Showing posts with label ख्याल. Show all posts
Showing posts with label ख्याल. Show all posts

Saturday, November 6, 2010

चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

आज दिवाली के दिन
तारों से भरी धरती के बीच चाँद सिर्फ ख्याल में है

आतिशबाजियों के शोर
ख्यालों में खलल डालते हैं
और चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

धूप खोलना
और सुखाना रिश्तों पे गिर आयी सीलन
और खरोंच आ जाये तो करना कुछ मलहम जैसा
थी तुम्हारी आदत
कभी धूप और कभी बारिश के लिए
और कभी धूप में होती बारिश को महसूसने के लिए
चलते चले जाना धरती के छोर तक
मेरे साथ चलते हुए
अब ये सब सिर्फ ख्याल में हैं

धुप और बारिश के अभाव में
अब ख्याल भी पतझड़ होने लगे हैं
और जब मेरा पतझड़
मुझपे बडबडाने लगता है
और रात देर तक पत्तियों का गिराना नहीं रोकता
मैं पलट कर जबाब देने के बजाये
अपनी नंगी होती शाखें लेकर
निकल जाना पसंद करता हूँ
चुपचाप तुम्हारी कविताओं में

पर अब तुम्हारी कवितायें चलती चली जाती हैं
और धरती का वो छोर नहीं आता



_____________

Sunday, October 18, 2009

दिन भर दौड़ में लगे ख्वाबों का बिस्तर है नींद !

लकडियाँ जोड़ी
उपले लगाए
तीलियाँ फूंकी
पर आंच जली नही
उठता रहा धुंआ, केवल धुंआ !

हांडी में चढाई थी जो नींद
वो कच्ची हीं रह गई।

चाहिए थी एक पकी नींद
ख्वाबों के लिए,
दिन भर दौड़ में लगे ख्वाबों का बिस्तर है नींद
जो कभी-कभी यूँ हीं बिना सिलवटों के रह जाती है

जाने कहाँ से आकर ख्याल में कुत्ते रोते रहते हैं
और लाख लतियाने पे भागते नही

सुबह-सुबह चाय पीते हुए
उनींदे मन ये सोंच रहा हूँ
कि आख़िर कुत्ते भी क्या करें
उन्हें भी कहाँ वक्त मिलता है रोने के लिए

और चाय पीने के बाद देख रहा हूँ
कैसे दौड़ पड़े हैं ख्वाब
फ़िर उन कुत्तों को रोता छोड़ कर