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Sunday, June 20, 2010

जब रातें सारी ख्वाब में बर्बाद होती हों !

जब कवितायें लिखना हो एक आदत
और बिना कोशिशों के छूटती जाती हों सब आदतें
लिखते वक़्त बहुत सारी पंक्तियाँ
रह जाती हों बाहर
और भींग कर गल जाती हों बारिश में

जब बैठ जाते हों हम
टेबल पर पाँव फैला कर पिता के सामने
भूल जाते हों अपने स्वभाव या संस्कार

या फिर ताक़ पे रख देते हों
बदन में इतना दर्द रहता हो
कि एक के बाद एक सारी इतवारें रहती हों दुखी

जब यादें लगातार आती हों
और लगता हो कि वे आएँगी हीं
और हार कर रोना छोड़ दिया गया हो
और यह समझ लिया गया हो
कि रिश्तों को संभालना होता है इकतरफा हीं

जब यह फर्क करना होता हो मुश्किल
कि हवाएं हिलाती हैं डालियों को
कि वे गर्मी से बेहाल होकर
खुद करती हैं पंखा

जब अनजानी किसी चिड़िया की सुरीली आवाज
सिर्फ इक आवाज भर हो
और कान सिर्फ उन आवाजों को
देते हों तवज्जो
जो खरीदे गए हुए हों
और बिलकुल ऐसा हीं आँख के साथ भी होता हो

जब किसी भी तरह की आवाज
खलल डालती हो
किसी भी तरह के आवाज में,
नींदें खुलने के बजाये हमेशा टूटती हों
और सुबह

सारी रात ख्वाब में बर्बाद हो जाने का
रहता हो अफ़सोस

वह बढ़ा देती है
अपना माथा और होंठ
कि चूमें जाएँ
और कवितायें घूम कर

उस तरफ चली जाती हैं
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Friday, February 19, 2010

मुहब्बत मानो फिर लौटी है

मुहब्बत मानो फिर लौटी है

बांहों को एक नाजुक से आगोश की आमद है
धडकनों को कुछ और धडकनों की आहट है

चाँद फिर कंगन सा है
और सितारे फिर आँचल सा

यूँ लगता है कि
वो मेरी उंगलियाँ ले जा कर
अपने हारमोनिअम पे टिका लेने वाली है
और मैं पिआनो की तरह बज जाने वाला हूँ

मैं जानता हूँ कि
इस भरी हुई रात में
मैं लिखूं गर कोई नज्म
तो उसके हर सफ्हे में मौजूद होओगी तुम
और तुम्हारी मुहब्बत भी

पर लिखने से पहले
याद आ जाती है वो पुरानी नज्में मेरी
जहाँ से चली गयी थी
वो और उसकी मुहब्बत...

Monday, August 17, 2009

याद में

इस लड़खड़ाती रात में
उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ

उसकी यादों का वजूद
मेरे हर गिरते पल को थाम लेता है

याद में ये राहें इतनी व्यस्त नही हैं
यहाँ प्यार से चलने के लिये
जगह भी है और वक़्त भी
इन पर जरा बेफिक्र हो कर चला जा सकता है

याद में उसकी लबे हैं पंखुडी जैसी
जहाँ गुलाब महकता है
एक लहर है नजरों में
जिस पर समंदर बहकता है

इस लड़खड़ाती रात में
उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ
और उम्मीद है कि
एक पुख्ता सुबह तक पहुँच जाऊंगा

Sunday, August 16, 2009

सिर्फ़ मन्नतें बदली हैं !

वही दर है
वही मैं

सिर्फ़ मन्नतें बदली हैं

कभी मांगता था
कि तू जिंदगी में आ जाए
और अब मांगता हूँ
कि तू बस और याद न आए