Monday, August 15, 2022

आजाद होना संप्रभु राष्ट्र का बस हिस्सा होना भर नहीं है

चाहे कितने भी बरस बीत गए हों 
आजाद रहते किसी देश को 
और कितने भी ज्यादा आजाद 
होते चले हों गए हों वहां के लोग 

हर किसी में 
थोड़ी और आजादी की गुंजाइश 
हमेशा बची रहती है

रोज नए फंदे हैं 
रोज नयी जकड़नें  
गुलाम होते चले जाना इतना आसान और लुभावना है

आजाद होना और आजादी कायम रखना मगर 
मशक्कत से भरी एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना है 
जो होता है कइयों के लिए अंतहीन भी  

आजादी की प्रक्रिया के बारे में 
वह आदमी 
शायद सबसे बेहतर बता पायेगा
जो सबसे ज्यादा लड़ कर आजाद हुआ हो
या फिर वो जो सबसे ज्यादा लड़ कर भी गुलाम हीं हो अब तक 

अपनी लड़ाई से जाना है मैंने कि 
आजादी सापेक्षता के सिद्धांत के परे नहीं है 
जैसे कि गरीबी या फिर अमीरी 

हम सब पारस्परिक आजादी की यात्रा में हैं 
हमारी आजादी असमान है 
हममें से ज्यादातर के लिए आजादी अभी दूर की चीज है

और हर घर तिरंगा लाने की, फहराने की जिम्मेवारी हमारी है 
ज्यादा उनकी जो आजादी के ज्यादा नजदीक खड़े हैं...

Sunday, March 6, 2022

उम्मीद का विकल्प कुछ नहीं है



उम्मीद से शुरू करते हैं युद्ध की कविता

कविता चाहे कोई भी हो
उम्मीद का होना जरूरी मानते आए हैं कवि
और  युद्ध के परिणाम में क्योंकि मुझे कोई उम्मीद नजर नहीं आती 
मैं सोचता हूं उम्मीद को कविता के शुरुआत में रख देना ठीक रहेगा 
और अगर बाद में आ जाए तो बाद में फिर देख लेंगे 
क्योंकि युद्ध के बाद का क्या पता

तो पहली उम्मीद तो यह 
कि खत्म हो यह युद्ध शीघ्र ही 
और दूसरी कि आगे से तकनीकों का ठीक से इस्तेमाल हो युद्ध में 
क्योंकि यह उम्मीद करना कि आगे से युद्ध ना हो
नासमझी की उम्मीद लगेगी
तो रोबोट से लड़े जाएं युद्ध, रोबोट मारे जाएं 
और ठिकाने बर्बाद किए जाने किए जाने हो अगर
तो रोबोट के ठिकाने तबाह किए जाएं
राष्ट्राध्यक्ष मान ले अपनी हार या जीत रोबोटिक हार या जीत के आधार पर 
अपने नाक के लिए या नाकामियों को छिपाने के लिए तथाकथित अपनों को तबाह ना करें राष्ट्राध्यक्ष

मिलती-जुलती एक उम्मीद और कि
आम अवाम को दूर रखा जाए युद्ध से
उन्हें बंकरो में ना जाना पड़े, 
मजबूरी में चलकर देश की सरहद न लांघने पड़े
बच्चे स्कूल जाते रहे तथा कारखानों और अस्पतालों में काम होता रहे

सबसे अच्छा तो शायद यह होगा कि
किसी वीडियो गेम की तरह खेल लिए जाएं युद्ध
सारी दुनिया के संगठन उस युद्ध को माने सचमुच का युद्ध
मीडिया उसे उसी तरह का दिखाएं
लोग उसी तरह डरें और चर्चा करें आशंकाओं के बारे में
फिर सारी दुनिया लोहा मान ले जीतने वाले का 
और हुकूमत सौंप दे उसके हाथों में 

और फिर जब किसी राष्ट्राध्यक्ष को लगे 
कि वह ज्यादा ताकतवर हो गया है 
कि उसके पास एक अच्छी सेना है जो अच्छा खेल सकती है युद्ध को
तो ललकार ले जिसको चाहे उसे

कूल मिलाकर मेरा इतना कहना है
राष्ट्राध्यक्ष खोजें युद्ध का कोई एक नया तकनीकी विकल्प 
जैसे उपनिवेशवाद के बाद खोजा गया नव-उपनिवेशवाद!

युद्ध का विकल्प हो सकता है 
उम्मीद का भी हो सकता है क्या?

