Tuesday, October 27, 2009
कब आ रही हो !!!
मैं एक एक कर
याद करता हूँ
अपनी सारी पुरानी प्रेमिकाएं
निकालता हूँ
कवर से गिटार
और रात देर तक उसके तारों को
छूते हुए कोशिश करता हूँ
महसूसना उन पुरानी प्रेमिकाओं को
कभी पार्क की
फिसल पट्टी पे लेट कर
आधा चाँद देखते हुए
सोंचता हूँ अधूरे प्रेमों के बारे में
और 'रात को रोक लो' वाला गाना गाता हूँ
निकालता हूँ
अपनी पुरानी लिखी कवितायें
एक दो पढता हूँ
और फ़िर रख देता हूँ
उनमें गंध आ गई है वैसी जैसी
बहुत दिन से पेटी में पड़े
पुराने कपडों में हो जाती है
और ये सब कर के
जब थक जाता हूँ
और हो जाता हूँ उदास
बनाता हूँ
मग भर कड़क काली चाय
और तुम्हें याद करते हुए पीता हूँ
और अगली सुबह
तुम्हें फोन करके पूछता हूँ
कब आ रही हो !!!
Monday, October 26, 2009
बडा इंतज़ार रहता है
जाने क्यो बडा इंतज़ार रहता है
और जो बच गये हैं बैठे हैं जाम लेके
होश इनको जरा ना-गवार रहता है
आजकल अखबार का समाचार पढते वक़्त
नजर बडा ही शर्मसार रहता है
बदन के रेशे रेशे पे जिंदा हर पल
तेरे बोसे का प्यार रहता है
समंदर ने छोड दिया आना साहिल पे
किनारे की रेत पे तपिश बेशुमार रहता है
दुनिया के दामन में साजिश बहुत है
जिंदगी पे मौत का खौफ हमेशा बरकरार रहता है
Sunday, July 19, 2009
यह एक कमजोर समय है मेरे लिए.
एक कमजोर समय,
जब मैं सोंचने के लिए मजबूर हूँ,
तुम्हारी हरी हंसी के बारे में
ऑक्सीजन से भरी बातों के बारे में
तुम्हारे होंठ और तुम्हारे गेशुओं के बारे में
तुम्हारी बेवफाई की तमाम हरकतों के बावजूद.
इस कमजोर समय में
मैं चाहता हूँ
कमजोर हो जाओ तुम भी इतना
कि रोक न सको खुद को पुकारने से नाम मेरा
और आ जाओ दौड़ती हुई
लग जाओ गले
ताकि मैं हमारे बिखराव पे हाथ रख दूँ
तुम रोओं
और मैं भी
और फ़िर इतने दिनों से
ठहरा हुआ रिश्ता फ़िर से चल पड़े
यह एक कमजोर समय है मेरे लिए
और ऐसा दिन में कई बार है .
Tuesday, July 14, 2009
मैं शुतुरमुर्ग होना चाहता हूँ !
जो मुझे रुलाता है
बाहरी दुनिया के सारे दुःख
बस एक अतिरिक्त कारण हैं
पर सोंचता हूँ की
ये जो बेबात का इतना दुःख है
इसका उदगम कहाँ है
या मैं दुःख खींचने वाला चुम्बक तो नहीं
मैं भी
बहुत सारे अन्य लोगो में
शामिल हो जाना चाहता हूँ
जो हास्य फिल्में देखते हैं
बिना बात के हंसते हैं
और हंसते हुए घर लौट आते हैं
शाम को बैड्मिन्टन खेलते हैं
और राजनीति पे चर्चा करते हैं
मैं शुतुरमुर्ग होना चाहता हूँ !
चीजें जो कभी करती है खुश और कभी उदास !
बहुत सारी चीजों में से
कुछ चीजें ऐसी हैं
जो कभी कर देती है खुश और
कभी उदास, वही चीजें
वे चीजें करीब होती हैं दिल के
इतने करीब कि
निकलती हैं साँसों को छूते हुए
मोहल्ले के चौराहे से
निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए
उन पर अक्सर अपने ख्वाबों को चलते देखा है
उस बरगद के नीचे अक्सर बैठी मिल जाती है मेरी छाँव
जो तुम्हारे स्कूल के रास्ते में पड़ाव था
गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम
और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास
Friday, July 3, 2009
वक्त मुझपे कर रहा है खाक से दस्तखत...
अपने दुःख,
अपनी परेशानियाँ
और मेरा मानना है कि
दुःख बांटे बगैर रिश्ते नही बनते
मेरे किसी रिश्ते में अब
और वक़्त
Thursday, July 2, 2009
अपने बिके देह में
नींद की कतरने हमने
आज फिर बाजार की चढ़ती-उतरती दामो के साथ
बाँध दिया खुद को.
