Friday, April 17, 2020

महामारी में मरने वाले लोग !


महामारी में मरने वाले लोग !
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महामारी में मरने वाले सभी लोग
महामारी से नहीं मरते
उस महामारी से तो बिल्कुल नहीं
जिसे दुनिया के
ताकतवर लोग, संस्थाएं और राष्ट्रअध्यक्ष मानते हैं महामारी
और करते हैं तालाबंदी और नाकेबंदी
महामारी में मरने वाले बहुत सारे लोग
पहले से ही मरते आ रहे होते हैं
और मरते जाते हैं लगातार
अलग-अलग महामारियो की वजह से
पर वे महामारी से मरने वालों में गिने नहीं जाते
क्योंकि दुनिया के ताकतवर लोग नहीं मानते हैं उन्हें महामारी
वे मरते हैं सड़कों पर और घरों में
शोषण और दुराचार की महामारी से
वे मरते हैं भूख, कुपोषण और लाचारी की महामारी से
कुछ मर जाते हैं हताशा की महामारी से और कुछ इंसाफ में देरी की
कुछ मर जाते हैं फुटपाथ पर उन्मादी गाड़ियों के नीचे आकर
और कुछ इसलिए क्योंकि फुटपाथ नहीं होते सड़कों के किनारे
जिन पर उन्मादी गाड़ियां चलती है
वे मरते हैं व्यवस्था का अट्टहास सुनकर
वे मरते हैं सत्ता की हत्यारी मुस्कान से लहूलुहान होकर
कभी ठगे जाने से मर जाते हैं वे
कभी वे मर जाते हैं डर कर
और कभी लड़ते हुए लड़ने की मार से
कई बार
वे मरते हैं ताकत की सत्ता को बनाए रखने
या हथिया लेने की नुकीली अभीप्सा में
नए और खोज कर लड़े जाने वाले युद्धों की वजह से
या फिर
दबा देने की हिंसक खुशी पाने के लिए लड़े गए लड़ाईयों में
कभी वे मरते हैं
सहस्राब्दी विकास के लक्ष्यों में बहुत पीछे छूट कर
और कभी सतत विकास के लक्ष्यों में डूब कर
कभी दंगों में और कभी अपने कपड़ों और वेशभूषा की वजह से भी मरते हैं वे
उनसे कोई नहीं कहता कि तुम मर जाओ
क्योंकि वे जानते हैं कि एक दिन वे
बिना किसी के कहे या किसी को बिना बताए
किसी अदृश्य महामारी से मर ही जाएंगे
वे जानते है कि
महामारी को तभी माना जाता है महामारी
जब उससे मरने का खतरा
खास ताकतवर पर आ जाता है
पर उनमें से कोई भी
यह जानने की वजह से नहीं मरता
वे मरते हैं हर उम्र और हर काल में
कई बार वे एक बार भी जिए बिना मर जाते हैं
उनके माथे पर बेमौत मरने की रेखाएं होती है
भले ही वे मरते हो बेमौत
या उनकी मरने की वजह होती हो भूख जितनी मामूली
वे जीते हैं हमारी ही तरह किसी की मुस्कुराहट पर
किसी की आंखों के पानी के लिए
किसी की गोद में खिलखिलाने के लिए
जहां महामारी का कोई डर नहीं होता




Saturday, February 29, 2020

कविता का शीर्षक आग में जल गया है


तब घरों में
आग जलाने के साधन
बहुत कम हुआ करते थे।

दियासलाई भी बहुत कम घरों में हुआ करती थी।
और वह भी हमेशा नहीं।

हम गांव में
पड़ोस के घरों में
आग मांगने जाया करते थे
ताकि सांझ की रोशनी जलाई जा सके
चूल्हे जलाए जा सके
रोटी पकाई जा सके।

बारिश के दिनों में कई बार
मां कितना परेशान हो जाया करती थी
जब लकड़ियाँ सीली हो जाया करती थी
और आग भी कई घरों में घूमने के बाद
किसी एक घर से मिल पाती थी।

अगली जरूरत के लिए
आग को संभाल कर रखना होता था।
पर मां अक्सर सारा आग बांट दिया करती थी
उसका मानना था
कि आग को बचाए रखने के लिए उसे
बांटना जरूरी होता है
और इसलिए उसे आखरी बचे आग को भी
बांटने में कोई परेशानी नहीं थी।

पाठ्यक्रम में तब
पुरा पाषाण काल में हुए
आग के आविष्कार के बारे में पढ़ना
कितना रोमांचकारी हुआ करता था
और यह सोचना
कि पत्थरों को रगड़ कर आग पैदा करना
कितना मुश्किल होता रहा होगा तब

