Thursday, September 13, 2012

तेरी हंसी से होती है तर-बतर धरती

बारिश होती है
तेरी हंसी से होती है
तर-बतर धरती

पार्क में,
जहाँ जमा हो गया है पानी,
उड़ाते हैं बच्चे
तेरी हंसी के छींटे
एक-दूसरे पर
बच्चे हंसी से नहाते हैं
खिलखिलाते हैं 

भाग-दौड़ करते हुए
गिरते हैं वे इधर-उधर
तो बजती है
तेरी हंसी छपाक से
और  किनारे पे लगे पेंड़ों के पत्तों से गिर कर
मिल जाती हैं बूंदे हंसी में

तुम हंसती हो
तो उगने और पकने के लिए
जीती रहती है धरती 

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Wednesday, March 28, 2012

कौन किसके माथे ?

रोजमर्रा की भागदौड़ में गिरते गए
और दोष मढ़ते गए गड्ढों के माथे

पता ही नहीं चलता अब सपनो का
जरूरतें जागती हैं सारी रात नींद के माथे

रहने दिया आखिर में बिना कुछ कहे
देर तक मगर हथेली रही आवाज के माथे

अब ये कहना मुश्किल बहुत है
गोली कौन दागेगा किसके माथे

उस समंदर पे बोझ कितना गहरा होगा
पानी वो नदी छोड़ गयी जिसके माथे

हर शाम वो एक तन्हाई लगा जाता है
पार्क के कोने में पड़ी उस बेंच के माथे

पेंड वो अभी कुछ देर पहले उजड़ गया है
 कई सदी से लगा था वो इस जमीं के माथे

Friday, March 2, 2012

कोई दूसरा तरीका नहीं

वक़्त को बैठा मना रहा हूँ
कि शाम का वो एक टुकड़ा फिर आने दे एहसास में
 
ऐसे क्यूँ रूठे कि
कविता की दो गज जमीन भी नहीं
जहाँ अलफ़ाज़ बैठ सके
पैर फैला के
 
पहले रौशनदान से झाँक भी जाया करती थी गर फुहारें
तो मौसमें खींच कर उन्हें
बारिश कर दिया करती थीं
जैसे एक सिरा मांजे का पकड़ आ जाए
तो पूरी पतंग खींच लाया करते हैं बच्चे
 
अब खिडकियों से लग कर
सारा सारा दिन बैठी रहती हैं कवितायें
मगर  न कोई खींचता है मांजे
न कोई उड़ाने वाला है पतंगों को
 
मौन में यह सब संवाद सिर्फ इसलिए
क्यूंकि कोई दूसरा तरीका नहीं होता
तुम्हें कविता होते हुए देखने का!
 
 

Saturday, September 24, 2011

वक़्त रिअर ग्लास की तरह है

वक़्त मोड़ देता है
कभी कान उमेठकर हौले से
कभी बाहें मदोड़ कर झटके से
और कभी इस तरह कि
बस चौंकने भर का मौका होता है

वो मोड़ता है तो
मुड़े बिना मैं नहीं और वो भी नहीं
कोई और हो तो हो
इसका पता नहीं

जब आग लगी थी
और जब जलने का मजा था
हमारा मोम पिघल कर  मिलने लगा था
वक़्त ने हमें नाक से पकड़ा
और मोड़ कर हमारी पीठ एक दूसरे की तरफ कर दी

हम किधर गए
कौन से पार किये रास्ते
वो सिर्फ वक्त को मालूम होगा
मुझे बस ये मालूम है कि
वो पिघला मोम जमा नहीं

आँखों के पानी में सब धुंधले हुए
और यूँ लगता है कि
सब न जाने कितने कोस दूर है अब

पर ऐसा सिर्फ लगता है
वास्तव में है नहीं
दरअसल वक़्त रिअर ग्लास की तरह है
चीजें ज्यादा दूर दिखाई पड़ती हैं

Friday, July 1, 2011

देश सबके लिए आजाद हो...

सवाल छोटे हों
और संक्षेप में दिए जा सकें उनके जबाब
या फिर वस्तुनिष्ट हों तो और भी अच्छे

नाम आसानी से बदले जा सकें
जैसे बदल दिए जाते हैं कपडे
नाम के लिए ना लिखी जाएँ कवितायें

बस्तों में इतनी खाली जगह हो
कि उसमें रखे जा सकें तितलियाँ, कागज़ के नाव
और पतंग भी

जिनके पास पैसा हो
सिर्फ उन्ही के पास पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य न हो
जीने का अधिकार सिर्फ संविधान में न हो

अस्पताल में दवाइयां मिल जाएँ
और स्कूल में शिक्षा
और कलेक्टर का बच्चा भी सरकारी स्कूल में पढ़े

महंगाई के प्रति सब उदासीन न हों
दाम बढ़ें तो आवाज बुलंद हो

सड़क के दोनों तरफ उनके लिए फूटपाथ हों
और शहर में कुछ ढाबे हों
जहाँ बीस-पच्चीस रुपये में भर पेट खाना मिलता हो

देश सबके लिए आजाद हो...


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Thursday, June 9, 2011

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मुझे अफसोस है
सारा प्यार मैंने एक जगह हीं लगा दिया
नही रखा मैंने
तुम्हारे सिवा कोई दूसरा विकल्प

मुझे क्या पता था
कि बारिशें होती रहेंगी आगे
तुम्हारे बिना भी
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