देह के बाहर जाकर
एक बेचैनी
चहलकदमी करती है देर रात तक,
शरीर में जरा दम सा घुटता है
बाहर बरामदे में
बिना बांह वाली एक कुर्सी है
जिस पे वो बैठ जाती है जरा-जरा देर चल कर
वहां एक सिगरेट लेने लगती है धुंआ अपने भीतर
शरीर से खींच-खींच कर
अन्दर धुंआ है अभी भी बहुत सारा और
बाहर धुंध पसरी है पलकों के क्षितिज पर,
परन्तु दृढ़ता से यह कहा जा सकता है कि
एक ख्वाब अभी भी टिमटिमा रहा होगा वहां
हालांकि वह बिना चाँद के होगा
पर उसके लिए यह दृढ़ होने का नही वरन कांपने का वक्त है
अचानक से नींद खींच कर उतार जो दी गई है
वक्त को काट दिया गया है
पर अभी भी वो बचा हुआ है
और जितना भी अब बचा है
शायद उसे और नही काटा जा सकता
तुम्हें गर ये मालुम होता कि
रात कितनी बची हुई है
और कि वक्त को अब और काटा नही जा सकता
तो तुम कभी ये नही कहती
कि रातों को बातें नही किया करेंगे हम
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Tuesday, December 22, 2009
Thursday, February 5, 2009
तेरी बातों के बिना...
बहुत तेज सन्नाटा है !
सारी आवाजों को दबाए बैठा है
किसी बर्बर तानाशाह की तरह
होंठ के भीतर हीं ,
ये आवाजें,
गले के ठीक नीचे तक भरी
कोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,
कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरह
कोई थक के शांत बैठ गई है
ये दबी हुई आवाजें,
जिनका कि शक्ल अब शोर के जैसा है,
जब बौखलाहट बहुत बढ़ जाती है
हिचकियाँ बन के निकलती हैं
थोड़ा-थोड़ा
सन्नाटे के कान बचाती हुई।
सारी आवाजों को दबाए बैठा है
किसी बर्बर तानाशाह की तरह
होंठ के भीतर हीं ,
ये आवाजें,
गले के ठीक नीचे तक भरी
कोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,
कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरह
कोई थक के शांत बैठ गई है
ये दबी हुई आवाजें,
जिनका कि शक्ल अब शोर के जैसा है,
जब बौखलाहट बहुत बढ़ जाती है
हिचकियाँ बन के निकलती हैं
थोड़ा-थोड़ा
सन्नाटे के कान बचाती हुई।
Tuesday, November 18, 2008
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैं
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैं
बहुत थोड़े से दिन,
जब कुहरे में डुबे रहेंगे
ये गलियाँ, सड़कें
ये समय।
आर पार देखने के लिए
सूरज को आँखें फाडनी पड़ेगी,
नही सूझेगा
शहर का पुराना घंटाघर,
दूर-दूर तक नजर नही आएंगे
ये खिलखिलाते चटकदार दृश्य ,
दांत भींचे
ऊँकरू बैठी रहेगी सिगड़ी
और चाय के लिए
धोई जाने वाली पतीली
दांत कटकटाती सुनाई पडेगी
पेंड़ क़ी शाखों से टप- टप झड़ता रहेगा एकांत,
अल सुबह और शाम
उचाट उदासी पसरी रहेगी सड़कों पर,
और घड़ी-घड़ी हाथ रगड़ते नजर आएंगे
रिक्शे-तांगे वाले
इन सबके बाबजूद
मुझे इंतेज़ार है
उन कुहरे वाले दिनो का
क्यों कि तुमने कहा है कि
उन दिनो तुम मेरे शहर में रहोगी।
मैं बहुत खुश हूँ कि
अब बहुत थोड़े से दिन बचे हैंजब तुम मेरे शहर में रहोगी।
Monday, October 13, 2008
बातें जगह घेरती हैं
ढूँढती रहती है अफ़सानों में अपनी जगह
खोलती रहती हैं पुरानी सन्दुकेन
यादों की पुरानी जंग लगी तहें.
बातें दूर तक साथ जाती हैं
गर उन्हें किसी नम रसीले गले का सहारा मिल जाता है
गर किसी अहसास के साथ उन्हें किसी अफ़साने में जगह दे दी जाती है.
पर आवाज़ और अफ़साने की गैर हाज़िरी में भी वे
अपने पूरे वजूद के साथ जिंदा रहती है
और वक़्त बे-वक़्त हमें सराबोर करती रहती है
बातों का वजूद हमारे अडोस पड़ोस में हमेशा जगह घेरती है
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