Saturday, December 4, 2021

आवाज के सुनाई देने तक

आवाज अगर कहीं है 
तो वह निकल आएगी 
कहीं से भी, कभी ना कभी
और किसी न किसी को जरूर सुनाई दे जाएगी

सुनाई दिए जाने तक 
ठहर कर इंतजार करती है वह
अनसुना करो तो तेज होने लग जाती है
या फिर कोई और कान तलाशने निकल जाती है
अपने होने और निकलने की जगह बदल सकती है आवाज 
वह दबकर ज्यादा देर नहीं रहती

बहुत समय से दबाई गई आवाज का भी 
समय के किसी न किसी बिंदु पर निकल जाना  तय है
हां पर निकलने का रास्ता और तरीका वो खुद तय करेगी

कभी इस तरह निकलती है वह 
कि लगता है निकलने की ही आवाज है
और कभी इस तरह कि निकलने का पता ही नहीं चलता
हर तरफ सिर्फ आवाज ही आवाज

आवाज को साथ बैठने के लिए
कोई दूसरी आवाज जरूर चाहिए होती होगी
पर क्या शोर वाली जगहों पर कई आवाजें एक साथ बैठी होती है और कर रही होती है बतकही 
या फिर क्या रो रही होती हैं एक साथ बैठकर कई आवाजें 
या फिर यूं भी कि तोड़े जाने के खिलाफ वह हो रही होती हो लामबंद

नहीं मालूम कि 
आवाज को तोड़ते जाने से आखिर में क्या मिलेगा
और जो मिलेगा उस आवाज के कण को क्या कहेंगे
क्या वह एटम जैसी कोई चीज होगी 
जिससे कोई आणविक विस्फोट भी हो सकता है 

तो फिर क्या कोई विस्फोट होने वाला है
क्योंकि आवाज को तोड़े जाने का सिलसिला जारी है

क्या तुम सुन पा रहे हो 
तुम्हारी आवाज को कोई आवाज दे रहा है

Tuesday, November 9, 2021

तुम्हारी यादों के ठीक सामने

दिवाली है,
बोनस में थोड़ा वक्त मिला है 
यादों की सफाई कर रहा हूं

कुछ समय के लिए छोड़ दो तो
कई तरह के झाड़ झंखाड़ उग आते हैं 
और खड़े हो जाते हैं 
उन यादों के सामने
जिन्हें मन अपने ड्राइंग रूम में 
ठीक सामने रखना चाहता हैं 
कि आते जाते जब जरा सी भी फुर्सत हो 
तो उसके ठीक पास बैठने का सुकून हासिल हो

कुछ तो 
मकड़ी के जालों जैसे हैं
बड़ी आसानी से साफ हो जा रहे हैं 
और यादों की तस्वीर खुलकर साफ सामने आ जाती है
और कुछ जिद्दी, पुरानी जमी काई की तरह
छुड़ाए नहीं छूट रहे
ज्यादा खुरच दो 
तो तस्वीर का कोई हिस्सा ही 
साथ में बाहर लेकर आ जाए इस तरह
जैसे यादों के देह पर कोई घाव

सफाई के दौरान मिली हैं कई ऐसी भी यादें 
जो टूटे-फूटे रद्दी के सामानों के अंबार के पीछे दबकर लगभग खो सी गई थी 
पर जब मिल गई तो लगा वे वही थी, कहीं खोई नहीं थी

करीने से लगा दी है
एक-एक कर झाड़ पोछ कर 
कई यादों को सहेज कर रख दिया है
ड्राइंग रूम में ठीक सामने तुम्हारी यादों को रखा है
वहां साफ सफाई होती रहेगी

© ओम आर्य

Saturday, May 29, 2021

हाथी का समाचार!

एक हाथी है जो घोड़े बेच कर सो रहा है 
जबकि जंगल में हाहाकार मचा है 
कोई उसे जगाने जाए 
तो वह पागल होने लगता है

एक समाचार है 
जो लगातार तोड़ने के प्रयास में है
वह न तोड़ पाने के दबाव में टूटता जा रहा है

एक समाचार वाचक है जो जानबूझकर भूल गया है 
समाचार और विचार में फर्क
उसका सारा जोर इस बात पर है 
कि किस तरह समाचार में विचार जोड़ा जाए, आवाज का हथोड़ा जोड़ा जाए
कि वह ब्रेकिंग हो जाए

आप कह सकते हैं 
कि हाथी के घोड़े बेच कर सोने वाली बात में समाचार और समाचार वाचक क्या कर रहा है
तो मैं कहूंगा हाथी की नींद
इसलिए नहीं टूट रही क्योंकि समाचार टूट गया है!

Sunday, May 16, 2021

तुम बताओ अपना हम अपना क्या बताएं!

तुम बताओ अपना हम अपना क्या बताएं!
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जब तुम पूछते हो हमारा हाल और हम कहते हैं कि हम ठीक हैं 
तो हमें सही सही पता नहीं होता कि हम कितने ठीक हैं 
और ना ही तुम्हें पता चल पाता होगा कि हम कितने ठीक हैं जब हम बताते हैं

कोई पूछता है तो बिल्कुल सही सही नहीं 
पर एक हद तक हम आकलन कर लेते हैं कि सामने वाले को 
अपने ठीक होने के बारे में कितने संक्षिप्त या विस्तार से बताना है 
और वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हाल किस तरह पूछा छा गया है 
या पूछने वाला कौन है

यह अजीब समय है 
कि इस समय में खैरियत पूछना और जानना कितना जरूरी हो गया है हर किसी के बारे में 
पर उतना ही मुश्किल हो गया है जानकर कुछ कर पाना

