मैं चलता गया था उसकी तरफ
निरंतर
दूरी कितनी तय हुई मालूम नही
रास्ते में मै कही ठहरा नही जिस्म पर
और वो भी
रूह से पहले तक
दिखायी नही दी एक बार भी
अचानक से हुआ कि छू लूं
जैसे ही दिखी पर
अदृश्य हो गयी हाथ बढाते ही
तब लगा मैं
लिबास साथ लिये आ गया था
लौटना पड़ा मुझे
रूह में नंगे जाना होता है...
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Tuesday, February 8, 2011
Saturday, February 5, 2011
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता जाता है
पिछला साल ख़त्म हुआ
और ये नया साल भी
अपनी रोजमर्रा की चाल से चलता हुआ
एक महीना और पांच दिन गुजार चुका है
और तमाम कोशिशों के बाबजूद
इस नए साल में
मैं प्यार नहीं कर पाया हूँ तुम्हें
दोष किसी भी चीज के मत्थे मढ़ दूं
पर हकीकत कुछ और है
और वो बहुत तेजी से बेचैन कर रहा है मुझे
और चौंकाता है कि
बिना प्यार के हीं चल रहा हूँ मैं आजकल
मुझे नहीं मालूम था
कि अचानक से ये खो जाएगा एक दिन
मृत्यु के पहले हीं
और मुझे केवल सांस के सहारे
छोड़ दिया जाएगा
तभी तो कभी जरूरत नहीं समझी जानने की
कि कहाँ से उगता है,
कैसा है इसका बीज और
किसने रोपा था इसे
और अब तो कहीं दीखता हीं नहीं ये
अब कहाँ पानी डालूँ, कहाँ दिखाऊं धूप
पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता चला जाता है
दरारें उगती आती हैं
तुम तक पहुँचने की
और तुम्हारा ह्रदय छू लेने की उत्कंठा
उत्कट हुई जा रही है
मैं मर रहा हूँ
और जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि
तुम देख भी नहीं पा रही
तुम तक पहुँचने की मेरी जद्दोजहद
__________
और ये नया साल भी
अपनी रोजमर्रा की चाल से चलता हुआ
एक महीना और पांच दिन गुजार चुका है
और तमाम कोशिशों के बाबजूद
इस नए साल में
मैं प्यार नहीं कर पाया हूँ तुम्हें
दोष किसी भी चीज के मत्थे मढ़ दूं
पर हकीकत कुछ और है
और वो बहुत तेजी से बेचैन कर रहा है मुझे
और चौंकाता है कि
बिना प्यार के हीं चल रहा हूँ मैं आजकल
मुझे नहीं मालूम था
कि अचानक से ये खो जाएगा एक दिन
मृत्यु के पहले हीं
और मुझे केवल सांस के सहारे
छोड़ दिया जाएगा
तभी तो कभी जरूरत नहीं समझी जानने की
कि कहाँ से उगता है,
कैसा है इसका बीज और
किसने रोपा था इसे
और अब तो कहीं दीखता हीं नहीं ये
अब कहाँ पानी डालूँ, कहाँ दिखाऊं धूप
पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता चला जाता है
दरारें उगती आती हैं
तुम तक पहुँचने की
और तुम्हारा ह्रदय छू लेने की उत्कंठा
उत्कट हुई जा रही है
मैं मर रहा हूँ
और जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि
तुम देख भी नहीं पा रही
तुम तक पहुँचने की मेरी जद्दोजहद
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Wednesday, January 26, 2011
मुझमें अब बहुत शीशा और पारा है...
तुम तक लौटना है
और राह बनती नहीं
कई बार यूँ हुआ है कि
रखता गया हूँ
लब्जों को एक के ऊपर एक
और लगा है राह तुम तक पहुँचने की
मिल गयी अब
पर फिर जाने क्या होता है
एक एक कर सारे लब्ज मुंह मोड़ लेते है
और तय किये सारे रास्ते
फिर सामने आ खड़े होते हैं
अब जबकि भर चुका है
मेरी हवा में इतना शीशा
और मेरे पानी में इतना पारा
मुझे लौटना हीं होगा तेरे गर्भ में ओ मेरी नज़्म
और फिर जन्मना होगा अपने मूल ताम्बई रंग में
पाक होकर
मुझे तुम तक लौटना हीं लौटना है
पर जो मैं न लौट सकूं तुम तक
तो तुम आगे बढ़ आना ओ मेरी नज़्म
मुझमें अब बहुत शीशा और पारा है...
