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Tuesday, March 30, 2010

आवाज की हमने कभी नही सुनी !

सुबह-सुबह इक ख्वाब गिर गया है आँख से
नींद काँप उठी थी शोर से

आवाज,
जिसकी अन्तिम स्थिति मौन होनी चाहिए थी
संगीत से निकल कर
शोर हो चुकी है

हमारे समानांतर
परन्तु तेज बढ़ते हुए
यह हिला देगी
एक दिन इस पूरी कायनात को

केवल वही कान बचे रह जायेंगे
जो सुन पायेंगे
कर्णातीत ध्वनियों को

सुनने के सम्बन्ध में कुछ भी हो सकता है
जिसके बारे में अभी से तय करना
मामले को कम गंभीरता से लेना है

गलती हमारी है
हमने कभी
ये जानने की कोशिश नही की
कि दिनानुदिन बढती हुई चीखों में
वह चीख-चीख कर क्या कह रही है

आवाज की हमने कभी नही सुनी !!

Thursday, October 1, 2009

मुद्दत तलक वो मुझे फूंकती थी !

किसी ने उसे कभी दिया था जला
पीने से पहले वो मुझे फूंकती थी

बादल को मैंने कहा था कभी
कि बूँदें तुझे एक दिन छोड़ देंगी

मुहब्बत की ताजी नजर से गिरी हो
कायनात को तुम डुबो के रहोगी

कड़ी धूप में जिंदगी तप रही है
मैंने तेरे सारे छाँव खो दिए हैं

छोड़ दिया उसने जब ख्वाबों में आना
मैंने भी छोड़ दिए ख्वाब सजाना

सब कुछ हो जब बिलकुल हीं सही
कोई न कोई कांच टूट जाता वहीँ