Friday, January 1, 2021

साल-दर-साल सिर्फ साल बदलते हैं!


वे कहीं से भी आए हो 
या फिर कहीं से भी नहीं आए हो
(क्योंकि उनमें से कई अब कहीं के नहीं है) 
वे यहीं हैं अपने संघर्ष, अपनी लड़ाई के मोर्चे पर
अपनी पसलियां ताने 
हर एक के पीछे वे दस हजार में हैं

वे अपना 
छोटा बड़ा जितना भी है घर और अनाज
पीठ पर लाद कर ले आए हैं
और बैठ गए हैं सड़क पर
सड़क जो कहीं भी जाती हुई दिखाई नहीं देती

वे जाड़े की ठिठुरती रात में
सड़क पर खड़े तंबूओं में बल्ली लगे हैं
वे गेहूं की बोरियां हैं, जलावन की लकड़ियां हैं
बेलती और फुलाती हुई रोटियां भी
सुबह सुबह की चाय की घूंट के साथ गले तक पहुंचने वाली गरमाई भी हैं
ट्रॉली के टायर और उसमें भरी हुई हवा भी हैं वे

वे वहां वैसे हैं जहां जैसी जरूरत है
मगर वे हैं वहीं आंदोलन के गीत में बजते हुए 
अपने अखबार की रोशनाई में छपते हुए

वे इतने हजार तरह के माइनस में हैं
कि माइनस में गया पारा भी 
अब उनकी हड्डियों को, उनके जज्बे और हौसले को छूने से पहले एक बार सोचता है
हुकूमत मगर फिर भी जिसे गला देना चाहती है

उन्हें आत्महत्याओं के आंकड़ों में मत देखिए
वहां वे सिर्फ इसलिए रखे गए हैं
क्योंकि सरकार को पता है 
कि उनकी हत्याओं की तहकीकात में 
किसका नाम आएगा

वे बार-बार निकल कर आते हैं 
आंकड़ों से बाहर सड़कों पर और पूछते हैं
कि हत्यारा कौन है
हत्यारा कहता है कि वो अब और हत्या नहीं होने देगा

वे कह रहे हैं कि वे वहीं  हैं
और उनका वहीं होना माना जाए 
तब भी 
जब वे चले गए होंगे
रोपाई कटाई के लिए अपने खेतों में
क्योंकि सड़क पर आंदोलन जोतना  
और मांगे रोपना
अब फसल उगाने के तरीके में शामिल कर लिया गया है

अगली बार वे जब आएंगे
तो अपना छोटा बड़ा जितना भी है खेत
सड़क पर ले आएंगे
और वहीं लहलहाएंगे और लहराएंगे आंदोलन!

© Om Arya

Photo Credit: scroll.in

Sunday, December 13, 2020

टमाटर का शोरबा

मैं बारिश होता हूं जो 
तो वह बाढ़ हो जाती है
इस लिए नहीं कि वह मुझे बहा ले जाए
बल्कि इसलिए कि मेरे पानी के लिए कोई रास्ता हो
उसके लिए 
भीगने के 
कुछ अलग ही मायने हैं

दिन हफ्ते और महीने में 
लगभग अनगिनत बार  
वह छू लेती है 
अपनी भरी आंखों से 
मेरी मिट्टी को
जहां उसने 
एक के बाद एक पौधे लगाते हुए 
लगभग सब कुछ हरा कर दिया है
मटमैले, पीले और उदास से रंगों को काट-छांट कर

उतना आह्लादित होते हुए 
मैंने नहीं देखा किसी को कभी
किसी पहाड़ को भी नहीं जब वह जगता है सुबह-सुबह 
किसी नदी को भी नहीं जब वह लगने को होती है सागर के गले
या फिर किसी घास को हल्की बारिश के बाद
जितना कि 
वह हो जाती है एक पौधा रोप कर
मेरे इर्द-गिर्द

कुछ एक वाहियात चीजों के खातिर
मुझसे लड़ी जाने वाली लड़ाइयां
उसके लिए
मेरी ख्वाहिशों को 
अपने लिविंग रूम में 
करीने से सजा कर रखने का बस एक तरीका भर है जहां मेरा बैठना उसका सुकून हो

उसके बेतरतीब होने में एक तारतम्य है 
यहां वहां बिखरी-बिफरी चीजें भी 
मिनटों में कब करीने से लग जाती हैं
मैं नहीं समझ पाता

थाप उल्टे सीधे जैसे भी पड़े
सुर सध जाते हैं, मंच सज जाता है
और हर बार बेहतरीन प्रदर्शन
और फिर तालियों की गड़गड़ाहट से भरा
चमचमाता चेहरा
अपने आईने में बार-बार देखती है

वह अपने दिन भर की अपनी चहलकदमी से
घर की दीवारों को गर्म रखती हैं
और बाहर की हवाओं को साफ
होती हुई शाम में
वह दीए की रोशनी हो जाती है
जहां मंत्रोच्चार और घंटियों की आवाजें हैं 

जाड़े की किसी रात को वह पकाती जा रही है टमाटर का शोरबा
और मैं पढ़ता जा रहा हूं
उसमें कविताओं का स्वाद!


