मुहब्बत मानो फिर लौटी है
बांहों को एक नाजुक से आगोश की आमद है
धडकनों को कुछ और धडकनों की आहट है
चाँद फिर कंगन सा है
और सितारे फिर आँचल सा
यूँ लगता है कि
वो मेरी उंगलियाँ ले जा कर
अपने हारमोनिअम पे टिका लेने वाली है
और मैं पिआनो की तरह बज जाने वाला हूँ
मैं जानता हूँ कि
इस भरी हुई रात में
मैं लिखूं गर कोई नज्म
तो उसके हर सफ्हे में मौजूद होओगी तुम
और तुम्हारी मुहब्बत भी
पर लिखने से पहले
याद आ जाती है वो पुरानी नज्में मेरी
जहाँ से चली गयी थी
वो और उसकी मुहब्बत...
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Friday, February 19, 2010
Thursday, October 1, 2009
मुद्दत तलक वो मुझे फूंकती थी !
किसी ने उसे कभी दिया था जला
पीने से पहले वो मुझे फूंकती थी
बादल को मैंने कहा था कभी
कि बूँदें तुझे एक दिन छोड़ देंगी
मुहब्बत की ताजी नजर से गिरी हो
कायनात को तुम डुबो के रहोगी
कड़ी धूप में जिंदगी तप रही है
मैंने तेरे सारे छाँव खो दिए हैं
छोड़ दिया उसने जब ख्वाबों में आना
मैंने भी छोड़ दिए ख्वाब सजाना
सब कुछ हो जब बिलकुल हीं सही
कोई न कोई कांच टूट जाता वहीँ
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