आज फिर अपने बिके देह में रहना होगा मुझे
आज फिर रूह कर्ज से होकर गुज़रेगी
Saturday, June 27, 2009
पतझड़ के उन्ही सुखे पत्तों पर !
पर मौसम टंगे रहेंगे
पतझड़ के उन्ही सुखे पत्तों पर
आर पार जाती रहेंगी साँसें पर
ह्रदय पर के दबाब कम नही होंगे
पसरती रहेगी धूप
छत और आंगन के कंधों पर
पर छू नही पायेगी वे देह की सीलनो को
बहुत सारा पानी बहता रहेगा पर
रक्त टिका रहेगा वहीँ
जहाँ कटे थे रिश्ते
लिखी जाने वाली किताबें
तेरे किरदार के इंतज़ार में
गुमसुम बैठी रहेंगी
तेरे लौटने तक
सब कुछ टंगा रहेगा
मेरे साथ दीवार की खूंटी पर
Tuesday, June 23, 2009
बिना नज़्म के तुम्हें कैसे छुऊं !!
कोई भी नज़्म
उगा कर नही लाती सुबह
आ के बैठ जाती है
आँगन में अनमनी सी
जाने क्या सोंचती हुई
बैठी रहती है देर तक यूँ हीं
चाय पी कर भी ताज़ी नहीं होती ये सुबहें
उन रातों को,
जिनकी वे सुबहें होती हैं
नज़्म के बीज नही गिरते
आसमान खाली रहता है तारों के पेड़ से
और बादल भरे हुए
ऐसी सुबहों को
मैं बहुत परेशां रहता हूँ
कि बिना नज़्म के तुम्हें कैसे छुऊं !!
Monday, June 22, 2009
एक थोड़ा ठंढा सूरज उगाना है !
सुबह,
मैंने तुम्हारे गार्डेन में
जो धूप की कलमी लगाई है
उसमें पानी देती रहना
एक थोड़ा ठंढा सूरज उगाना है
आने वाले
गर्मियों के मौसम के लिए
तुम कहती रहती हो न
कि ये सूरज आजकल बहुत गर्म रहता है!
Friday, June 19, 2009
साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी
नजर में ठहरी हुई है वो तेरी महफिल अभी तक
जो पी आया तेरे होठो से एक कलाम साकी
हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी
मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी
लिखने लगे जो अपनी दास्तान साकी,
उसमें आने लगा बार बार तेरा नाम साकी
खुदा हाफिज़ करने में है न अब कोइ गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी
Thursday, June 18, 2009
अपनी देह का इंतज़ार करते!
पर तुम्हारे जाने के बाद
अब भी वहीँ
पार्क की उसी उदास बेंच पर
बैठी हुई है रूह
अपनी देह का इंतज़ार करते
एक देह वहां है
पर उसे वो अपना मान नही रही
Tuesday, June 16, 2009
तेरी आवाज में मेरा नाम!
और ये बंजारा जिस्म, मेरा
और एक भटकाव है उस मौन में
जो ख़त्म हीं नहीं होता
आँखे तेरी गुम हो गयी आवाज के निशाँ ढूँढती है
वक्त खानाबदोश हो गया है
रोज डेरा बदल लेता है
गाड़ देता है तम्बू , जहाँ भी कोई आहट ,
धुंधली सी भी आहट सुनाई दे जाती है
तेरी आवाज की
बस एक बार वो ध्वनियाँ मिल जाएँ
जिनमे तुम बुलाया करती थी मुझे
तो अपना वक्त उससे टांक दूं
Tuesday, June 2, 2009
शरीर में टिके रहने की वजह
देती है साथ कोई तमन्ना
एक ख्वाहिश है जो
नही जाती छोड़कर कभी
कोई ख्वाब है जो
कभी रूठता नही
टूटता नही है एक
नशा है जो उम्मीद का
मन के आले में अरमानो का एक दीया है
जो अपनी लौ नही समेटता
एक जिंदगी है जो
कभी मरती नही
और कितनी चाहिये वजहें
इस शरीर में टिके रहने के लिये.
