पिछला साल ख़त्म हुआ
और ये नया साल भी
अपनी रोजमर्रा की चाल से चलता हुआ
एक महीना और पांच दिन गुजार चुका है
और तमाम कोशिशों के बाबजूद
इस नए साल में
मैं प्यार नहीं कर पाया हूँ तुम्हें
दोष किसी भी चीज के मत्थे मढ़ दूं
पर हकीकत कुछ और है
और वो बहुत तेजी से बेचैन कर रहा है मुझे
और चौंकाता है कि
बिना प्यार के हीं चल रहा हूँ मैं आजकल
मुझे नहीं मालूम था
कि अचानक से ये खो जाएगा एक दिन
मृत्यु के पहले हीं
और मुझे केवल सांस के सहारे
छोड़ दिया जाएगा
तभी तो कभी जरूरत नहीं समझी जानने की
कि कहाँ से उगता है,
कैसा है इसका बीज और
किसने रोपा था इसे
और अब तो कहीं दीखता हीं नहीं ये
अब कहाँ पानी डालूँ, कहाँ दिखाऊं धूप
पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता चला जाता है
दरारें उगती आती हैं
तुम तक पहुँचने की
और तुम्हारा ह्रदय छू लेने की उत्कंठा
उत्कट हुई जा रही है
मैं मर रहा हूँ
और जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि
तुम देख भी नहीं पा रही
तुम तक पहुँचने की मेरी जद्दोजहद
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Saturday, February 5, 2011
Saturday, September 19, 2009
आँख में पकडी गयी चाँद के मैं !
१)
सर्द हवाएं हिलोरें लेती हैं जब-जब,
याद आती है तुम्हारी हथेलियों पे रची
मेंहदी की लाल आग.
२)
कल आँख में पकडी गयी
चाँद के मैं,
उसकी आँखें बड़ी सच बोलती हैं
३)
वो आई तो
मैने शाख बढ़ा दी.
वो धूप थी, छाँव बनने की आरजू में
४)
भर गयी आवाज़ उसकी जब
मेरी दास्ताँ सुनकर,
मैने वहाँ से कुछ नज्में निकाल ली
५)
किताबों में,
पहले नदियाँ मिल जाती थीं
अब बादल यूँ हीं आवारा फिरते हैं
सर्द हवाएं हिलोरें लेती हैं जब-जब,
याद आती है तुम्हारी हथेलियों पे रची
मेंहदी की लाल आग.
२)
कल आँख में पकडी गयी
चाँद के मैं,
उसकी आँखें बड़ी सच बोलती हैं
३)
वो आई तो
मैने शाख बढ़ा दी.
वो धूप थी, छाँव बनने की आरजू में
४)
भर गयी आवाज़ उसकी जब
मेरी दास्ताँ सुनकर,
मैने वहाँ से कुछ नज्में निकाल ली
५)
किताबों में,
पहले नदियाँ मिल जाती थीं
अब बादल यूँ हीं आवारा फिरते हैं
Friday, May 15, 2009
गुनगुनी धूप वाले मौसम
कुछ गुनगुनी धूप वाले मौसम होते हैं
जो पसर जाते हैं जिंदगी की अलगनी पर
कुछ इस तरह जैसे कि वे सारा पतझर ढांप लेंगें।
तमाम उगे हुए दर्द और सुखी हुई तन्हाईयाँ गिरा कर
वो भर देते हैं नंगी शाखों को कोंपलों से।
कोयल कूकती है, पपिहे गाते है
और योवन दुबारा पनपने लगता है।
गुनगुनी धूप वाले मौसमों को भी जाना होता है
वे चले जाते हैं
पर जब कभी चाँद मद्धम हो, रातें
सर्द और जिंदगी को कहीं दुबकने का जी हो
तो वो गुनगुनी धूप वाले मौसम उतर आते हैं अलगनी से
और ढांप लेते हैं अपनी धूप से
ऐसा ही एक मौसम मेरी डायरी में रखा है
वो मौसम तुम्हारा है
और उसमे तुम्हारी गुनगुनी धूप है।
जो पसर जाते हैं जिंदगी की अलगनी पर
कुछ इस तरह जैसे कि वे सारा पतझर ढांप लेंगें।
तमाम उगे हुए दर्द और सुखी हुई तन्हाईयाँ गिरा कर
वो भर देते हैं नंगी शाखों को कोंपलों से।
कोयल कूकती है, पपिहे गाते है
और योवन दुबारा पनपने लगता है।
गुनगुनी धूप वाले मौसमों को भी जाना होता है
वे चले जाते हैं
पर जब कभी चाँद मद्धम हो, रातें
सर्द और जिंदगी को कहीं दुबकने का जी हो
तो वो गुनगुनी धूप वाले मौसम उतर आते हैं अलगनी से
और ढांप लेते हैं अपनी धूप से
ऐसा ही एक मौसम मेरी डायरी में रखा है
वो मौसम तुम्हारा है
और उसमे तुम्हारी गुनगुनी धूप है।
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