Wednesday, April 3, 2019

इसकी-उसकी आड़ में हत्याएँ!

एक भीड़ का हिस्सा होकर
जिस दिन तुम्हारे हाथ
आततायी हाथों में तब्दील हो गए
उस दिन की रात घर तो नहीं लौटे होगे तुम

और अगर लौटे भी होगे तो
तो घर के किसी कोने को पकड़ कर सिमट गए होगे
बत्तियों को कर दिया होगा बंद
और बीबी-बच्चों को, माओं-बहनों को कर दिया होगा पास आने से मना
फिर तुम अँधेरे में बेआवाज रोये भी होगे
जब तुमने सोंचा होगा
उस आदमी और उसकी आँखों में उभरे खौफ और लाचारी के बारे में
और तुम्हें डर भी लगा होगा
जब तुमने उसकी जगह खुद को रख कर देखा होगा
अगली रोज अखबार पढने के बाद

या मैं गलत सोंच रहा हूँ
तुम और तुम्हारे जैसों के बारे में
तुम वो हो
वही जो जीतने के लिए,
सत्ता बनाने या बचाने के लिए
मारने या रेप करने के लिए
या फिर अपनी मामूली जरूरतों के लिए
बनाते हो एक भीड़ 
और उसकी आड़ में करते हो हत्याएं

तुमने ईजाद की है हत्या की ये तकनीक
जहाँ क़ानून के साथ कुश्ती खेली और जीती जा सकती है

अगर मान भी लिया जाए कि तुम वो नहीं हो
जो मामूली जरूरतों के लिए
कायरों की तरह लेते हो भीड़ की आड़
कि तुम डरे थे, आशंकित थे अपनों के लिए
कि जायज था तुम्हारा डर

तो भी सिस्टम की असफलता को
किसी एक के माथे कैसे थोप दिया

उस वक्त
जब तुम उस भीड़ का हिस्सा बने और की हत्याएँ
क्या कर सकते थे तुम अपनी आड़ में

क्या तुम्हारा गुस्सा
वास्तव में किसी अन्याय के खिलाफ था

Tuesday, April 2, 2019

अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं !

मैंने छुए अल्फाज उसके
और उसने मेरी ख़ामोशी पे अपने हाथ रखे,
कभी पहले हुई कविता फिर कविता हुई


फिर वो मॉनसून हुई
और मैं बारिश,
सूखे गिले सारे गीले हुए


हंसी वाले उसके दो होंठ फिर खुल कर
चूमने लगे बादल
मुझे ठीक से पता नहीं कब बरसने लगी बूंदे,
धरती पर
टप-टप
हर तरफ हँसने की गीली तस्वीरें


जैसे हीं कविता फिर
विस्तार लेकर निराकार हुई
मैं उसमें गुम होकर आकार हुआ


जाने ये सब कितनी जल्दी हुआ
कि जरा सी देर में सब भर गया,
आँख भी, ख्वाब भी
और आँखों में अरसे से बने ख्वाब के घाव भी


अभी ख्वाब के गहराने के दिन हैं
उन्हें अभी और भरना है









Friday, March 22, 2019

उसके लिए जो खोलता है मुझे

वो लौट आया है!

वो लौट आया है
वे दिन, लौट आये हैं उसके साथ

मगर, ये लगभग तय सा है कि
वे दिन जो लौट आए हैं उसके साथ,
फिर लौट जाऐंगे उसके साथ हीं

सांसें कितनी उठ रही हैं उंची
ख्यालों में, तमाम तरह के जुर्म हो रहे हैं इकठ्ठा
रातों के होने के ढंग में भी सपनों से खलल है
और मेरी बाहें फैली हुईं हैं
उन थोड़े से उन दिनों को बांधने के लिए
जो मुठ्ठी भर हैं

वो जो रोकता है और वो जो खोलता है
उसके दरम्यान उठती
आंधियों को रोकते-रोकते बारिश को आंखों तक आते अभी-अभी देखा मैंने

ये जानने के बावजूद कि
वे दिन जो लौट आये हैं उसके साथ
वे दिन फिर लौट जाऐंगे उसके साथ हीं
हम कुछ अफसोस फिर से रख लेंगे संजो कर
अगली बार की वसंत के लिए!!


Tuesday, February 27, 2018

उन घर की दीवारों में कोई आंसू तो नहीं है !


१)
जहाँ भी लौट कर आया हूँ
मिला है मुझे
एक पूरा घर तुम्हारे पास

तुम्हारा इंतज़ार
बना देता है किसी भी घर को मेरा अपना

इतने सालों तक अलग-अलग घरों में
तुम्हारे साथ रहते हुए
अब ये भली भांति पता है कि
घर बनाने के लिए
और कुछ नहीं
जरूरी है सिर्फ लौटना और इंतज़ार

२)
यह इतनी बार इत्तेफाकन नहीं होगा
कि तुम मेरी नींदों में
ख्वाब भरती हुई जागती हो सुबह
और तब से
सारा दिन लम्हों को पकड़-पकड़ के
बांधती रहती हो एक खुशनुमा दिन
जिसकी शाम बारिश होती है

बाथरूम से नहा कर निकलते हुए
शरारतें तुम्हारे बालों में
इकठ्ठा होकर लट बना देती हैं
और तुम उन्हें कैसे झूठमूठ झटकती रहती  हो 

किचेन में गुनगुनाती हुई
पकाती हो तुम सारंगी के जायके वाली
लौकी की सब्जी
और परोस देती हो जब दही के साथ
तब मुझे कुछ और नहीं चाहिए होता है

मैं होता हूँ तो तुम्हें कुछ और नहीं चाहिए होता है

३)
तुम्हारा इंतज़ार करता हुआ घर
मुझे लगता है
उस बहते पानी की कलकल धुन है
जो मंजिल पे पहुँचने की तमाम बेचैनी के बावजूद
अपने लय की मिठास नहीं छोड़ती

वो मुझमें भरता है
एक बिछोह से
जब जाने के लिए लौटता हूँ

वो मेरे पीछे दूर तक भागता चला आता है

४)
गुनगुनी हंसी
और मीठी बोलियों से
सजाये रखती हो तुम घर की दीवारें

और कभी बनाती हो उनपे निशान ठहाकों से
ताज्जुब कराने को रखती हो तैयार
घर में दसियों औजार

कभी होगा तो हम चल कर देखेंगे उन घरों को
जो बनाये हमने 
लौटने और इंतज़ार करने से 

उनकी दीवारों में कोई आंसू तो नहीं है !



Saturday, February 24, 2018

विरोध के लिए प्रेम!

मैं तुम्हारे इश्क में डूब जाना चाहता हूँ
इतने गहरे डूबना कि
वो प्रदर्शित हो सके

तुम्हारे या फिर किसी और के इश्क में भी
डूबना स्वीकार्य है मुझे

यह तब है
जब मुझे बताया जा रहा है
कि प्रेम करने के खतरे असहनीय रुप से बढ गये हैं
और विरोध करने के भी

क्यूंकि मेरा डर मेरे विरोथ को दबा देता है
मैं किसी के भी प्रेम में डूब कर
प्रेम और विरोध के खतरों के विरोध में होना  चाहता हूँ

पर तुम्हारे प्यार में डूबना ज्यादा अच्छा रहेगा न
पुरजोर विरोध के लिए!