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Saturday, November 6, 2010

चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

आज दिवाली के दिन
तारों से भरी धरती के बीच चाँद सिर्फ ख्याल में है

आतिशबाजियों के शोर
ख्यालों में खलल डालते हैं
और चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

धूप खोलना
और सुखाना रिश्तों पे गिर आयी सीलन
और खरोंच आ जाये तो करना कुछ मलहम जैसा
थी तुम्हारी आदत
कभी धूप और कभी बारिश के लिए
और कभी धूप में होती बारिश को महसूसने के लिए
चलते चले जाना धरती के छोर तक
मेरे साथ चलते हुए
अब ये सब सिर्फ ख्याल में हैं

धुप और बारिश के अभाव में
अब ख्याल भी पतझड़ होने लगे हैं
और जब मेरा पतझड़
मुझपे बडबडाने लगता है
और रात देर तक पत्तियों का गिराना नहीं रोकता
मैं पलट कर जबाब देने के बजाये
अपनी नंगी होती शाखें लेकर
निकल जाना पसंद करता हूँ
चुपचाप तुम्हारी कविताओं में

पर अब तुम्हारी कवितायें चलती चली जाती हैं
और धरती का वो छोर नहीं आता



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Friday, October 8, 2010

वो वक्त अतीत में गिर गया है

यह बिलकुल हीं रात है
और इसकी परिधि के भीतर
ठीक चाँद इतनी खाली जगह है
और बाकी सभी जगह अमावस बिछी हुई है

इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है

पर तुमने जाते हुए
वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
लिखी जानी थी,
अतीत में गिर गया है

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Sunday, March 21, 2010

उल्के

आजकल
ये तारा
टिमटिमाता रहता है अकेला

अभी कुछ रोज पहले तक
देखता था इसे
चाँद के बहुत क़रीब

उसकी
मुलायम चाँदनी में नहाते हुए

डर है
चाँद जब तक लौट कर आए
ये तारा
कहीं उल्के में न बदल जाए

Saturday, September 19, 2009

आँख में पकडी गयी चाँद के मैं !

१)
सर्द हवाएं हिलोरें लेती हैं जब-जब,
याद आती है तुम्हारी हथेलियों पे रची

मेंहदी की लाल आग.

२)
कल आँख में पकडी गयी
चाँद के मैं,

उसकी आँखें बड़ी सच बोलती हैं

३)
वो आई तो
मैने शाख बढ़ा दी.

वो धूप थी, छाँव बनने की आरजू में

४)
भर गयी आवाज़ उसकी जब
मेरी दास्ताँ सुनकर,

मैने वहाँ से कुछ नज्में निकाल ली

५)
किताबों में,
पहले नदियाँ मिल जाती थीं

अब बादल यूँ हीं आवारा फिरते हैं



Friday, September 11, 2009

नादान

लाख बुलाया,
कितनी आवाज़े दी
पर माना नही
छत से उतर कर जीने पे बैठ गया आखिरकार

कहता है
बिना चाँद लिए उतरेगा नही

कितना नादान है
ये दिल मेरा!