Sunday, May 31, 2009
मेरे रंग रखना सहेज कर
तुम्हारे पाँव देहली तक फिर लौट कर नही आये
मेरे आधे रंग अभी भी यूँ ही पडे हैं
शुक्र है कुछ तुम साथ ले गयी थी
चौखटो ने रंग धोये नही
शाम तक इंतिज़ार किया तेरी आहटो का
हालांकि वे जानती थी कि तुम्हारा आ पाना होगा असंभव सा
तुम्हारी पैरों में कोई और ही दहलीज जो बंध गयी है
पर फिर भी इंतिजार किया
शायद अपने सुकून के लिये
कभी यूँ भी लगता है
कि तुम गयी ही कब थी और ये इंतिज़ार क्यों है
पर फिर भी ......
अच्छा लगता है ये सोंच कर कि
मेरे कुछ रंग तुम्हारे पास रहेंगे हमेशा
उन्हें रखना सहेज कर
और देख लेना उन्हें
कभी अगर लगे कि जिंदगी बेरंग होने लगी है
वे रहेंगी तुम्हारे पास तो मेरी होली आती रहेगी
Wednesday, May 20, 2009
ताजे मौन देना
ये बातें फ़िज़ा में भटकती रहती है
Sunday, February 15, 2009
उबासी लेते लम्हें
चली आती है वो और
पालथी मार कर बैठ जाती है
घड़ी की सुइओं पर
वक्त कुछ देर तक दमघोंटू गले से
टिक टिक करता रहता है
और फ़िर बंद हो जाता है आखिरकार
खूब सारा समय इकठ्ठा हो जाता है
खत्म नही होते दिन
लाख भटकने पे भी
और रात भी मुंदी पलकों के नीचे जागती रहती है
लम्हें बैठे बैठे
उँगलियाँ फोड़ते रहते हैं
पर पोरों से
तेरे न होने का दर्द जाता नही
बहुत देर तक जब बैठी रह जाती है तन्हाई
घड़ी की सुइओं पर
और
पृथ्वी नही घूम पाने की वजह से
बेचैन हो जाती है
तो सिगरेट के बहाने सुलगा लेता हूँ
थोड़ा सा वक्त
काट लेता हूँ थोड़ा सा वक्त
सिगरेट के साथ और तुम्हारे बगैर
फ़िर सोंचता हूँ
सिगरेट के तुम्हारे स्थानापन्न हो जाने के बारे में
और फेंक देता हूँ उसे।
आज समय फिर सुबह से हीं बंद पड़ा है
पर मैंने नही सुलगाई एक भी सिगरेट.
Thursday, February 12, 2009
बहरा आसमान !
लगाई बिंदी माथे पे
ओढे गहने और कपड़े
मेंहदी लगे हाथो में पहने कंगन
मन पे, पहले का सारा पहना हुआ
उतार दिया
और सूरज की लपटों के सात फेरे ले लिए
खामोश लबों पे उठती हुई टीस
और कंठ में रुकी हुई हूक
अनसुनी कर दी गई थी पहले हीं
बहरा आसमान !
Thursday, February 5, 2009
तेरी बातों के बिना...
सारी आवाजों को दबाए बैठा है
किसी बर्बर तानाशाह की तरह
होंठ के भीतर हीं ,
ये आवाजें,
गले के ठीक नीचे तक भरी
कोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,
कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरह
कोई थक के शांत बैठ गई है
ये दबी हुई आवाजें,
जिनका कि शक्ल अब शोर के जैसा है,
जब बौखलाहट बहुत बढ़ जाती है
हिचकियाँ बन के निकलती हैं
थोड़ा-थोड़ा
सन्नाटे के कान बचाती हुई।
Tuesday, November 18, 2008
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैं
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैं
बहुत थोड़े से दिन,
जब कुहरे में डुबे रहेंगे
ये गलियाँ, सड़कें
ये समय।
आर पार देखने के लिए
सूरज को आँखें फाडनी पड़ेगी,
नही सूझेगा
शहर का पुराना घंटाघर,
दूर-दूर तक नजर नही आएंगे
ये खिलखिलाते चटकदार दृश्य ,
दांत भींचे
ऊँकरू बैठी रहेगी सिगड़ी
और चाय के लिए
धोई जाने वाली पतीली
दांत कटकटाती सुनाई पडेगी
पेंड़ क़ी शाखों से टप- टप झड़ता रहेगा एकांत,
अल सुबह और शाम
उचाट उदासी पसरी रहेगी सड़कों पर,
और घड़ी-घड़ी हाथ रगड़ते नजर आएंगे
रिक्शे-तांगे वाले
इन सबके बाबजूद
मुझे इंतेज़ार है
उन कुहरे वाले दिनो का
क्यों कि तुमने कहा है कि
उन दिनो तुम मेरे शहर में रहोगी।
मैं बहुत खुश हूँ कि
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैंजब तुम मेरे शहर में रहोगी।