Sunday, November 19, 2017

मैं बारिश में बहुत उपजता हूँ...

मैंने तुमसे पूछा था
कि सबसे ज्यादा क्या पसंद है तुम्हें
और तुमने कहा था-
बारिश में भींगना

मैं तभी समझ गयी थी
कि तुम प्रेम-बीज हो
भींग कर, फूट कर,
अंकुरित होकर
लहलहा कर एक दिन भर दोगे मेरे जगत को

और ठीक वैसा हीं हुआ
मेरा ये जगत लहलहा उठा है

मैं तुम्हारे साथ चल पड़ी थी
हम घूमें बादल-बादल

और फिर एक लाल सुर्ख शाम को
मैंने बारिश को
लिया था अपने आगोश में
और तब तुमने भी अपनी बाहें फैला दीं थीं

मैं उपजाऊ बनी
और तुम लहलहाए

प्रेम अब और उपजता है
प्रेम की बारिश अब और होती है
और पता नहीं इन लहलहाते खेतों को क्या हुआ है
ये भी बढ़ते हीं जा रहें हैं
न ओर, न छोर !


Saturday, November 18, 2017

अब फिर एक और लम्बा, भूरा और इकहरा समय


कितना समय,
कितना लम्बा, भूरा और इकहरा समय
गुजारने के बाद
मैने फिर से हासिल किया था वो लम्हा,
पहुंचा था उस लम्हे के करीब
जिसके ताप में
खाक होना
अब बस एक लम्हे की बात थी

और...
देखो फिर चूक गया

ये नही कहूंगा कि
तुमने रोक लिया अपनी लपटों में आने देने से मुझे 

जरूर उस लम्हे को पार करना इस जन्म की
नियति नही रही होगी 
या फिर
उस तरह खाक होना 
मुश्किल होता होगा 
इस तरह खाक होने से!

Thursday, September 13, 2012

तेरी हंसी से होती है तर-बतर धरती

बारिश होती है
तेरी हंसी से होती है
तर-बतर धरती

पार्क में,
जहाँ जमा हो गया है पानी,
उड़ाते हैं बच्चे
तेरी हंसी के छींटे
एक-दूसरे पर
बच्चे हंसी से नहाते हैं
खिलखिलाते हैं 

भाग-दौड़ करते हुए
गिरते हैं वे इधर-उधर
तो बजती है
तेरी हंसी छपाक से
और  किनारे पे लगे पेंड़ों के पत्तों से गिर कर
मिल जाती हैं बूंदे हंसी में

तुम हंसती हो
तो उगने और पकने के लिए
जीती रहती है धरती 

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Wednesday, March 28, 2012

कौन किसके माथे ?

रोजमर्रा की भागदौड़ में गिरते गए
और दोष मढ़ते गए गड्ढों के माथे

पता ही नहीं चलता अब सपनो का
जरूरतें जागती हैं सारी रात नींद के माथे

रहने दिया आखिर में बिना कुछ कहे
देर तक मगर हथेली रही आवाज के माथे

अब ये कहना मुश्किल बहुत है
गोली कौन दागेगा किसके माथे

उस समंदर पे बोझ कितना गहरा होगा
पानी वो नदी छोड़ गयी जिसके माथे

हर शाम वो एक तन्हाई लगा जाता है
पार्क के कोने में पड़ी उस बेंच के माथे

पेंड वो अभी कुछ देर पहले उजड़ गया है
 कई सदी से लगा था वो इस जमीं के माथे

Friday, March 2, 2012

कोई दूसरा तरीका नहीं

वक़्त को बैठा मना रहा हूँ
कि वो फिर आने दे एहसास में
उन शामों को 
जहाँ कविता देर तक
बैठा करती थी यहाँ-वहां शाखों पे
पत्तियों पर और कभी लेट जाया करती थी
घास के मैंदान में

ऐसे क्यूँ रूठे कि
कविता को दो गज जमीन भी नहीं
जहाँ अलफ़ाज़ बैठ सके
पैर फैला के

पहले रौशनदान से झाँक भी जाते थे गर बादल
तो शामें  खींच कर उन्हें
बारिश कर दिया करती थीं
जैसे एक सिरा धागे का पकड़ आ जाए
तो पूरी पतंग खींच लाया करते हैं बच्चे

अब खिडकियों से लग कर
बैठा रहता हूँ
सारा सारा दिन
पर कहीं से कोई अल्फाज नहीं गुजरता

वक्त से यह मान-मनुहार
सिर्फ इसलिए
क्यूंकि कविता के सिवा
कोई दूसरा तरीका नहीं होता
तुम्हें देखने का!