Friday, August 20, 2010

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो

वे टूटें
भूकंप के मकानों की तरह
और फटें
बादलों की तरह
हम कहीं दूर सूखे में बैठ कर
देखें उनका टूटना और फटना
लिखे उनके दुख और खुश होवें

टूट पड़ें सड़क पे
लाल बत्ती के हरी होते हीं
और बाजू में
बच कर निकलने के लिए संघर्ष करते
साइकिल वाले की साँसों का
उथल-पुथल देखते हुए
पार कर जाएँ सफ़र

रात की तेज बारिश में
बह गयी हों सारी यादें
तब भी सुबह उठ कर हम टाल जाएँ
खुद से बातें करना
और समय पे पहुँच जाएँ दफ्तर

दाल सौ रुपये किलो जाए
तो उसके साथ हम बेंच दे
अपनी मासूमियत

वो जलाएं हमें
और हम खींचें कश
मनहूस वक्त के छल्ले हर तरफ घूमते हों

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो
और हमारा क्या
हमारे दिमागों में पतझड़ का मौसम हो
और वहां पहुँचने वाली नसें सूखी.
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Saturday, August 14, 2010

कवितायेँ बचाती है हरीतिमा

हर नयी कविता
जगह बनाती है
दूसरी नयी कविता के लिए

प्रकृति के हर जीव की तरह
कवितायेँ भी रखती हैं अपना बीज
स्वयं में हीं
और लगातार बचाती हैं हरीतिमा

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जरूरी होती हैं कवितायेँ

कवितायेँ न हो
तो हो सकता है मैं भी
किसी कटघरे में होऊं
और मुझ पर कोई मुकदमा हो

जब तक कवितायें हैं
तब तक मुझे आस है
कि कुछ और लोग भी बचते रहेंगे
कटघरे में होने से

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Tuesday, August 10, 2010

कवि का डर टूटा नहीं है अब तक !

जाना नहीं हुआ उस तरफ
ताकने का मन नहीं हुआ बिलकुल भी
बहुत दिन हुए
देखी नहीं कोई कविता

अभी जिधर कविता का होना है
उधर पत्थर फेंकती औरतें हैं,
जीप जलाते मासूम
और देखते हीं गोली मार देने के लिए
तत्पर हथियारबंद

उसकी तरफ देखने से
कभी भी लग सकती है आँख में गोली

कविता जब खो देती है विश्वास
उसके साथ जाने में डर लगता है
और कवि का डर
टूटा नहीं है अब तक

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Sunday, July 25, 2010

खाल उतारने की प्रक्रिया जारी है!


ये अच्छा है
कि इस कविता में जिन्हें आना था
उनमे से कुछ तो अभी व्यस्त हैं
एक मरे बैल की खाल उतारने में
कुछ अपनी छाती से
भूख पिला रही हैं अपने बच्चों को
और कुछ इस इंतज़ार में हैं
कि उनके देह हों तो वे उन्हें बेंच सके
और इसलिए ये संभव है
कि कविता अब वीभत्स होने से बच जाए

जहाँ खाल उतारने की प्रक्रिया जारी है
वहां किसी उत्सव की आशा में
ढेर सारे बच्चे
घेरे में खड़े हैं
अपनी लपलपाती आँखों के साथ
और बार-बार लताड़ने पे भी
पीछे नहीं हटते

उधर ऊपर ताड़ के पेंड़ो पे बैठे
कौवो,गिद्धों और चीलों को भी
इस उत्सव का भान है
और उनके इन्तिज़ार नहीं थकते
वे शायद ईमानदार भी हैं
नहीं तो बस्ती में कई बच्चों का वजन इतना भर है
कि उन्हें लेकर उड़ा जा सकता है

क्षमा कीजिये गर
ये कविता वीभत्स होती जा रही हो
और कवि असंतुलित
जबकि पूरी कोशिश की जा रही है कि ऐसा न हो
जैसे इस तरह की कई चीजें
अभी आपसे छुपाई जा रही हैं कि
बाढ़ और अकाल के दिनों में
सिर्फ सड़ी अंतड़िया होती हैं उनके खाने के लिए

वैसे मुझे लगता है
कवि के असंतुलित हो जाने में
कोई बुराई नहीं है
गर दुनिया के एक अरब लोग भूख से दबे हों
और उठ नहीं पा रहे हों

और कुछ लोग लगे हों इसमें कि
उनके खाल उतारे जा सकें

(संजुक्त राष्ट्र के हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के आठ राज्यों में २६ अफ़्रीकी देशों से ज्यादा गरीब लोग रहते हैं )

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Friday, July 16, 2010

उनकी शक्लें ढह गयी हैं आँखों में

यह बहुत बुरा है कि
कुछ भी नहीं है मेरे पास अभी
जिसकी शक्ल कविता हो

और पीछे जो भी कहा था मैंने
उनकी शक्लें भी
ढहती जा रही हैं मेरी आँखों में

कविता निकल गयी है मुझसे
जो कवि में
चुन-चुन कर प्रेम संजोती है,
आशा रोपती है
और जरिया बनती है कवि होने के लिए

मैं पूरा कर आया हूँ
वह वक़्त
जिसके बाद एक कवि
बलात्कारी हो जाता है,
पेंड काटता है
और पैसे कमाता है

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