Thursday, February 12, 2009

बहरा आसमान !

चाँद ने,
लगाई बिंदी माथे पे
ओढे गहने और कपड़े
मेंहदी लगे हाथो में पहने कंगन
मन पे, पहले का सारा पहना हुआ
उतार दिया
और सूरज की लपटों के सात फेरे ले लिए

खामोश लबों पे उठती हुई टीस
और कंठ में रुकी हुई हूक
अनसुनी कर दी गई थी पहले हीं

बहरा आसमान !

Sunday, February 8, 2009

शायद जख्म हीं खुराक है मेरी!

जहाँ से भी मिला
जिस भी बदन से
उठा के लाद लिया अपने बदन पे

अब ठीक से याद भी नही
कहाँ से उठाया
किस बदन से कब

इकठ्ठा करता रहा,
आलमारी और रैक भर गए जब
तो दीवान खरीद लिया
अब उनके ऊपर हीं सोता हूं।

आज की तारीख में
ये तय करना मुमकिन नही कि
कौन सा जख्म तो अपने बदन का है और कौन
कहीं से उठाया हुआ
समय के साथ सबका चेहरा एक सा हो गया है
पूरी तरह गड्ड-मड्ड
और फ़िर इतने दिन अपने घर में
रखने के बाद तो
सब अपना हीं लगता है


बहुत बार की है कोशिश कि
किसी पोटली में बाँध कर
दूर फेंक आऊं इन्हें
और पूरी तरह बेजख्म हो जाऊं


प्रण भी किया है कई बार कि
इन जख्मों को उतार के हीं रहूँगा
पर ये मुमकिन नही...

मुमकिन नही क्यूँ कि
शायद जख्म हीं खुराक है मेरी
जख्म खा के हीं जिन्दा हूं !

Friday, February 6, 2009

ख्याल टूटे हुए से

दुःख पे पाँव अगर पड़ जाए
तो दुख बिदक कर काट लेते हैं ।

नज्में सब पीलीं पड़ गई हैं
जाने कब की ये किताब है।

तुम्हारे मन में उमस है, इसलिए
मुझ तक आने के रास्ते सारे चिपचिपे।

अब बस मैं एक रूह हूँ
जीने के लिए बदन उतारने पड़े।

हमने अपना एक जिस्म बनाया है
अब बस एक रूह की आरजू है।

आंखों ने छितकिनी चढा ली है
नींद -ख्वाब सब बाहर।

अभी अभी फ़िर से कोई ख्याल टूटा है
चटखने की आवाज फ़िर से आई है

Thursday, February 5, 2009

तेरी बातों के बिना...

बहुत तेज सन्नाटा है !

सारी आवाजों को दबाए बैठा है
किसी बर्बर तानाशाह की तरह

होंठ के भीतर हीं ,
ये आवाजें,
गले के ठीक नीचे तक भरी
कोई फडफडा रही है , कोई बौखला रही है ,
कोई घुमड़ रही है किसी गुबार की तरह
कोई थक के शांत बैठ गई है

ये दबी हुई आवाजें,
जिनका कि शक्ल अब शोर के जैसा है,
जब बौखलाहट बहुत बढ़ जाती है
हिचकियाँ बन के निकलती हैं
थोड़ा-थोड़ा
सन्नाटे के कान बचाती हुई।

Monday, February 2, 2009

इजहार

(कुछ कवितायें बार-बार सच होती है...)

लब्ज सुन लिए गए थे ...

कायनात की सारी आवाजों ने
उन तीन लब्जों के लिए
सारी जगहें खाली कर दी थी

होंठों पे सदियों से जमा वजन
उतर गया था

उसके भीतर कोई नाच उठा था
जो नाचता हीं जा रहा था लगातार
लगातार...