जब भी चली जाती हो तुम मायके
मैं एक एक कर
याद करता हूँ
अपनी सारी पुरानी प्रेमिकाएं
निकालता हूँ
कवर से गिटार
और रात देर तक उसके तारों को
छूते हुए कोशिश करता हूँ
महसूसना उन पुरानी प्रेमिकाओं को
कभी पार्क की
फिसल पट्टी पे लेट कर
आधा चाँद देखते हुए
सोंचता हूँ अधूरे प्रेमों के बारे में
और 'रात को रोक लो' वाला गाना गाता हूँ
निकालता हूँ
अपनी पुरानी लिखी कवितायें
एक दो पढता हूँ
और फ़िर रख देता हूँ
उनमें गंध आ गई है वैसी जैसी
बहुत दिन से पेटी में पड़े
पुराने कपडों में हो जाती है
और ये सब कर के
जब थक जाता हूँ
और हो जाता हूँ उदास
बनाता हूँ
मग भर कड़क काली चाय
और तुम्हें याद करते हुए पीता हूँ
और अगली सुबह
तुम्हें फोन करके पूछता हूँ
कब आ रही हो !!!