढ़ जाता है
दुःख का दबदबा
और वह परिवर्तित होने लगता है
हृदयाघात या रक्तचाप में
वे सुबह सुबह किसी पार्क में
एक झुण्ड बनाते हैं
और जोर-जोर से हँसते हुए रोते हैं

4]

जब भी मौका हाथ लगे
तुम जरूर रो लेना
उस रोते हुए कवि या उसकी रोती कविता की आड़ में
क्यूंकि
एक अकेला कवि कितनी देर और
रोता रह पायेगा तुम्हारे लिए
जबकि उसे अपने लिए भी रोना है ....

Friday, January 15, 2010

एक जरूरी गैर-कविता !

मैंने उसकी मदद कर दी आज
अच्छा लगा करना

मैं उसे जानता नहीं था
इसलिए और अच्छा लगा करना

बाद में जब उसने जताया आभार
और अच्छा लगा

ज्यादा अच्छा लगा
उसकी आँख में देख कर
जिसमे दिखाई पड़ी मुझे
एक कौंधी हुई विश्वास की लकीर
कि अच्छे लोग अभी भी हैं दुनिया में

उसकी आँखों में ये कौंधा हुआ विश्वास
मेरे भीतर
जरा देर के लिए
एक अच्छा आदमी पैदा कर गया

एक अच्छा आदमी
अपने अन्दर देखना अच्छा लगा

आज अनजाने में कुछ अच्छा हो गया
तो अच्छा लगा
बहुत अच्छा

Saturday, November 7, 2009

रजाई कम पड़ गयी है...

नींद औंधा पड़ा है
रजाई में सिकुड़ कर,
इस तरह जैसे सर्दी ज्यादा हो
और रजाई कम पड़ गयी हो

बाहर,
आंगन में
नींद से बिछुड़े हुए ख्वाब
टूट-टूट कर
गिर रहे हैं
कुछ हीं देर में नींद नंगी हो जायेगी शायद

निहायत कमजोर सा कोई वक़्त
अपने टखने में
दर्द लिए चल रहा है,
शायद अपने बुढापे में है.

आईने में
जब देखती हैं आँखें
दिखाई पड़ती हैं
कुछ सफ़ेद पपनियाँ

ऐसे में मैं ढूंढता फिरता हूँ
तुम्हारे हाथों से
बनायी हुई
एक कप कड़क काली चाय

ऐसा तबसे है जबसे
तुम छोड़ गयी हो मेरा किचेन !