संवेदनाएं कोई वस्तु नहीं है 
कि उन्हें ऑनलाइन भेजा या मंगाया जा सके, 
उन्हें बिना गले लगे या लगाए, 
अप्रत्यक्ष रूप से, पहुंचाने या प्राप्त करने का कोई तरीका अभी सामने नहीं आया है
पर हम किसी तरह इमोटिकॉन्स के सहारे चला रहे हैं अपना काम
पर सदमे के लिए नहीं बना है अभी तक कोई इमोटिकॉन भी 
जब सब कुछ जज्बात में धंसा हुआ सा होता है

एक तरफ हम पर 
सकारात्मक बने रहकर अपने दुखों को इग्नोर करते रहने का बोझ है
और दूसरी तरफ 
हम इतने दुखों में शामिल हैं कि शामिल होने के लिए दुख कम पड़ रहे हैं!

© ओम आर्य

Thursday, May 13, 2021

मरे हुए चुपचाप घर लौट कर!

हमने कुछ लाशों को गिना
और वे ढाई लाख हुए
और उससे कई गुना लाशों को हमने नहीं गिना
या फिर
उन्हें गिनती की दायरे के बाहर धकेल दिया
उनकी संख्या हमें नहीं मालूम
वे कितने हुए

भेदभाव हमारे खून में है 
कहने के लिए हमारे खून का रंग लाल है

यह हमारे चलन में हैं
कि कुछ लाशों को हम नहीं गिनते 
बस दबाते जाते हैं मिट्टी के भीतर
या बहाते जाते हैं पानी में
और कभी कुछ जिंदो को भी
अपनी जरूरत के अनुसार

आंकड़ों में देश अच्छा दिखना चाहिए
और इसके लिए हम कुछ भी खराब कर सकते हैं 

सरकार कहती है कि लोग नहीं समझते 
कोर्ट कहता है सरकार नहीं समझती
व्यापार हिंसक रूप में है हर जगह
अस्पताल अंदर ही अंदर चुपचाप मार देता है
मर जाने वाले को भी 
और बच जाने वाले को भी
और व्यवस्था चुपचाप मर जाने देती है

और इस दरमियान
हम चुपचाप अपनी अपनी लाशें उठाए
लौटते हैं घर
चुपचाप... क्योंकि हम समझते हैं
कि खिलाफ में बोलने का यह समय नहीं है!






Thursday, May 6, 2021

इस महामारी के तंत्र में प्यार

मुझे नहीं पता तुम कहां हो 
कैसी हो, किस हाल में हो 
अब हो भी या नहीं हो
और इस महामारी में इस देश और दुनिया ने 
तुम और तुम्हारे शहर के साथ कैसा बर्ताव किया है

फिर से यह मानने में मुझे अच्छा हीं लगेगा
और जिनके सामने मानूंगा उन्हें भी निश्चित हीं 
कि मैं तुम्हें भूल नहीं सकता
क्योंकि उनका विश्वास और भी मजबूत होगा
कि प्यार कोई भूलने वाली चीज नहीं होती
और वे सब भी 
इस महामारी के एक-एक कर मरते दिनों में
कभी-कभी तो जरूर लौटते होंगे
अपने प्यार के फेसबुक या इंस्टाग्राम अकाउंट पर
हाल जानने के लिए

मुझे नहीं पता 
तुम किस छद्म नाम से फेसबुक पर हो 
या हो ही नहीं वहां
पर अब यह जरूर लग रहा है
कि अगर आपने किसी से कभी प्यार किया है 
तो फेसबुक पर सही नाम और तस्वीर के साथ 
एक अकाउंट जरूर रखना चाहिए 
और उसे नियमित अपडेट भी करते रहना चाहिए

ऐसा करना इसलिए जरूरी है
क्योंकि इस दुनिया के बहुत सारे देश, उनका तंत्र और लोग 
आदमी की खराब स्थिति को एक मौका मानते हुए अपनी ताकत और मुनाफे को
बढ़ाने के प्रयास में और तेजी से लग जाते हैं
और उस समय
आपको कोई प्यार करने वाला चाहिए होता है
जिसे पता हो आपकी स्थिति के बारे में

Friday, January 1, 2021

साल-दर-साल सिर्फ साल बदलते हैं!


वे कहीं से भी आए हो 
या फिर कहीं से भी नहीं आए हो
(क्योंकि उनमें से कई अब कहीं के नहीं है) 
वे यहीं हैं अपने संघर्ष, अपनी लड़ाई के मोर्चे पर
अपनी पसलियां ताने 
हर एक के पीछे वे दस हजार में हैं

वे अपना 
छोटा बड़ा जितना भी है घर और अनाज
पीठ पर लाद कर ले आए हैं
और बैठ गए हैं सड़क पर
सड़क जो कहीं भी जाती हुई दिखाई नहीं देती

वे जाड़े की ठिठुरती रात में
सड़क पर खड़े तंबूओं में बल्ली लगे हैं
वे गेहूं की बोरियां हैं, जलावन की लकड़ियां हैं
बेलती और फुलाती हुई रोटियां भी
सुबह सुबह की चाय की घूंट के साथ गले तक पहुंचने वाली गरमाई भी हैं
ट्रॉली के टायर और उसमें भरी हुई हवा भी हैं वे