Monday, November 30, 2020

यह उनकी कामयाबी का वक्त है!

वे जान गए थे 
कि सही गलत कुछ नहीं होता
असल बात उसे साबित करना होता है 

और इसी क्रम में 
वे यह भी जानते थे 
कि सही को गलत साबित करने और गलत को सही साबित करने के तरीके होते हैं  जिन्हें सीखना होता है

उन्होंने इतिहास से सीखा 
कि इतिहास कैसे बनाया और बदला जाता है 
उन्होंने बाजार से सीखा भावनाओं के  इस्तेमाल से चीजों को कैसे अच्छे से बेचा जा सकता है 
उन्होंने अनुसंधान से सीखा
तथ्यों को उलटने पलटने की संभावना के बारे में
और  मानविकी विज्ञान से कि कैसे दृष्टिकोण से खेला जा सकता है

उन्होंने
पंचतंत्र की ब्राह्मण, बकरी और तीन ठग वाली कहानी को ठीक तरह से पढ़ लिया था थे और उन्हें पता चल गया था बार-बार दोहराने के विधा के बारे में

वे इस बात को भलीभांति समझ गए थे कि अगर गांधी कोई बात बोलेंगे तो लोग उसे सच ही मानेंगे
और फिर उन्होंने झूठ को बोलने के लिए  गांधी तैयार किए 
और जो तैयार नहीं हुए उन्हें झूठा साबित कर दिया और कहा कि वे दुर्भावना से प्रेरित हैं

अब वही सच है जो वह बोलते हैं कि सच है
झूठ भी वही जिसे वो झूठ बोलते हैं

यह उनकी कामयाबी का वक्त है!

Saturday, November 28, 2020

सामने वाले खुद से लड़ते हुए

खुद से लड़े हो कभी, कभी खुद पर वार किया है
खुद से जीते हो कभी खुद को हराकर
अपना लहू कैसा है मालूम है क्या तुमको
चीर कर देखा है क्या खुद को कभी?

उन्हें कमजोर मत समझो जो शांत दिखाई देते हैं 
कभी यह भी मत मान लेना 
कि जो शांत है वह कम लड़ाका होगा
कि जो शांत है उसे कभी भी हराया जा सकता है

ऐसे कुछ लोगों को मैं जानता हूं 
वे अक्सर लड़ रहे होते हैं अपने भीतर कोई लड़ाई
और लहू बस खत्म होने वाला होता है
वहां बोल कर लहू को व्यर्थ बर्बाद करने की गुंजाइश नहीं होती

भीतर की खुद से लड़ाई को बाहर के शोरगुल से बचाना जरूरी होता है
जीतने के लिए करनी पड़ती है सतत लड़ाई
इस विचार को कि खुद से लड़ना व्यर्थ है पटकनी देनी पड़ती है बार-बार
उसके लिए
गहरे उतर कर बनाई जाती है रणनीति युद्ध की
नहीं तो सामने वाले खुद को सब पता चल जाता है

खुद से लड़ने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है
कुछ मत बोलो, चुप रहो 
जब तक कि तुम नहीं
कूद पड़ते हो अपनी खुद की लड़ाई में.
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Thursday, November 26, 2020

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

Inspired by poem of Vinod Kumar Shukla ji (link given below)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
उस व्यक्ति को जानने वाले सभी लोग अभी भी चले जा रहे थे
उसके लिए कोई नहीं रुका 
और ना ही उसके पास गया
कि वह उसका हाथ पकड़कर खड़ा हो चले

काफी देर बाद किसी तरह
वह खुद खड़ा हुआ और जाने लगा
चलते चलते उसने देखा 
एक और व्यक्ति को हताशा में बैठे हुए
वह उसके पास जाकर बैठ गया
उसे वह बिल्कुल नहीं जानता था

थोड़ी देर बाद 
दोनों साथ उठे और साथ चले

 वे अब तक हताशा को जान चुके थे

और हताशा में हाथ थामने की 
जरूरत को जान चुका थे
साथ चलने की अहमियत को जान चुके थे
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विनोद कुमार शुक्ल जी की यह छोटी सी कविता कितनी बड़ी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.