सुबह-सुबह इक ख्वाब गिर गया है आँख से
नींद काँप उठी थी शोर से
आवाज,
जिसकी अन्तिम स्थिति मौन होनी चाहिए थी
संगीत से निकल कर
शोर हो चुकी है
हमारे समानांतर
परन्तु तेज बढ़ते हुए
यह हिला देगी
एक दिन इस पूरी कायनात को
केवल वही कान बचे रह जायेंगे
जो सुन पायेंगे
कर्णातीत ध्वनियों को
सुनने के सम्बन्ध में कुछ भी हो सकता है
जिसके बारे में अभी से तय करना
मामले को कम गंभीरता से लेना है
गलती हमारी है
हमने कभी
ये जानने की कोशिश नही की
कि दिनानुदिन बढती हुई चीखों में
वह चीख-चीख कर क्या कह रही है
आवाज की हमने कभी नही सुनी !!
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Tuesday, March 30, 2010
Monday, August 31, 2009
दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है !
एक लम्बे दुःख ने
थका दिया है मुझे
या फिर उबा दिया है शायद
सुबह उठ कर जो आ बैठा था
बालकनी में इस कुर्सी पर
तब से कितने गोल दागे बच्चों ने
सामने खेल के मैदान में
पर पसीना नहीं आया मुझे
दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है
लहू मांगती है अब
सुख का ताप, थोडा सा
और
जिस्म पसीना मांगता है
सुबह-सुबह आईने में
मेरा चेहरा भी मांगता है
एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों
और एक बदन
जो सारी उबासी निकाल चुका हो
मन के पोर भी
बजते हैं बेचैन होकर,
सुनाई देती है उनकी थकन
अपनी हीं हथेली से
दबाता रहता हूँ उन्हें
पर कई हिस्से छूट जाते हैं
तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??
थका दिया है मुझे
या फिर उबा दिया है शायद
सुबह उठ कर जो आ बैठा था
बालकनी में इस कुर्सी पर
तब से कितने गोल दागे बच्चों ने
सामने खेल के मैदान में
पर पसीना नहीं आया मुझे
दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है
लहू मांगती है अब
सुख का ताप, थोडा सा
और
जिस्म पसीना मांगता है
सुबह-सुबह आईने में
मेरा चेहरा भी मांगता है
एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों
और एक बदन
जो सारी उबासी निकाल चुका हो
मन के पोर भी
बजते हैं बेचैन होकर,
सुनाई देती है उनकी थकन
अपनी हीं हथेली से
दबाता रहता हूँ उन्हें
पर कई हिस्से छूट जाते हैं
तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??
Thursday, August 27, 2009
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है !
एक सन्नाटा है यहाँ अब
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ
सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही
सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह
हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है
जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ
सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही
सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह
हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है
जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा
Monday, August 24, 2009
छोटे-छोटे फासले !
(१)
लम्बी दूरी की
कॉल दरें
घटाई जा रही हैं !
बातें, अब
दूरियां कम करने के लिए
नही की जाती
(२)
एक जगह होती है,
चोट को
अक्सर वहीं लगना होता है
दिल को
बार-बार
उसी जगह से टूटना होता है
(३)
कुछ चोटें
यूँ लग जाती हैं
कि फ़िर ,
नाखून
कभी नही जमते दुबारा
(४)
कुछ दुःख,
लाख छींटें मारो आंखों में
पानी के,
आँख छोड़ कर नहीं जाते
कुछ दुःख, लाख छुपाओ पकड़ लिए जाते हैं
(५)
कुछ उगी हुई फुंसियाँ,
कुछ घाव
फटें होंठ और सुखा मौसम
तुम्हें भूलने में काम आ रहे हैं !
लम्बी दूरी की
कॉल दरें
घटाई जा रही हैं !
बातें, अब
दूरियां कम करने के लिए
नही की जाती
(२)
एक जगह होती है,
चोट को
अक्सर वहीं लगना होता है
दिल को
बार-बार
उसी जगह से टूटना होता है
(३)
कुछ चोटें
यूँ लग जाती हैं
कि फ़िर ,
नाखून
कभी नही जमते दुबारा
(४)
कुछ दुःख,
लाख छींटें मारो आंखों में
पानी के,
आँख छोड़ कर नहीं जाते
कुछ दुःख, लाख छुपाओ पकड़ लिए जाते हैं
(५)
कुछ उगी हुई फुंसियाँ,
कुछ घाव
फटें होंठ और सुखा मौसम
तुम्हें भूलने में काम आ रहे हैं !
Thursday, August 20, 2009
Saturday, July 18, 2009
नींद कों अभी और जागना था !!
उसने सांस छुडा लिए अपने
अब मैं बिना धड़कन हूँ
उसकी यादें रिसती रहती हैं
मन पे काई जम आई है
तुम एक सुकून की रात हो
तुझमें जाग कर यूँ लगता है
कोई मुकम्मल नज्म नहीं है अभी
मुकम्मल तो कुछ भी नहीं
कमरे में सांस बची नहीं थी बिलकुल
उसने सारे दरवाजे बंद कर दिए थे
हम थकने की हद तक थक गए थे
पर नींद कों अभी और जागना था
अरसे तक रिश्ते खुले रह गए
फिर वे कहीं चले गए बिना बताये
तुम अपनी बाहों में फैला लो मुझे
तंग गलियों में मेरा ठिकाना है
अब मैं बिना धड़कन हूँ
उसकी यादें रिसती रहती हैं
मन पे काई जम आई है
तुम एक सुकून की रात हो
तुझमें जाग कर यूँ लगता है
कोई मुकम्मल नज्म नहीं है अभी
मुकम्मल तो कुछ भी नहीं
कमरे में सांस बची नहीं थी बिलकुल
उसने सारे दरवाजे बंद कर दिए थे
हम थकने की हद तक थक गए थे
पर नींद कों अभी और जागना था
अरसे तक रिश्ते खुले रह गए
फिर वे कहीं चले गए बिना बताये
तुम अपनी बाहों में फैला लो मुझे
तंग गलियों में मेरा ठिकाना है
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