वे वहां वैसे हैं जहां जैसी जरूरत है
मगर वे हैं वहीं आंदोलन के गीत में बजते हुए 
अपने अखबार की रोशनाई में छपते हुए

वे इतने हजार तरह के माइनस में हैं
कि माइनस में गया पारा भी 
अब उनकी हड्डियों को, उनके जज्बे और हौसले को छूने से पहले एक बार सोचता है
हुकूमत मगर फिर भी जिसे गला देना चाहती है

उन्हें आत्महत्याओं के आंकड़ों में मत देखिए
वहां वे सिर्फ इसलिए रखे गए हैं
क्योंकि सरकार को पता है 
कि उनकी हत्याओं की तहकीकात में 
किसका नाम आएगा

वे बार-बार निकल कर आते हैं 
आंकड़ों से बाहर सड़कों पर और पूछते हैं
कि हत्यारा कौन है
हत्यारा कहता है कि वो अब और हत्या नहीं होने देगा

वे कह रहे हैं कि वे वहीं  हैं
और उनका वहीं होना माना जाए 
तब भी 
जब वे चले गए होंगे
रोपाई कटाई के लिए अपने खेतों में
क्योंकि सड़क पर आंदोलन जोतना  
और मांगे रोपना
अब फसल उगाने के तरीके में शामिल कर लिया गया है

अगली बार वे जब आएंगे
तो अपना छोटा बड़ा जितना भी है खेत
सड़क पर ले आएंगे
और वहीं लहलहाएंगे और लहराएंगे आंदोलन!

© Om Arya

Photo Credit: scroll.in

Sunday, December 13, 2020

टमाटर का शोरबा

मैं बारिश होता हूं जो 
तो वह बाढ़ हो जाती है
इस लिए नहीं कि वह मुझे बहा ले जाए
बल्कि इसलिए कि मेरे पानी के लिए कोई रास्ता हो
उसके लिए 
भीगने के 
कुछ अलग ही मायने हैं

दिन हफ्ते और महीने में 
लगभग अनगिनत बार  
वह छू लेती है 
अपनी भरी आंखों से 
मेरी मिट्टी को
जहां उसने 
एक के बाद एक पौधे लगाते हुए 
लगभग सब कुछ हरा कर दिया है
मटमैले, पीले और उदास से रंगों को काट-छांट कर

उतना आह्लादित होते हुए 
मैंने नहीं देखा किसी को कभी
किसी पहाड़ को भी नहीं जब वह जगता है सुबह-सुबह 
किसी नदी को भी नहीं जब वह लगने को होती है सागर के गले
या फिर किसी घास को हल्की बारिश के बाद
जितना कि 
वह हो जाती है एक पौधा रोप कर
मेरे इर्द-गिर्द

कुछ एक वाहियात चीजों के खातिर
मुझसे लड़ी जाने वाली लड़ाइयां
उसके लिए
मेरी ख्वाहिशों को 
अपने लिविंग रूम में 
करीने से सजा कर रखने का बस एक तरीका भर है जहां मेरा बैठना उसका सुकून हो

उसके बेतरतीब होने में एक तारतम्य है 
यहां वहां बिखरी-बिफरी चीजें भी 
मिनटों में कब करीने से लग जाती हैं
मैं नहीं समझ पाता

थाप उल्टे सीधे जैसे भी पड़े
सुर सध जाते हैं, मंच सज जाता है
और हर बार बेहतरीन प्रदर्शन
और फिर तालियों की गड़गड़ाहट से भरा
चमचमाता चेहरा
अपने आईने में बार-बार देखती है

वह अपने दिन भर की अपनी चहलकदमी से
घर की दीवारों को गर्म रखती हैं
और बाहर की हवाओं को साफ
होती हुई शाम में
वह दीए की रोशनी हो जाती है
जहां मंत्रोच्चार और घंटियों की आवाजें हैं 

जाड़े की किसी रात को वह पकाती जा रही है टमाटर का शोरबा
और मैं पढ़ता जा रहा हूं
उसमें कविताओं का स्वाद!


Monday, November 30, 2020

यह उनकी कामयाबी का वक्त है!

वे जान गए थे 
कि सही गलत कुछ नहीं होता
असल बात उसे साबित करना होता है 

और इसी क्रम में 
वे यह भी जानते थे 
कि सही को गलत साबित करने और गलत को सही साबित करने के तरीके होते हैं  जिन्हें सीखना होता है

उन्होंने इतिहास से सीखा 
कि इतिहास कैसे बनाया और बदला जाता है 
उन्होंने बाजार से सीखा भावनाओं के  इस्तेमाल से चीजों को कैसे अच्छे से बेचा जा सकता है 
उन्होंने अनुसंधान से सीखा
तथ्यों को उलटने पलटने की संभावना के बारे में
और  मानविकी विज्ञान से कि कैसे दृष्टिकोण से खेला जा सकता है

उन्होंने
पंचतंत्र की ब्राह्मण, बकरी और तीन ठग वाली कहानी को ठीक तरह से पढ़ लिया था थे और उन्हें पता चल गया था बार-बार दोहराने के विधा के बारे में

वे इस बात को भलीभांति समझ गए थे कि अगर गांधी कोई बात बोलेंगे तो लोग उसे सच ही मानेंगे
और फिर उन्होंने झूठ को बोलने के लिए  गांधी तैयार किए 
और जो तैयार नहीं हुए उन्हें झूठा साबित कर दिया और कहा कि वे दुर्भावना से प्रेरित हैं

अब वही सच है जो वह बोलते हैं कि सच है
झूठ भी वही जिसे वो झूठ बोलते हैं

यह उनकी कामयाबी का वक्त है!

