Showing posts with label रिश्ता. Show all posts
Showing posts with label रिश्ता. Show all posts

Saturday, November 6, 2010

चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

आज दिवाली के दिन
तारों से भरी धरती के बीच चाँद सिर्फ ख्याल में है

आतिशबाजियों के शोर
ख्यालों में खलल डालते हैं
और चाँद पे लिखी जाती कविता बीच-बीच में टूटती है

धूप खोलना
और सुखाना रिश्तों पे गिर आयी सीलन
और खरोंच आ जाये तो करना कुछ मलहम जैसा
थी तुम्हारी आदत
कभी धूप और कभी बारिश के लिए
और कभी धूप में होती बारिश को महसूसने के लिए
चलते चले जाना धरती के छोर तक
मेरे साथ चलते हुए
अब ये सब सिर्फ ख्याल में हैं

धुप और बारिश के अभाव में
अब ख्याल भी पतझड़ होने लगे हैं
और जब मेरा पतझड़
मुझपे बडबडाने लगता है
और रात देर तक पत्तियों का गिराना नहीं रोकता
मैं पलट कर जबाब देने के बजाये
अपनी नंगी होती शाखें लेकर
निकल जाना पसंद करता हूँ
चुपचाप तुम्हारी कविताओं में

पर अब तुम्हारी कवितायें चलती चली जाती हैं
और धरती का वो छोर नहीं आता



_____________

Tuesday, November 17, 2009

क्यूँ टूट गये???

वो रिश्ते जिनके बीज
ख्वाब में गिर कर हीं रह गये
मेरी माटी नही छू पाए
उन रिश्तों की पौध
ऊग आई है
आज मेरे सूने आंगन के एक कोने में

मैं हाथ नही लगाता
उनकी पाकीज़ा कोंपलों पे,
डरता हूँ, अपने हक के बारे में सोंच कर.

सिर्फ सुनने की कोशिश करता हूँ उन्हे
हाथ में आ जाए शायद कोई स्वर.

वे खुल कर बोलती नही


चुपके से दलील मांगती हैं,
सवाल पूछती हैं कि क्या हुआ,
क्यूँ टूट गये
जरा सा करवट बदलने में हीं ???

Wednesday, September 16, 2009

बीच का पुल

बीच का पुल

टूट जाये

तो भी

रिश्ते

भर-भरा कर

गिर नही जाते.

वे

किनारे पे खड़े

इंतिज़ार करते रहते है

कि

कब ये पुल जुड़े

और

फिर वे चलें.

Friday, August 21, 2009

आओ थोड़ा और आगे चलते हैं !

छोटा सा एक स्पर्श
धीमे से
तुम्हारी उंगलियों में फँसाया था कभी,
वो भी ख्वाब में
और कैसे अंगीठी हो गयी थी तुम्हारी साँसे

पीछे दीवार से टिका कर तेरी पीठ
मैने देनी चाही थी तुम्हें
अपनी धौंकनी
याद है?

पर तुमसे सहेजा ना गया था
और अकबका कर चली गयी थी तुम
ख्वाब से,
जैसे कि डर गई होओं लौ में बदलने से .

आज फिर देखा है तुम्हे
वही ख्वाब है,
पर आज तुमने अपनी पंखुडी पे

मेरे लब आने दिये

और लौ पकड़े तुमने ख़ुद अपनी हाथों से

कुछ रिश्ते ख्वाब में ही आगे बढ़ते हैं शायद!

ये कविता मेरी आवाज में सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे


Sunday, June 21, 2009

उसका जाना...

वो सारे सामान ले आई थी
लौटा देने के लिए।

वो हमारी आखरी तय मुलाक़ात थी
जिसमे उसे मेरा दिया
सब कुछ लौटा देना था
और फ़िर
एक लंबे गहरे रिश्ते से मुंह फेर लेना था

उसे खुरच देने थे
मेरी यादों के सारे निशान
समय की देह से
और मुझे अजनबी दुनिया मैं फेंक कर
खाली हो जाना था

निकाल कर रख दिए उसने
एक-एक कर सारे सामान
और उनके साथ वे सब ख्वाब भी,
जो आँखों से निकालते वक्त
नमकीन हो गए थे.

फिर न जाने कितनी देर
हम भींगते कमरे में बैठे रहे
और आखिर में
जब निकलने का वक़्त हुआ
तो इतनी तेज बारिश कि...

आखिरकार उस तेज बारिश में हीं जाना हुआ

मैंने उसके दुपट्टे के कोने में
शगुन के एक सौ एक रुपये बाँध दिए और
उसने निकलने से पहले मेरे पैर छू लिए।

Monday, May 11, 2009

एक रिश्ता जो ठहर गया

वो पानी नही ठहरा.......

हजार दफा पोंछी आँख
पर
बहती रही
बारिश की नजर मुसलसल
गुबार के काले बादल
बरस कर खाली हो गए
पर सुबकिया थमी नहीं

ना सुबकिया ठहरी और ना वो पानी ठहरा

एक रिश्ता था जो बस ठहर गया था

Tuesday, May 5, 2009

पतझड और सीलन

पतझर में जो पत्ते
बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से,
वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं
उन सूखे पत्तों की रूहें
उसी आशियाने की दीवारों पे
सीलन की तरह बहती रहती है

किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नही
ये नम बनी रहती है

मौसम रिश्तों की रूहों को सूखा नही सकते