और ये बंजारा जिस्म, मेरा
और एक भटकाव है उस मौन में
जो ख़त्म हीं नहीं होता
आँखे तेरी गुम हो गयी आवाज के निशाँ ढूँढती है
वक्त खानाबदोश हो गया है
रोज डेरा बदल लेता है
गाड़ देता है तम्बू , जहाँ भी कोई आहट ,
धुंधली सी भी आहट सुनाई दे जाती है
तेरी आवाज की
बस एक बार वो ध्वनियाँ मिल जाएँ
जिनमे तुम बुलाया करती थी मुझे
तो अपना वक्त उससे टांक दूं
और खत्म करून ये सफ़र.