Saturday, November 28, 2020

सामने वाले खुद से लड़ते हुए

खुद से लड़े हो कभी, कभी खुद पर वार किया है
खुद से जीते हो कभी खुद को हराकर
अपना लहू कैसा है मालूम है क्या तुमको
चीर कर देखा है क्या खुद को कभी?

उन्हें कमजोर मत समझो जो शांत दिखाई देते हैं 
कभी यह भी मत मान लेना 
कि जो शांत है वह कम लड़ाका होगा
कि जो शांत है उसे कभी भी हराया जा सकता है

ऐसे कुछ लोगों को मैं जानता हूं 
वे अक्सर लड़ रहे होते हैं अपने भीतर कोई लड़ाई
और लहू बस खत्म होने वाला होता है
वहां बोल कर लहू को व्यर्थ बर्बाद करने की गुंजाइश नहीं होती

भीतर की खुद से लड़ाई को बाहर के शोरगुल से बचाना जरूरी होता है
जीतने के लिए करनी पड़ती है सतत लड़ाई
इस विचार को कि खुद से लड़ना व्यर्थ है पटकनी देनी पड़ती है बार-बार
उसके लिए
गहरे उतर कर बनाई जाती है रणनीति युद्ध की
नहीं तो सामने वाले खुद को सब पता चल जाता है

खुद से लड़ने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है
कुछ मत बोलो, चुप रहो 
जब तक कि तुम नहीं
कूद पड़ते हो अपनी खुद की लड़ाई में.
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Thursday, November 26, 2020

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

Inspired by poem of Vinod Kumar Shukla ji (link given below)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
उस व्यक्ति को जानने वाले सभी लोग अभी भी चले जा रहे थे
उसके लिए कोई नहीं रुका 
और ना ही उसके पास गया
कि वह उसका हाथ पकड़कर खड़ा हो चले

काफी देर बाद किसी तरह
वह खुद खड़ा हुआ और जाने लगा
चलते चलते उसने देखा 
एक और व्यक्ति को हताशा में बैठे हुए
वह उसके पास जाकर बैठ गया
उसे वह बिल्कुल नहीं जानता था

थोड़ी देर बाद 
दोनों साथ उठे और साथ चले

 वे अब तक हताशा को जान चुके थे

और हताशा में हाथ थामने की 
जरूरत को जान चुका थे
साथ चलने की अहमियत को जान चुके थे
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विनोद कुमार शुक्ल जी की यह छोटी सी कविता कितनी बड़ी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.

Friday, April 17, 2020

महामारी में मरने वाले लोग !


महामारी में मरने वाले लोग !
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महामारी में मरने वाले सभी लोग
महामारी से नहीं मरते
उस महामारी से तो बिल्कुल नहीं
जिसे दुनिया के
ताकतवर लोग, संस्थाएं और राष्ट्रअध्यक्ष मानते हैं महामारी
और करते हैं तालाबंदी और नाकेबंदी
महामारी में मरने वाले बहुत सारे लोग
पहले से ही मरते आ रहे होते हैं
और मरते जाते हैं लगातार
अलग-अलग महामारियो की वजह से
पर वे महामारी से मरने वालों में गिने नहीं जाते
क्योंकि दुनिया के ताकतवर लोग नहीं मानते हैं उन्हें महामारी
वे मरते हैं सड़कों पर और घरों में
शोषण और दुराचार की महामारी से
वे मरते हैं भूख, कुपोषण और लाचारी की महामारी से
कुछ मर जाते हैं हताशा की महामारी से और कुछ इंसाफ में देरी की
कुछ मर जाते हैं फुटपाथ पर उन्मादी गाड़ियों के नीचे आकर
और कुछ इसलिए क्योंकि फुटपाथ नहीं होते सड़कों के किनारे
जिन पर उन्मादी गाड़ियां चलती है
वे मरते हैं व्यवस्था का अट्टहास सुनकर
वे मरते हैं सत्ता की हत्यारी मुस्कान से लहूलुहान होकर
कभी ठगे जाने से मर जाते हैं वे
कभी वे मर जाते हैं डर कर
और कभी लड़ते हुए लड़ने की मार से
कई बार
वे मरते हैं ताकत की सत्ता को बनाए रखने
या हथिया लेने की नुकीली अभीप्सा में
नए और खोज कर लड़े जाने वाले युद्धों की वजह से
या फिर
दबा देने की हिंसक खुशी पाने के लिए लड़े गए लड़ाईयों में
कभी वे मरते हैं
सहस्राब्दी विकास के लक्ष्यों में बहुत पीछे छूट कर
और कभी सतत विकास के लक्ष्यों में डूब कर
कभी दंगों में और कभी अपने कपड़ों और वेशभूषा की वजह से भी मरते हैं वे
उनसे कोई नहीं कहता कि तुम मर जाओ
क्योंकि वे जानते हैं कि एक दिन वे
बिना किसी के कहे या किसी को बिना बताए
किसी अदृश्य महामारी से मर ही जाएंगे
वे जानते है कि
महामारी को तभी माना जाता है महामारी
जब उससे मरने का खतरा
खास ताकतवर पर आ जाता है
पर उनमें से कोई भी
यह जानने की वजह से नहीं मरता
वे मरते हैं हर उम्र और हर काल में
कई बार वे एक बार भी जिए बिना मर जाते हैं
उनके माथे पर बेमौत मरने की रेखाएं होती है
भले ही वे मरते हो बेमौत
या उनकी मरने की वजह होती हो भूख जितनी मामूली
वे जीते हैं हमारी ही तरह किसी की मुस्कुराहट पर
किसी की आंखों के पानी के लिए
किसी की गोद में खिलखिलाने के लिए
जहां महामारी का कोई डर नहीं होता




