Monday, June 8, 2009

किस तरह तुम छू पाओगी बसंत अब !

अब
किस तरह तुम
छू पाओगी बसंत
जबकि
अभी-अभी तुमने
बुहार कर
एक जगह इकठ्ठा किये गए
सारे पतझड़ को
पैर मार कर
सभी मौसमों पे छीतेर दिया है

Sunday, June 7, 2009

बदन पे हरा उगा नही कुछ जाने कबसे...

कितना तय होता है
लौटना
हरे पत्तों का, पेड़ों पर
पतझड़ के बाद

पेड़ अच्छे हैं
बहार का इंतज़ार
उनके लिए
इतना लंबा और अनिश्चित नही होता ...

जाने कबसे बैठा हूँ
उसकी आमद के इंतज़ार में
बदन पे हरा उगा नही कुछ जाने कबसे...

Friday, June 5, 2009

रात, नीम और मैं !

सारी रात
मैं उस नीम के
गले लग के रोती रही

सुबह देखा तो
वो और लहलहा रहा था

मेरे आंसू भी
उसने सींचने के वास्ते
इस्तेमाल किए होंगे

Tuesday, June 2, 2009

शरीर में टिके रहने की वजह

शरीर में टिके रहने की वजह
देती है साथ कोई तमन्ना


एक ख्वाहिश है जो
नही जाती छोड़कर कभी


कोई ख्वाब है जो
कभी रूठता नही


टूटता नही है एक
नशा है जो उम्मीद का


मन के आले में अरमानो का एक दीया है
जो अपनी लौ नही समेटता


एक जिंदगी है जो
कभी मरती नही


और कितनी चाहिये वजहें
इस
शरीर में टिके रहने के लिये.

जानते थे वे नही आयेंगी

वो शाम का किनारा जिसके उस तरफ तुम्हारा समंदर डूब गया था
और जिंदगी की सारी लहरें गायब हो गयी थी अचानक धूंधलके में
उसी किनारे पे मेरी ख्वाहिशें ठहर गयी थीं।

पूरा
का पूरा जिस्म झोंक दिया एक छोटे पेट के वास्ते
मुझे याद भी आईं बहुत बार, वो ठहरी हुई ख्वाहिश
और मैं भूला भी बहुत बार।


पर
जब कभी जिस्म को फुरसत मिली पेट से
देखा जरूर उस किनारे को
जिसके उस तरफ तुम्हारा समंदर डूब गया था
और उन लहरों को जो गुम हो गयी थी अचानक।

ख्वाहिशें तो वहीं ठहरी हैं आज भी
बुलाया भी नही, आवाज़ ही नही दी,
जानते थे वो नही आयेंगी!