आज जब आग जलाने के बहुतेरे हैं साधन
और हर तरफ लगाई जा रही है आग
मैं सोचता हूं कि
आग मांगते-बांटते, बचाते-जलाते
यह हम आग लगाने तक कैसे पहुंच गए

क्या पुरा पाषाण काल के लोग
कभी सोच पाए होंगे
अपने आग के आविष्कार के
इस तरह के इस्तेमाल के बारे में
क्या मां जानती रही होगी कि
जो आग वह बचा रही है
वह किसी दिन
किसी का घर जला देगी

कल टीवी पर मां रोती हुई कह रही थी
कि आग में उसका बेटा जल गया है
और बिटिया झुलस गई है
और यह वह आग नहीं जो उसने बचाई थी।  


Wednesday, November 20, 2019

और इस तरह मारा मैंने अपने बोलने को

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मुझे कुछ बोलना था
पर मैं नहीं बोला
और ऐसा नहीं है कि
मैं बोलता तो वे सुन हीं लेते लेते
पर मैं नहीं बोला
मैं नहीं बोला जब कि मुझे
एक बंद कमरे से बोलने की सहूलियत भी थी
मेरे हाथों में माइक भी दी गई थी
और मैं आवाज बदलकर भी बोल सकता था
और चेहरा बदल कर भी
पर मैं नहीं बोला
मैं तब भी नहीं बोला
जब रवीश कुमार ने कहा कि बोलना ही है
और वरुण ग्रोवर ने तरीके सिखाए हंसी हंसी में बोलने की
मुझे याद आती रही सुरजीत पातर की कविता
जिसमें एक कवि हो जाता है कविता का हत्यारा
और पंक्तियां लिख लिख कर काटता है
मैं होता तो शायद बिना लिखे ही काट डालता
मुझे मालूम था कि
आज के जमाने में यह तर्क कितना स्वीकार्य है
कि कितना कठिन है बोलना
जब के सामने एक ताकतवर आदमी हो
और जब हमने देखा हो एक ताकतवर आदमी के सामने बोलने का हश्र
मुझे जो भी बोलना था
तर्क की आड़ में
उसे मैंने नहीं बोलकर पूरा किया
मैंने कहा कि यह तब भी मुश्किल है
जब सामने का ताकतवर आदमी खुद आगे बढ़कर कहे कि बोलो
क्योंकि क्या पता वह किस तरह से बोलने को किस तरह से दर्ज करें
और किस तरह की गुरिल्लगी कर दे बाद में
और तब भी मुश्किल है
जबकि कहा जाए कि संविधान बोलने की आजादी देता है, कि बोलना आपका अधिकार है
क्योंकि क्या पता संविधान की व्याख्या कब किस तरह से कर दी जाए
और इस तरह के तमाम तर्क दिए खुद को मैंने
अपने नहीं बोलने के बारे में
खुद को क्योंकि किसी और को पता ही नहीं था
मेरे नहीं बोलने के बारे में
और इस तरह मारा मैंने अपने बोलने को!


Sunday, November 3, 2019

एक भिंची हुई मुठ्ठियों की हैसियत तक!


हालात को यही मंजूर था-
यह कह कर
जब हम वहां से उठ आए,
लौटने के रास्ते में
हम अपने मामूलीपन से गुजरते हुए आए

हम खुद से
कुछ कहते हुए वहां से आए
बड़ी ही मामूली सी कोई बात
जिसे बाद तक याद रखना
जरूरी नहीं समझा
न मैंने और न किसी और ने

हमने अपनी बौखलाहट पर
बहुत पहले और बहुत बार
ठंडा पानी डालने जैसा कुछ किया था
और अक्ल पर जानबूझकर कोहरा मलने जैसा
जिसके कारण
अब हमारी मुट्ठी में भीचने के लिए कुछ बचा नहीं था
और वह जो अब बचा हुआ था, बेहद मामूली था

काश! हम तब समझ पाते
कि आखिर में जो बचता है
वह बेहद मामूली होता है
और उसके लिए
असली चीज पर ठंडा पानी डालना
कोई मामूली बात नहीं होती!

पर कोई बात नहीं 
अब जब केवल मामूली हीं बचा है 
और जिसका कि मुझे पता है 
तब मैं सोंच रहा हूँ मामूलीपन से निकलने के बारे में 
और पहुंचने के बारे में 
एक भिंची हुई मुठ्ठियों की हैसियत तक फिर!


Saturday, September 7, 2019

आप इसे आप कविता जैसा कुछ मान सकते हैं!