Saturday, February 29, 2020

कविता का शीर्षक आग में जल गया है


तब घरों में
आग जलाने के साधन
बहुत कम हुआ करते थे।

दियासलाई भी बहुत कम घरों में हुआ करती थी।
और वह भी हमेशा नहीं।

हम गांव में
पड़ोस के घरों में
आग मांगने जाया करते थे
ताकि सांझ की रोशनी जलाई जा सके
चूल्हे जलाए जा सके
रोटी पकाई जा सके।

बारिश के दिनों में कई बार
मां कितना परेशान हो जाया करती थी
जब लकड़ियाँ सीली हो जाया करती थी
और आग भी कई घरों में घूमने के बाद
किसी एक घर से मिल पाती थी।

अगली जरूरत के लिए
आग को संभाल कर रखना होता था।
पर मां अक्सर सारा आग बांट दिया करती थी
उसका मानना था
कि आग को बचाए रखने के लिए उसे
बांटना जरूरी होता है
और इसलिए उसे आखरी बचे आग को भी
बांटने में कोई परेशानी नहीं थी।

पाठ्यक्रम में तब
पुरा पाषाण काल में हुए
आग के आविष्कार के बारे में पढ़ना
कितना रोमांचकारी हुआ करता था
और यह सोचना
कि पत्थरों को रगड़ कर आग पैदा करना
कितना मुश्किल होता रहा होगा तब

आज जब आग जलाने के बहुतेरे हैं साधन
और हर तरफ लगाई जा रही है आग
मैं सोचता हूं कि
आग मांगते-बांटते, बचाते-जलाते
यह हम आग लगाने तक कैसे पहुंच गए

क्या पुरा पाषाण काल के लोग
कभी सोच पाए होंगे
अपने आग के आविष्कार के
इस तरह के इस्तेमाल के बारे में
क्या मां जानती रही होगी कि
जो आग वह बचा रही है
वह किसी दिन
किसी का घर जला देगी

कल टीवी पर मां रोती हुई कह रही थी
कि आग में उसका बेटा जल गया है
और बिटिया झुलस गई है
और यह वह आग नहीं जो उसने बचाई थी।  


Wednesday, November 20, 2019

और इस तरह मारा मैंने अपने बोलने को

————
मुझे कुछ बोलना था
पर मैं नहीं बोला
और ऐसा नहीं है कि
मैं बोलता तो वे सुन हीं लेते लेते
पर मैं नहीं बोला
मैं नहीं बोला जब कि मुझे
एक बंद कमरे से बोलने की सहूलियत भी थी
मेरे हाथों में माइक भी दी गई थी
और मैं आवाज बदलकर भी बोल सकता था
और चेहरा बदल कर भी
पर मैं नहीं बोला
मैं तब भी नहीं बोला
जब रवीश कुमार ने कहा कि बोलना ही है
और वरुण ग्रोवर ने तरीके सिखाए हंसी हंसी में बोलने की
मुझे याद आती रही सुरजीत पातर की कविता
जिसमें एक कवि हो जाता है कविता का हत्यारा
और पंक्तियां लिख लिख कर काटता है
मैं होता तो शायद बिना लिखे ही काट डालता
मुझे मालूम था कि
आज के जमाने में यह तर्क कितना स्वीकार्य है
कि कितना कठिन है बोलना
जब के सामने एक ताकतवर आदमी हो
और जब हमने देखा हो एक ताकतवर आदमी के सामने बोलने का हश्र
मुझे जो भी बोलना था
तर्क की आड़ में
उसे मैंने नहीं बोलकर पूरा किया
मैंने कहा कि यह तब भी मुश्किल है
जब सामने का ताकतवर आदमी खुद आगे बढ़कर कहे कि बोलो
क्योंकि क्या पता वह किस तरह से बोलने को किस तरह से दर्ज करें
और किस तरह की गुरिल्लगी कर दे बाद में
और तब भी मुश्किल है
जबकि कहा जाए कि संविधान बोलने की आजादी देता है, कि बोलना आपका अधिकार है
क्योंकि क्या पता संविधान की व्याख्या कब किस तरह से कर दी जाए
और इस तरह के तमाम तर्क दिए खुद को मैंने
अपने नहीं बोलने के बारे में
खुद को क्योंकि किसी और को पता ही नहीं था
मेरे नहीं बोलने के बारे में
और इस तरह मारा मैंने अपने बोलने को!


