मुहब्बत मानो फिर लौटी है
बांहों को एक नाजुक से आगोश की आमद है
धडकनों को कुछ और धडकनों की आहट है
चाँद फिर कंगन सा है
और सितारे फिर आँचल सा
यूँ लगता है कि
वो मेरी उंगलियाँ ले जा कर
अपने हारमोनिअम पे टिका लेने वाली है
और मैं पिआनो की तरह बज जाने वाला हूँ
मैं जानता हूँ कि
इस भरी हुई रात में
मैं लिखूं गर कोई नज्म
तो उसके हर सफ्हे में मौजूद होओगी तुम
और तुम्हारी मुहब्बत भी
पर लिखने से पहले
याद आ जाती है वो पुरानी नज्में मेरी
जहाँ से चली गयी थी
वो और उसकी मुहब्बत...
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Friday, February 19, 2010
Friday, August 7, 2009
तुम्हारे मूड का भी न, कोई भरोसा नही !
एक अरसे बाद
बिताया सारा दिन आज तुम्हारे साथ
सुबह, तुम्हारे ख्वाब में आँख खोली थी
फ़िर बरामदे में कुर्सी डाले मारता रहा तुमसे गप्प
पूरे इत्मीनान से,
इसी बीच खत्म की चाय की दो प्यालियाँ भी
फ़िर कमरे में आकर,
रोशनदान से आती हुई धुप की जिस बारीक गरमाहट में
भींगता पड़ा रहा देर तक बिस्तर पे,
वो भी तुम्हारी हीं थी
जब नहाने गया तो
वहां भी आ गई तुम
पीठ पे साबुन मलने के बहाने
परोसा खाना अपने हाथ से
खाया मेरे साथ हीं आज कितने दिन बाद
और मेरे सिंगल-बेड पे मेरे साथ लेट कर फ़िर
सुनाती रही मुझे नज्में
फिर जरा सा आँख लगते हीं जाने कहाँ चली गई
उठा तो देखा कि शाम थी और उदासी थी
तुम्हारे मूड का भी न, कोई भरोसा नही!
बिताया सारा दिन आज तुम्हारे साथ
सुबह, तुम्हारे ख्वाब में आँख खोली थी
फ़िर बरामदे में कुर्सी डाले मारता रहा तुमसे गप्प
पूरे इत्मीनान से,
इसी बीच खत्म की चाय की दो प्यालियाँ भी
फ़िर कमरे में आकर,
रोशनदान से आती हुई धुप की जिस बारीक गरमाहट में
भींगता पड़ा रहा देर तक बिस्तर पे,
वो भी तुम्हारी हीं थी
जब नहाने गया तो
वहां भी आ गई तुम
पीठ पे साबुन मलने के बहाने
परोसा खाना अपने हाथ से
खाया मेरे साथ हीं आज कितने दिन बाद
और मेरे सिंगल-बेड पे मेरे साथ लेट कर फ़िर
सुनाती रही मुझे नज्में
फिर जरा सा आँख लगते हीं जाने कहाँ चली गई
उठा तो देखा कि शाम थी और उदासी थी
तुम्हारे मूड का भी न, कोई भरोसा नही!
Monday, July 6, 2009
कुछ कच्ची नज़्में
कच्ची रह गयी कुछ नज़्में
इस बार भी आम के मौसम में
अभी और बड़े होने थे
पकने थे, और खूशबुएं आनी थी उनमे से
पर तेज अंधर आए
और झाड़ गये डालियां
जिसके हाथ जो लगा
वही लूट ले गया
हर साल लूटी जाती हैं कुछ कच्ची नज़्में
इस बार भी आम के मौसम में
अभी और बड़े होने थे
पकने थे, और खूशबुएं आनी थी उनमे से
पर तेज अंधर आए
और झाड़ गये डालियां
जिसके हाथ जो लगा
वही लूट ले गया
हर साल लूटी जाती हैं कुछ कच्ची नज़्में
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