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Thursday, July 23, 2009

चिमटे से बस इतना हीं पकड़ा गया...

(1)

पहले

तो तुमने छेड़ दी तार

और अब

जब संगीत बजने लगा है तो

कान बंद कर लिए तुमने !

(2)
जो हाथ

कभी दूर से हींबुलाने लग जाते थे,

पास आकर

कंधे पे आ जाते थे

वे अब यूँ हीं जेब में पड़े रहते हैं.

(३)

शामें

अब कुछ यूँ गुजर जाती है

कि बैठना नही हो पाता
अपने
पास

ख़ुद को महसूसते हुए

(५)

दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है

Tuesday, July 14, 2009

मैं शुतुरमुर्ग होना चाहता हूँ !

यह मेरा हीं दुःख है
जो मुझे रुलाता है

बाहरी दुनिया के सारे दुःख
बस एक अतिरिक्त कारण हैं

पर सोंचता हूँ की
ये जो बेबात का इतना दुःख है
इसका उदगम कहाँ है
या मैं दुःख खींचने वाला चुम्बक तो नहीं

मैं भी
बहुत सारे अन्य लोगो में
शामिल हो जाना चाहता हूँ
जो हास्य फिल्में देखते हैं
बिना बात के हंसते हैं
और हंसते हुए घर लौट आते हैं
शाम को बैड्मिन्टन खेलते हैं
और राजनीति पे चर्चा करते हैं

मैं शुतुरमुर्ग होना चाहता हूँ !

Tuesday, June 9, 2009

ध्यान

दुःख गर
बहुत गहरा हो जाए
और सारी चेतना
उसी दुःख के कील से बींध जाए तो
ध्यान का जन्म होता है

आजकल दोनों आँखों के बीच वाली जगह पे
चेतना
दुःख से बीन्धी हुई रहती है
और मैं ध्यान में .