Wednesday, November 11, 2009

ऐसा नही है कि ये धुंध नया है !!

ऐसा नही है कि ये धुंध नया है
धुंध होते आए हैं
और आँखें मात खाती रही हैं

जब जाड़े के दिनों में
साइकिल पे निकला करता था
सुबह-सुबह ट्यूशन के लिए,
ये धुंध तब भी किया करती थी परेशान

ये धुंध तो हटाये नही हटती थी
जब बारहवीं की परीक्षा में
पहले निस्कासित और फिर बाद में
अनुतीर्ण होना हो गया था

इस धुंध ने हाथ पकड़ लिए थे मेरे
जब एक उमरदराज़ औरत के प्रेम में था
और निकलना चाहता था
और तब भी जब मुझे पड़ने लगे थे
मिर्गी के दौड़े अचानक से

पढ़ाई पूरी होने के बाद
रोजगार की तलाश में
जब निकल आया था घर से मैं
तब भी बिल्कुल यही धुंध छाई हुई थी चेहरे पे

आज भी धुंध हैं कुछ
और मैं जानता हूँ आगे भी रहेंगे ये
क्यूँकि जिंदगी बिना धुंधों के सफर नही करती

अभी तक के सारे धुंधों से तो
निकाल लाए हो तुम,
ऊँगली पकड़े रखा है मेरा
और अकसर पूछते हो
कि मैं कहीं लडखड़ा तो नही रहा
और आश्वस्त हो जाते हो जान कर कि मैं सकुशल हूँ.

पर मैं सोंचता हूँ उन दिनो के बारे में
जब धुंध तो होगी, पर तुम नही रहोगे

तब मैं कैसे निकलूँगा उन धुंधों से पापा !!!

Monday, November 9, 2009

बारिश में दास्तान

१)
बीच-बीच में
बिलकुल साफ़-शफ्फाक मौसम
और फिर
कभी हलकी, तो कभी
दनदनाती आती तेज बारिश...

आज मुझे,
सुना रहा था,
दास्ताँ-ए-इश्क बादल!

२)
मेरे कमरे की
कालीन तक पहुँच गया है समंदर
और लहरें उसकी
बार-बार मेरे बिस्तर को छूने लगी हैं

साहिल टूट तो नही जाएगा

3)
तुमने पोंछ दी थी
जो नज़्म लिख के कागज़ पे कल
उसमें मेरा भी नाम था शायद...

आज अखबार में मेरे लापता होने की
ख़बर आई है

४)
कल रात उसके ख्वाब ने
रंगे हाथों पकड़ा मुझे

मैंने पकड़ी हुई थी कलाई
किसी और ख्वाब की

५)
ओस की बूंदों में
थी आंसुओं सी गरमाहट

पता नही रात किस लिए रोई थी

Saturday, November 7, 2009

रजाई कम पड़ गयी है...

नींद औंधा पड़ा है
रजाई में सिकुड़ कर,
इस तरह जैसे सर्दी ज्यादा हो
और रजाई कम पड़ गयी हो

बाहर,
आंगन में
नींद से बिछुड़े हुए ख्वाब
टूट-टूट कर
गिर रहे हैं
कुछ हीं देर में नींद नंगी हो जायेगी शायद

निहायत कमजोर सा कोई वक़्त
अपने टखने में
दर्द लिए चल रहा है,
शायद अपने बुढापे में है.

आईने में
जब देखती हैं आँखें
दिखाई पड़ती हैं
कुछ सफ़ेद पपनियाँ

ऐसे में मैं ढूंढता फिरता हूँ
तुम्हारे हाथों से
बनायी हुई
एक कप कड़क काली चाय

ऐसा तबसे है जबसे
तुम छोड़ गयी हो मेरा किचेन !

Wednesday, November 4, 2009

अगर कहीं इन्साफ है !

