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Saturday, March 26, 2011
कुछ किया जाए कि कविता को सहारा हो
समझा जाए किसी कविता को ठीक कविता हीं की तरह, कोई भी कविता इससे ज्यादा और क्या चाहेगी और कवि को भी इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहना चाहिए। मौन में उसके उतर कर, कान लगा कर सुनी जाए उसकी आवाज। वो कहे रोने को तो जरूर रोया जाए, उसका तड़पना महसूस किया जाए और जरूरत हो तो तड़पा जाये साथ उसके। कुछ किया जाए कि कविता को सहारा हो। कविता में अगर आग है, तो आप कहीं से भी हो, आग जरूर लायें और तपायें अपनी आग को कविता की आग में। कविता को झूठ न समझा जाए, न हीं उसे जोड़ कर देखा जाए कवि के शब्दों से। कविता के अपने शब्द होते हैं, नितांत अपने और अगर आप उन्हें जला भी दें तो आवाजें आयेंगीं। दरअसल कविता का लिख दिया जाना कवि द्वारा हार स्वीकार कर लिया जाना है कि अब कविता के बारे में उससे कुछ नहीं किया जा सकेगा और तब जिम्मेवारी आपकी बनती है
Thursday, July 1, 2010
सपने बिना शीर्षक के अच्छे नहीं लगते
जिस सपने में
पहली बार तुम मिली मुझे
उसे मैंने जागने के बाद
न जाने कितनी बार देखा होगा
पहले की तरह हीं
आगे भी
मैं देखता रहूँगा
बार-बार उसे,
उस ख्वाब को
जिसमें मैं चूम आया था
तुम्हारी आँखों के आग
यह तय होते हुए भी
कि तुम मिलोगी किसी नियत समय में
एक निश्चित जगह पर
मैं ढूंढता रहूँगा तुम्हे
बेपनाह सड़कों पर
और मेरी हताश और थकान
तुम छिपा लेना अपने वक्ष में
जब मिलो मुझे
हम बांटते रहेंगे
अपनी व्यस्तताएं
और बनाते रहेंगे निरंतर
प्यार के लिए जगह और समय
और हमेशा रखेंगे ये ख्याल
कि आगे पृथ्वी को छोटे होते जाना है
और धीरे-धीरे उसके
अपनी धुरी पे
घूमने के घंटे कम होते जाने हैं
सहवास के दौरान
मैं तुम्हारे आँखों में भर दूंगा सपने
ताकि कुछ और नन्हें सपने
खोल सकें अपनी पलकें
ताकि गर कभी प्रेम क्षीण हो जाए
जैसे कवितायें क्षीण होकर क्षणिकाएं हो जाती हैं
तब भी वे नन्हे सपने पहाड़ पे चढ़ सकें
और उनका कोई शीर्षक हो
क्यूंकि सपने क्षणिकाएं नहीं हैं
वे बिना शीर्षक के अच्छे नहीं लगते
*****
पहली बार तुम मिली मुझे
उसे मैंने जागने के बाद
न जाने कितनी बार देखा होगा
पहले की तरह हीं
आगे भी
मैं देखता रहूँगा
बार-बार उसे,
उस ख्वाब को
जिसमें मैं चूम आया था
तुम्हारी आँखों के आग
यह तय होते हुए भी
कि तुम मिलोगी किसी नियत समय में
एक निश्चित जगह पर
मैं ढूंढता रहूँगा तुम्हे
बेपनाह सड़कों पर
और मेरी हताश और थकान
तुम छिपा लेना अपने वक्ष में
जब मिलो मुझे
हम बांटते रहेंगे
अपनी व्यस्तताएं
और बनाते रहेंगे निरंतर
प्यार के लिए जगह और समय
और हमेशा रखेंगे ये ख्याल
कि आगे पृथ्वी को छोटे होते जाना है
और धीरे-धीरे उसके
अपनी धुरी पे
घूमने के घंटे कम होते जाने हैं
सहवास के दौरान
मैं तुम्हारे आँखों में भर दूंगा सपने
ताकि कुछ और नन्हें सपने
खोल सकें अपनी पलकें
ताकि गर कभी प्रेम क्षीण हो जाए
जैसे कवितायें क्षीण होकर क्षणिकाएं हो जाती हैं
तब भी वे नन्हे सपने पहाड़ पे चढ़ सकें
और उनका कोई शीर्षक हो
क्यूंकि सपने क्षणिकाएं नहीं हैं
वे बिना शीर्षक के अच्छे नहीं लगते
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Saturday, September 19, 2009
आँख में पकडी गयी चाँद के मैं !
१)
सर्द हवाएं हिलोरें लेती हैं जब-जब,
याद आती है तुम्हारी हथेलियों पे रची
मेंहदी की लाल आग.
२)
कल आँख में पकडी गयी
चाँद के मैं,
उसकी आँखें बड़ी सच बोलती हैं
३)
वो आई तो
मैने शाख बढ़ा दी.
वो धूप थी, छाँव बनने की आरजू में
४)
भर गयी आवाज़ उसकी जब
मेरी दास्ताँ सुनकर,
मैने वहाँ से कुछ नज्में निकाल ली
५)
किताबों में,
पहले नदियाँ मिल जाती थीं
अब बादल यूँ हीं आवारा फिरते हैं
सर्द हवाएं हिलोरें लेती हैं जब-जब,
याद आती है तुम्हारी हथेलियों पे रची
मेंहदी की लाल आग.
२)
कल आँख में पकडी गयी
चाँद के मैं,
उसकी आँखें बड़ी सच बोलती हैं
३)
वो आई तो
मैने शाख बढ़ा दी.
वो धूप थी, छाँव बनने की आरजू में
४)
भर गयी आवाज़ उसकी जब
मेरी दास्ताँ सुनकर,
मैने वहाँ से कुछ नज्में निकाल ली
५)
किताबों में,
पहले नदियाँ मिल जाती थीं
अब बादल यूँ हीं आवारा फिरते हैं
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