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Friday, August 7, 2009

तुम्हारे मूड का भी न, कोई भरोसा नही !

एक अरसे बाद
बिताया सारा दिन आज तुम्हारे साथ

सुबह, तुम्हारे ख्वाब में आँख खोली थी
फ़िर बरामदे में कुर्सी डाले मारता रहा तुमसे गप्प
पूरे इत्मीनान से,
इसी बीच खत्म की चाय की दो प्यालियाँ भी

फ़िर कमरे में आकर,
रोशनदान से आती हुई धुप की जिस बारीक गरमाहट में
भींगता पड़ा रहा देर तक बिस्तर पे,
वो भी तुम्हारी हीं थी

जब नहाने गया तो
वहां भी आ गई तुम
पीठ पे साबुन मलने के बहाने

परोसा खाना अपने हाथ से
खाया मेरे साथ हीं आज कितने दिन बाद
और मेरे सिंगल-बेड पे मेरे साथ लेट कर फ़िर
सुनाती रही मुझे नज्में

फिर जरा सा आँख लगते हीं जाने कहाँ चली गई
उठा तो देखा कि शाम थी और उदासी थी

तुम्हारे मूड का भी न, कोई भरोसा नही!