Saturday, December 2, 2017

समय उदास होने का एक मौका भर है


समय और कुछ नहीं है
बस उदास होने का मौका है

और ऐसा नहीं है कि
तुम उसे उँगलियों पे गिन के
ख़त्म कर दोगे
वो रहेगा तुम्हारे होने तक
और उसके बाद भी
तुम्हें उदास करने के लिए

वो तुम्हें कभी पीली पत्तियों के मार्फ़त
और कभी टूटते तारों की शक्ल में
किया करेगा उदास
और चाहेगा कि तुम जिरह मत करो
कि तुम उन पत्तियों से अलग हो
जो हर साल पीली होकर
छूट जाती है शाख से

और वो चाहेगा कि तुम इस बात पर गौर करो
कि कल की सुबह जब दुनिया के कुछ लोग सो कर जागेंगे
तो कुछ नहीं भी जागेंगे
और उनकी संख्या हजारों में होगी
और गौर करते हुए उदासियत में रहो

वो चाहता है कि
कोई उसका बेजा इस्तेमाल
अपने मतलब निकालने में ना करे
और बेमतलब दौड़ लगा कर हांफने में
उसे खर्च न किया जाए
बल्कि
फूलती साँसों को ठहर कर देखने और
उसमें इकठ्ठे कार्बन
को घिस-घिस कर
उसके रहते साफ़ कर लिया जाए 

समय और कुछ नहीं है
बस उदास होने का मौका भर है
और वह मौका है बहुत सारे जरूरी
चीजों के बारे में
यह सोंचने का
कि वे दरअसल कितने  जरूरी अथवा गैर-जरूरी हैं

मगर आप चाहें तो
उसे खुश रह कर बर्बाद भी कर सकते हैं!



  

Wednesday, November 22, 2017

मेरा जागना तुम्हारी नींद को चुभता रहे!



मैं जानती हूँ
तुम सो रहे होगे अभी
यह जानते हुए भी
कि मैं जाग रही होउंगी

पर मैं जागती रहा करूंगी 
सिर्फ इसलिए
कि तुम ये जानते हुए सोओ
कि मैं जाग रही होउंगी
और तुम अपनी नींद में भी
मेरे जागने की नोक पर रहो

और कल की एक और सुबह जब
तुम जागो...

तो मैं अपने बिस्तर से उठकर
कैलेंडर की एक और तारीख पर
गोला लगा दूं
कि जिसमें
तुम सोये रहे
यह जानते हुए कि
मैं जाग रही होउंगी
और फिर उन्हें,
उन गोले लगे तारीखों को
कभी नहीं गिनूँ!

मेरा जागना तुम्हारी नींद को चुभता रहे!


Sunday, November 19, 2017

मैं तुम्हारी बारिश में बहुत उपजता हूँ...

मैंने तुमसे पूछा था
कि सबसे ज्यादा क्या पसंद है तुम्हें
और तुमने कहा था-
बारिश में भींगना

मैं तभी समझ गयी थी
कि तुम प्रेम-बीज हो
भींग कर, फूट कर,
अंकुरित होकर
लहलहा कर एक दिन भर दोगे मेरे जगत को

और ठीक वैसा हीं हुआ
मेरा ये जगत लहलहा उठा है

मैं  तभी तुम्हारे साथ चल पड़ी थी
हम घूमें बादल-बादल
उड़े आकाश-आकाश 

और फिर एक लाल सुर्ख शाम को
मैंने बारिश को
जब लिया था अपने आगोश में
तब तुमने भी अपनी बाहें खोल दीं थीं

मैं उपजाऊ बनी
और तुम लहलहाए

प्रेम अब और उपजता है
प्रेम की बारिश अब और होती है
और पता नहीं इन लहलहाते खेतों को क्या हुआ है
ये भी बढ़ते हीं जा रहें हैं
न ओर, न छोर !

Saturday, November 18, 2017

अब फिर एक और लम्बा, भूरा और इकहरा समय


कितना समय,
कितना लम्बा, भूरा और इकहरा समय
गुजारने के बाद
मैने फिर से हासिल किया था वो लम्हा,
पहुंचा था उस लम्हे के करीब
जिसके ताप में
खाक होना
अब बस एक लम्हे की बात थी

और...
देखो फिर चूक गया

ये नही कहूंगा कि
तुमने रोक लिया अपनी लपटों में आने देने से मुझे 

जरूर उस लम्हे को पार करना इस जन्म की
नियति नही रही होगी 
या फिर
उस तरह खाक होना 
मुश्किल होता होगा 
इस तरह खाक होने से!

Thursday, September 13, 2012

तेरी हंसी से होती है तर-बतर धरती

बारिश होती है
तेरी हंसी से होती है
तर-बतर धरती

पार्क में,
जहाँ जमा हो गया है पानी,
उड़ाते हैं बच्चे
तेरी हंसी के छींटे
एक-दूसरे पर
बच्चे हंसी से नहाते हैं
खिलखिलाते हैं 

भाग-दौड़ करते हुए
गिरते हैं वे इधर-उधर
तो बजती है
तेरी हंसी छपाक से
और  किनारे पे लगे पेंड़ों के पत्तों से गिर कर
मिल जाती हैं बूंदे हंसी में

तुम हंसती हो
तो उगने और पकने के लिए
जीती रहती है धरती 

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