सरकार स्कूल अच्छा नहीं चला पा रही थी
तो उसने कहा
कि खेलना बहुत जरूरी है बच्चों के लिए
सरकार ऐसा बताना चाहती थी
कि देश से बेरोजगारी इस तरह
खत्म की जा सकती है
ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि
गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी भी
किसी चौक चौराहे पर
चाय - पकोड़े का रोजगार कर लेते थे
पर पढ़े लिखे लोगों में
बेकार या बेरोजगार होने की आदत हो जाती थी
जिसका कि बेरोजगारी के आंकड़ों पर बुरा असर पड़ता था
सरकार बहुत सालों से गरीबी हटाना चाहती थी
इसके लिए वह कई योजनाएं भी लाती थी
और गरीबी हटाने का नारा देती थी
फिर उसने गरीबी के साथ गंदगी हटाने का भी नारा दिया था
योजनाएं कितनी आती थी इसका ज्यादा पता नहीं चलता था
पर नारे जरूर आ जाते थे और वे चलते रहते थे
एक समय पर आकर
सरकार को ऐसा लगा था कि नीति अच्छी हो तो बिना योजनाओं के भी काम चलाया जा सकता है
फिर किसी दिन सरकार की नीति में यह तय किया गया
कि गरीबी हटाने से बेहतर है गरीबों को हटा दिया जाए
और फिर उसने एक दिन उनसे कहा कि
अब से तुम हमारे देश के नागरिक नहीं होगे
चुनाव के ठीक पहले
अर्थव्यवस्था को बुखार हो जाता था
जिससे वो कूदने लगती थी
और जब बाद में पेरासिटामोल खाने के बाद
वह ठंडी पड़ जाती थी
और फिर उसे रिजर्व बैंक से उधार लेकर
रिवाइटल खिलाया जाता था
ताकि वह गर्म हो सके और थोड़ा दौड़ सके, चल सके
न्यायालयों की प्राथमिकताएं बदलती रहती थी
कभी वह इस बात पर चर्चा करने लगती थी
कि राम कहां जन्मे या फिर वहां कोई घंटी मिली या नहीं मिली
और कभी किसी रेप केस पर हजारों पन्ने का फैसला पेश करती थी
ऐसा लगता था कि कानून अंधा होते हुए भी संवेदनशील था
और उसकी कोई तीसरी आँख थी जिससे वो
जिसे जब देखना चाहता था उसे तब देख लेता था
और अदालतों के बाहर एक मीडिया की अदालत में
बहस देखकर
कई लोग यह मान लेते थे कि सारी समस्या
किसी खास तरह के लोगों की वजह से थी और इनका
देश निकाला करना बहुत जरूरी था
और उधर वह बेचारी नाबालिग लड़की रोती थी
जो किसी गैंगरेप के बाद पेट में पलते हुए बच्चे को
गिराने के लिए न्यायालय के आदेश का इंतजार करती थी
जिसे कोर्ट लगभग भूल सा गया था
सरकार रेप के क़ानून को सख्त से सख्त करती जाती थी
और सोंचती थी कि बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए
सख्त कानून बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था जो इतना प्रभावकारी हो
विकास के मायनों में एक महत्त्वपूर्ण बात
एयरपोर्ट के रास्तों को
बिल्कुल चमकदार बना दिया जाना था
शायद इसलिए कि
देश में दाखिल होने वालों और
देश से भागने वालों के मन में देश की चमकदार छवि बनी रहे
कुछ लोग कहते थे कि
मीडिया का जन्म लोकतंत्र को बचाने के लिए हुआ था
पर उसका किसी ने ब्रेनवाश कर दिया था और
अब वह जहां भी लोकतंत्र को देखती थी
सरेआम गोलियों से भून देने की बात करती थी
कुछ लोग इसे मीडिया का आतंकवाद कहते थे
पर ज्यादातर लोग चुप थे
कुछ पागल से लगने वाले लोग थे जो कहने लगे थे
कि अब मीडिया ने लोगों को आतंक-पसंद बना दिया था
और इस तरह लोगों को लगने लगा था कि
देश को शांति वाली अपनी छवि जल्दी से जल्दी छोड़ देनी चाहिए
सरकार जनता को समय-समय पर तोहफा दिया करती थी
और उसे लगता था कि यही उसका काम है
और वह कहना चाहती थी कि लोगों को समय-समय पर तोहफा मिल ही रहा है
तो वे अपने काम से काम रखें और उनका साथ दें
ऐसा सालों सालों से हो रहा था था पर कुछ लोग थे और उनकी संख्या काफी अधिक थी
जो गांधी जी के तीन बंदरों से बेहद प्रभावित थे
जो न कुछ देखते थे, न सुनते थे और ना हीं कुछ बोलते थे
चाहे सरकार जो करे
यह कविता
उन लोगों के बारे में ही है और मेरे बारे में भी
आप इसे कविता या जो चाहे मान सकते हैं
पर यह सरकार के बारे में बिल्कुल नहीं है !