वे कौन सी आत्माएं होंगी
जो होंगी
अगले जन्म में कुपोषित, भूखी
और मृत्यु के किनारे पे उनके शरीर

जिनके शरीरों के पेट फूले हुए होंगे
हाथ बदन से लटके
आँखें भूख में एकटक
और पसलियाँ छाती के बाहर
आ रही होंगी,
वे कौन सी आत्माएं होंगी

कौन सी आत्माएं होंगी २०५० में
जिनके शरीरों पे टिकाई नही जा सकेगी
जरा देर भी नजर

अगर कहीं इन्साफ है
तो ये वो आत्माएं होंगी
जो जिम्मेवार हैं वन और वन्य जीव के लुप्त होते जाने के
प्रदुषण के
खेतों के बंजर होते जाने के
और आखिरकार जलवायु परिवर्तन के लिए

Monday, November 2, 2009

मेरी अधूरी संवेदनाएं !!!

चीखों में हीं बोलती हैं
ये वेदनाएं
या रहती हैं चुपचाप आँख फाड़े अवाक

समझ में नहीं आती ये वेदनाएं
क्यूँ-कहाँ-कैसे-कब

जहां तक भी देखना हो पाता है
दिख जाती हैं ये
बिखरी पड़ी हुईं
गोल, चौकोर या लम्बोतरे चेहरे में

घर की चाहरदीवारी पे बैठी हुई कभी,
कभी रसोई घर के बाजू में खड़ी
कचरा घर के आस-पास भी
घर के कोनो में, दरवाजे के पीछे,
दराजों के नीचे
कभी सड़क के किनारे या रेलवे प्लेटफार्म पर
और न मालुम कहाँ और कब-कब

मैं बैठता हूँ अक्सर इन वेदनाओं के बाजू में
और कोशिश करता हूँ
सुनने की उनकी चीखों में उलझे सूखे शब्दों कों
और पूछता हूँ जब वे मिल जाती हैं अवाक
कि कौन हैं वे
पर नहीं मालुम क्या बोलती हैं ये वेदनाएं

जब तक नहीं समझ लूं इन्हें मैं
नहीं पूरी होंगी
मेरी संवेदनाएं!

Saturday, October 31, 2009

अब क्या शहर और क्या गाँव !!

शहर
या तो
अलग – अलग क़तारों में
ख़ड़ा है
बंटा हुआ,
या
फिर उपस्थित है
दौड़ता हुआ
भागदौड़ क़ी परिधि पे,
अपनी पूरी थकान के बाबजूद

कुछ शहर जाने जाते हैं नहीं सोने के लिए
और कुछ कतार में भी दौड़ने के लिए

शहर को मैने
कभी फुरसत में नही देखा
ना हीं कभी एकजुट.

बहुत बड़ी-बड़ी कतारें
उपस्थित हैं
बहुत छोटी-छोटी जगहों में
जगह के बीच से
जगह निकालते हुए

एक टूटते हुए और
दूसरे बनते हुए कतार के बीच के
अंतराल को आप छू नही सकते
और ना हीं कतार बदलने वाले को

जरा सा भी असावधानी
आपको बे-कतार कर सकती है
और फिर आप किसी भी कतार के शिकार हो सकते हैं

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

Thursday, October 29, 2009

हमने कई बार देखा है समंदर कों नम होते हुए !

लोग किनारे की रेत पे
जो अपने दर्द छोड़ देते है
वो समेटता रहता है
अपनी लहरें फैला-फैला कर
हमने कई बार देखा है समंदर कों नम होते हुए

जब भी कोई उदास हो कर
आ जाता है उसके करीब
वो अपनी लहरें खोल देता है
और खींच कर भींच लेता है अपने विशाल आगोश में
ताकि जज्ब कर सके आदमी के भीतर का
तमाम उफान

कभी जब मैं रोना चाहता था
पर आंसू पास नहीं होते थे
तो उसने आँखों कों आंसू दिए थे
और घंटों तक
अपने किनारे का कन्धा दिया था

मैं चाहता था
कि खींच लाऊं समंदर कों अपने शहर तक
पर मैं जानता हूँ
महानगर में दर्द ज्यादा होते हैं ...

और समंदर की जरूरत ज्यादा !!!