Saturday, April 11, 2009

एक सबसे ख़ूबसूरत घटना का एक और जन्म

वो बालकनी में अपने लंबे बालों के साथ है
एक ठीक निश्चित वक्त पे आ जाती है वो कंघा लेकर
वो नीचे जाता हुआ होता है
लगभग उसी वक्त पर

एक दूसरे को देखकर वे दोनों अपने चेहरे सँभालते हैं
वह उसके आंखों में गिरती अपनी आंखों को तीव्रता से रोक लेती है
वह अपनी नजरों को तीव्रता से ऊपर ले जा कर
उसके वजूद में गिरा देता है
और लौटा लेता है

धीरे-धीरे वो अपनी आंखों को ढील देने लगती है
वो भी एक जगह खोज कर वहां होने लगता है
जहाँ से बालकनी उसके लंबे बालों के साथ नजर आती है

कई शामें बीत चुकी हैं
अब वे एक दुसरे को वाद्य यंत्रों पे सुनते हैं
और टेलीविजन पे देखते हैं
अपने साथ नाचते और गाते हुए

प्रकृति की एक सबसे ख़ूबसूरत घटना का
एक और जन्म हो चुका है

Wednesday, April 8, 2009

मुझे कई बार पहले भी हुआ है प्यार !

मेरे लिए मुश्किल है
तुम्हारी आंखों में देखना
इसलिए नही कि
मैंने कोई अपराध किया है
बल्कि इसलिए
कि मेरी आंखों में उभरा हुआ होता है प्यार
जब मैं देखता हूँ तुम्हारी तरफ़
और मैं उसे तुम्हारी जानकारी में
नही लाना चाहता

मैं नही बात करना चाहता
क्यूंकि डरता हूँ
कहीं जबान लड़खड़ा न जाए
और इजहार न हो जाए

मुझे कई बार पहले भी हुआ है प्यार
इसलिए मैं जान सकता हूँ
कि ये प्यार हीं है
और कुछ नही इसके अलावा
और ऐसा भी नही है कि
ये जरा सा भी कम है उस प्यार से
जो मुझे पहली बार हुआ था
और अनुभव से जानता हूँ
कि इसका कोई इलाज नही है

पर फिर भी नही लाना चाहता हूँ
तुम्हारी जानकारी में क्यूँ कि
रिश्ते को अंजाम तक नही ले जा पाने की स्थिति में
जो जख्म जनमता है,
उसे झेलने की और
हिम्मत नही है मुझमे।

Tuesday, April 7, 2009

कल रात वो घर आई थी !

वो घर आई थी
कल रात
इतने सालों बाद

हर कमरे में एक बार घूम कर
मुआयना करने के बाद
उसने कहा-
तुमने वक्त पे झाडू क्यूँ नही लगायी अब तक

वो लम्हे जो बहर जाते-
मैंने कहा

घर जमा लो
और इन मरते लम्हों का अब क्या करना-
उसने कहा

थोडी देर चुप रह कर मैंने कहा -
इन्हे मरता हुआ क्यूँ कह रही हो

तुम जब तक आगे नही बढोगे
मैं भी नही बढ़ पाउंगी
और हम नही बढे
तो हमारे वे लम्हे ...
-वो बीच में हीं रूक गई !

मैंने कहा- ठीक है

इस बार शायद वो कभी न आने के लिए चली गई है .

Sunday, April 5, 2009

जाने कितने साल और!

तीन साल हुए
जब वो चली गई थी

आज भी नींद में
मेरे हाथ उसको बिस्तर पे खोजते हैं
और टटोलते हुए
उसे न पाकर
जाग जाते हैं

अपने सपनो में
कई बार पा भी लेता हूँ उसे
पर मेरे जागने से पहले
हर बार
वो उठ कर चली गई होती है

उसके पास वो बाहें थी
जो मुझे घेर लेती थीं सोते वक्त
और स्पर्श
जिसे वो मेरी उँगलियों में फंसा देती थी
मेरे उदास क्षणों में

मेरी यात्राओं में
अब उदासी उपजती है जब भी
उन उँगलियों की अनुपस्थिति मुझे
और कर देती है उदास
और रातों को मैं बार बार गिरता हूं
उसके घेरे के बिना
मृत्यु में
और वहां से ख़ुद हीं उठ कर आना पड़ता है मुझे

अभी तो सिर्फ़ तीन साल हीं बीते हैं
जाने कितने साल और
मुझे यूँ हीं गिरते रहना पड़ेगा मृत्यु में
और जीते रहना पड़ेगा
उजाड़ और उदासी के साथ.

Saturday, April 4, 2009

थोडी देर और !

कोई लब्ज नही,
कोई तरीका नही है मेरे पास
जिसके इस्तेमाल से
लिखी जा सके
मेरे भीतर उठ रहीं लपटें

बदन पे
जगह-जगह उगते
चेचक के जैसे फफोले
घड़ी -घड़ी फटता हुआ एक बम
और छिन्न-भिन्न होता हुआ कलेजा
किस तरीके से लिखा जा सकता है भला

मैं जानता हूँ
आपके लिए भी
मुश्किल होगा बता पाना
अगर मैं पूछूँगा

ये कमजोर लफ्ज
कहाँ तक छू भी पायेंगे
मेरे अन्दर के विस्फोटों को
उन लपटों को
इसका अंदाजा आप सब
आप सब लिखने वाले लोग
जरूर लगा पायेंगे
जो शब्दों की कमजोरी जानते हैं

पर फ़िर भी गर
मैं लेता हूँ
इन कमजोर शब्दों का सहारा
और कहता हूँ अपनी लपटें
ये जानते हुए भी कि कह न सकूंगा,
तो सिर्फ़ इस उम्मीद में
कि शायद ये कम कर सकें
मेरी लपटें,
मेरे विस्फोटों को लेश-मात्र भी

और मैं सह सकूं
उन लपटों
उन फफोलों को
थोडी देर और !