Sunday, November 3, 2019

एक भिंची हुई मुठ्ठियों की हैसियत तक!


हालात को यही मंजूर था-
यह कह कर
जब हम वहां से उठ आए,
लौटने के रास्ते में
हम अपने मामूलीपन से गुजरते हुए आए

हम खुद से
कुछ कहते हुए वहां से आए
बड़ी ही मामूली सी कोई बात
जिसे बाद तक याद रखना
जरूरी नहीं समझा
न मैंने और न किसी और ने

हमने अपनी बौखलाहट पर
बहुत पहले और बहुत बार
ठंडा पानी डालने जैसा कुछ किया था
और अक्ल पर जानबूझकर कोहरा मलने जैसा
जिसके कारण
अब हमारी मुट्ठी में भीचने के लिए कुछ बचा नहीं था
और वह जो अब बचा हुआ था, बेहद मामूली था

काश! हम तब समझ पाते
कि आखिर में जो बचता है
वह बेहद मामूली होता है
और उसके लिए
असली चीज पर ठंडा पानी डालना
कोई मामूली बात नहीं होती!

पर कोई बात नहीं 
अब जब केवल मामूली हीं बचा है 
और जिसका कि मुझे पता है 
तब मैं सोंच रहा हूँ मामूलीपन से निकलने के बारे में 
और पहुंचने के बारे में 
एक भिंची हुई मुठ्ठियों की हैसियत तक फिर!


Saturday, September 7, 2019

आप इसे आप कविता जैसा कुछ मान सकते हैं!

सरकार स्कूल अच्छा नहीं चला पा रही थी
तो उसने कहा
कि खेलना बहुत जरूरी है बच्चों के लिए
सरकार ऐसा बताना चाहती थी
कि देश से बेरोजगारी इस तरह
खत्म की जा सकती है
ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि
गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी भी
किसी चौक चौराहे पर
चाय - पकोड़े का रोजगार कर लेते थे
पर पढ़े लिखे लोगों में
बेकार या बेरोजगार होने की आदत हो जाती थी
जिसका कि बेरोजगारी के आंकड़ों पर बुरा असर पड़ता था
सरकार बहुत सालों से गरीबी हटाना चाहती थी
इसके लिए वह कई योजनाएं भी लाती थी
और गरीबी हटाने का नारा देती थी
फिर उसने गरीबी के साथ गंदगी हटाने का भी नारा दिया था
योजनाएं कितनी आती थी इसका ज्यादा पता नहीं चलता था
पर नारे जरूर आ जाते थे और वे चलते रहते थे
एक समय पर आकर
सरकार को ऐसा लगा था कि नीति अच्छी हो तो बिना योजनाओं के भी काम चलाया जा सकता है
फिर किसी दिन सरकार की नीति में यह तय किया गया
कि गरीबी हटाने से बेहतर है गरीबों को हटा दिया जाए
और फिर उसने एक दिन उनसे कहा कि
अब से तुम हमारे देश के नागरिक नहीं होगे
चुनाव के ठीक पहले
अर्थव्यवस्था को बुखार हो जाता था
जिससे वो कूदने लगती थी
और जब बाद में पेरासिटामोल खाने के बाद
वह ठंडी पड़ जाती थी
और फिर उसे रिजर्व बैंक से उधार लेकर
रिवाइटल खिलाया जाता था
ताकि वह गर्म हो सके और थोड़ा दौड़ सके, चल सके
न्यायालयों की प्राथमिकताएं बदलती रहती थी
कभी वह इस बात पर चर्चा करने लगती थी
कि राम कहां जन्मे या फिर वहां कोई घंटी मिली या नहीं मिली
और कभी किसी रेप केस पर हजारों पन्ने का फैसला पेश करती थी
ऐसा लगता था कि कानून अंधा होते हुए भी संवेदनशील था
और उसकी कोई तीसरी आँख थी जिससे वो
जिसे जब देखना चाहता था उसे तब देख लेता था
और अदालतों के बाहर एक मीडिया की अदालत में
बहस देखकर
कई लोग यह मान लेते थे कि सारी समस्या
किसी खास तरह के लोगों की वजह से थी और इनका
देश निकाला करना बहुत जरूरी था
और उधर वह बेचारी नाबालिग लड़की रोती थी
जो किसी गैंगरेप के बाद पेट में पलते हुए बच्चे को
गिराने के लिए न्यायालय के आदेश का इंतजार करती थी
जिसे कोर्ट लगभग भूल सा गया था
सरकार रेप के क़ानून को सख्त से सख्त करती जाती थी
और सोंचती थी कि बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए
सख्त कानून बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था जो इतना प्रभावकारी हो
विकास के मायनों में एक महत्त्वपूर्ण बात
एयरपोर्ट के रास्तों को
बिल्कुल चमकदार बना दिया जाना था
शायद इसलिए कि
देश में दाखिल होने वालों और
देश से भागने वालों के मन में देश की चमकदार छवि बनी रहे
कुछ लोग कहते थे कि
मीडिया का जन्म लोकतंत्र को बचाने के लिए हुआ था
पर उसका किसी ने ब्रेनवाश कर दिया था और
अब वह जहां भी लोकतंत्र को देखती थी
सरेआम गोलियों से भून देने की बात करती थी
कुछ लोग इसे मीडिया का आतंकवाद कहते थे
पर ज्यादातर लोग चुप थे
कुछ पागल से लगने वाले लोग थे जो कहने लगे थे
कि अब मीडिया ने लोगों को आतंक-पसंद बना दिया था
और इस तरह लोगों को लगने लगा था कि
देश को शांति वाली अपनी छवि जल्दी से जल्दी छोड़ देनी चाहिए
सरकार जनता को समय-समय पर तोहफा दिया करती थी
और उसे लगता था कि यही उसका काम है
और वह कहना चाहती थी कि लोगों को समय-समय पर तोहफा मिल ही रहा है
तो वे अपने काम से काम रखें और उनका साथ दें
ऐसा सालों सालों से हो रहा था था पर कुछ लोग थे और उनकी संख्या काफी अधिक थी
जो गांधी जी के तीन बंदरों से बेहद प्रभावित थे
जो न कुछ देखते थे, न सुनते थे और ना हीं कुछ बोलते थे
चाहे सरकार जो करे
यह कविता
उन लोगों के बारे में ही है और मेरे बारे में भी
आप इसे कविता या जो चाहे मान सकते हैं
पर यह सरकार के बारे में बिल्कुल नहीं है !



