इस लड़खड़ाती रात में
उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ
उसकी यादों का वजूद
मेरे हर गिरते पल को थाम लेता है
याद में ये राहें इतनी व्यस्त नही हैं
यहाँ प्यार से चलने के लिये
जगह भी है और वक़्त भी
इन पर जरा बेफिक्र हो कर चला जा सकता है
याद में उसकी लबे हैं पंखुडी जैसी
जहाँ गुलाब महकता है
एक लहर है नजरों में
जिस पर समंदर बहकता है
इस लड़खड़ाती रात में
उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ
और उम्मीद है कि
एक पुख्ता सुबह तक पहुँच जाऊंगा
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Monday, August 17, 2009
Thursday, July 23, 2009
चिमटे से बस इतना हीं पकड़ा गया...
(1)
पहले
तो तुमने छेड़ दी तारऔर अब
जब संगीत बजने लगा है तो
कान बंद कर लिए तुमने !
(2)
जो हाथ
पास आकर
कंधे पे आ जाते थेवे अब यूँ हीं जेब में पड़े रहते हैं.
(३)
शामें
अब कुछ यूँ गुजर जाती हैकि बैठना नही हो पाता
अपने पास
ख़ुद को महसूसते हुए
(५)
दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है
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