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और राह बनती नहीं
कई बार यूँ हुआ है कि
रखता गया हूँ
लब्जों को एक के ऊपर एक
और लगा है राह तुम तक पहुँचने की
मिल गयी अब
पर फिर जाने क्या होता है
एक एक कर सारे लब्ज मुंह मोड़ लेते है
और तय किये सारे रास्ते
फिर सामने आ खड़े होते हैं
अब जबकि भर चुका है
मेरी हवा में इतना शीशा
और मेरे पानी में इतना पारा
मुझे लौटना हीं होगा तेरे गर्भ में ओ मेरी नज़्म
और फिर जन्मना होगा अपने मूल ताम्बई रंग में
पाक होकर
मुझे तुम तक लौटना हीं लौटना है
पर जो मैं न लौट सकूं तुम तक
तो तुम आगे बढ़ आना ओ मेरी नज़्म
मुझमें अब बहुत शीशा और पारा है...
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Wednesday, January 5, 2011
अपना थका शरीर तुम्हें सौपने के लिए कितनी वजह काफी है
जानता हूँ
पाँव उठा कर मेज पर रख लेने से,
तान कर घुटने बजा लेने से,
कंधे झटक लेने और पीठ सिकोड़ लेने से
या उँगलियाँ मोड़ कर फोड़ लेने से
इस आनुवंशिक थकान को मिटाया नहीं जा सकेगा
पर क्या इतनी वजह काफी है
हार मान लेने के लिए
और सौंप देने के लिए तुम्हें
अपना थका हुआ शरीर ?
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पाँव उठा कर मेज पर रख लेने से,
तान कर घुटने बजा लेने से,
कंधे झटक लेने और पीठ सिकोड़ लेने से
या उँगलियाँ मोड़ कर फोड़ लेने से
इस आनुवंशिक थकान को मिटाया नहीं जा सकेगा
पर क्या इतनी वजह काफी है
हार मान लेने के लिए
और सौंप देने के लिए तुम्हें
अपना थका हुआ शरीर ?
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Thursday, December 30, 2010
कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है
जब से प्रेम और कविताओं के बारे में
यह कहा जाने लगा है कि
वे अब महज वस्तुएं हैं
मैं बाजार में पड़े उत्पादों से
आँख मिलाने से कतराता हूँ
मेरे लिए प्रेम, कवितायें हैं
उनका अभाव कचोटती हुई कवितायें हैं
और प्रेम के पश्चात
अस्तित्व में आया प्रेम का अभाव
और भी ज्यादा कचोटती हुई कविता
और कभी जब तुम्हें भेजने के लिए
मैंने 'पैक' की थीं कवितायें
तब भी वे वस्तुएं नहीं थीं
वे कभी भी वस्तु नहीं हुईं मेरे लिए
तुम्हारी आँखें,
जहाँ मैं मजबूत दीखता था
वहां भी झांकते हुए डर लगता है
जिसकी वजह वो अंदेशा है
कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है
और वहां उन आँखों के समंदर में
कविताओं की तैरती हुई लाश देखना
बेहद डरावना होगा
पर अंजाम से बेपरवाह होकर
मुझे देखना है एक बार तुम्हारी आँखों में
जहाँ मेरी तैरती हुई लाश हो सकती है
या फिर वो विश्वास
जिसे आँख भर, भर कर
मैं भष्म कर सकूं वो आवाजें
जिनमें कहा जाता है कि
प्रेम और कवितायें महज वस्तुएं हैं अब
और तब देखना चाहूँगा
बाजार में पड़े वस्तुओं की लिजलिजी स्थिति !!
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यह कहा जाने लगा है कि
वे अब महज वस्तुएं हैं
मैं बाजार में पड़े उत्पादों से
आँख मिलाने से कतराता हूँ
मेरे लिए प्रेम, कवितायें हैं
उनका अभाव कचोटती हुई कवितायें हैं
और प्रेम के पश्चात
अस्तित्व में आया प्रेम का अभाव
और भी ज्यादा कचोटती हुई कविता
और कभी जब तुम्हें भेजने के लिए
मैंने 'पैक' की थीं कवितायें
तब भी वे वस्तुएं नहीं थीं
वे कभी भी वस्तु नहीं हुईं मेरे लिए
तुम्हारी आँखें,
जहाँ मैं मजबूत दीखता था
वहां भी झांकते हुए डर लगता है
जिसकी वजह वो अंदेशा है
कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है
और वहां उन आँखों के समंदर में
कविताओं की तैरती हुई लाश देखना
बेहद डरावना होगा
पर अंजाम से बेपरवाह होकर
मुझे देखना है एक बार तुम्हारी आँखों में
जहाँ मेरी तैरती हुई लाश हो सकती है
या फिर वो विश्वास
जिसे आँख भर, भर कर
मैं भष्म कर सकूं वो आवाजें
जिनमें कहा जाता है कि
प्रेम और कवितायें महज वस्तुएं हैं अब
और तब देखना चाहूँगा
बाजार में पड़े वस्तुओं की लिजलिजी स्थिति !!
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