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Sunday, June 21, 2009

उसका जाना...

वो सारे सामान ले आई थी
लौटा देने के लिए।

वो हमारी आखरी तय मुलाक़ात थी
जिसमे उसे मेरा दिया
सब कुछ लौटा देना था
और फ़िर
एक लंबे गहरे रिश्ते से मुंह फेर लेना था

उसे खुरच देने थे
मेरी यादों के सारे निशान
समय की देह से
और मुझे अजनबी दुनिया मैं फेंक कर
खाली हो जाना था

निकाल कर रख दिए उसने
एक-एक कर सारे सामान
और उनके साथ वे सब ख्वाब भी,
जो आँखों से निकालते वक्त
नमकीन हो गए थे.

फिर न जाने कितनी देर
हम भींगते कमरे में बैठे रहे
और आखिर में
जब निकलने का वक़्त हुआ
तो इतनी तेज बारिश कि...

आखिरकार उस तेज बारिश में हीं जाना हुआ

मैंने उसके दुपट्टे के कोने में
शगुन के एक सौ एक रुपये बाँध दिए और
उसने निकलने से पहले मेरे पैर छू लिए।