Wednesday, April 3, 2019

इसकी-उसकी आड़ में हत्याएँ!

एक भीड़ का हिस्सा होकर
जिस दिन तुम्हारे हाथ
आततायी हाथों में तब्दील हो गए
उस दिन की रात घर तो नहीं लौटे होगे तुम

और अगर लौटे भी होगे तो
तो घर के किसी कोने को पकड़ कर सिमट गए होगे
बत्तियों को कर दिया होगा बंद
और बीबी-बच्चों को, माओं-बहनों को कर दिया होगा पास आने से मना
फिर तुम अँधेरे में बेआवाज रोये भी होगे
जब तुमने सोंचा होगा
उस आदमी और उसकी आँखों में उभरे खौफ और लाचारी के बारे में
और तुम्हें डर भी लगा होगा
जब तुमने उसकी जगह खुद को रख कर देखा होगा
अगली रोज अखबार पढने के बाद

या मैं गलत सोंच रहा हूँ
तुम और तुम्हारे जैसों के बारे में
तुम वो हो
वही जो जीतने के लिए,
सत्ता बनाने या बचाने के लिए
मारने या रेप करने के लिए
या फिर अपनी मामूली जरूरतों के लिए
बनाते हो एक भीड़ 
और उसकी आड़ में करते हो हत्याएं

तुमने ईजाद की है हत्या की ये तकनीक
जहाँ क़ानून के साथ कुश्ती खेली और जीती जा सकती है

अगर मान भी लिया जाए कि तुम वो नहीं हो
जो मामूली जरूरतों के लिए
कायरों की तरह लेते हो भीड़ की आड़
कि तुम डरे थे, आशंकित थे अपनों के लिए
कि जायज था तुम्हारा डर

तो भी सिस्टम की असफलता को
किसी एक के माथे कैसे थोप दिया

उस वक्त
जब तुम उस भीड़ का हिस्सा बने और की हत्याएँ
क्या कर सकते थे तुम अपनी आड़ में

क्या तुम्हारा गुस्सा
वास्तव में किसी अन्याय के खिलाफ था

Tuesday, April 2, 2019

अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं !

मैंने छुए अल्फाज उसके
और उसने मेरी ख़ामोशी पे अपने हाथ रखे,
कभी पहले हुई कविता फिर कविता हुई


फिर वो मॉनसून हुई
और मैं बारिश,
सूखे गिले सारे गीले हुए


हंसी वाले उसके दो होंठ फिर खुल कर
चूमने लगे बादल
मुझे ठीक से पता नहीं कब बरसने लगी बूंदे,
धरती पर
टप-टप
हर तरफ हँसने की गीली तस्वीरें


जैसे हीं कविता फिर
विस्तार लेकर निराकार हुई
मैं उसमें गुम होकर आकार हुआ


जाने ये सब कितनी जल्दी हुआ
कि जरा सी देर में सब भर गया,
आँख भी, ख्वाब भी
और आँखों में अरसे से बने ख्वाब के घाव भी


अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं
उन्हें अभी और भरना है