Thursday, April 8, 2010

जरूरतें, विश्वास और सपना


जब तुम घोंप आये
उसकी पीठ में छुरा
मैंने देखा
उसके खून में पानी बहुत था

जिन मामूली जरूरतों को लेकर
तुम घोंप आये छुरा
उन्ही जरूरतों ने
कर दिया था उसका खून पानी

**
तुम बार-बार खोओगे
विश्वास
कहीं सुरक्षित रख के

वे इधर-उधर हो जाते हैं
रोजमर्रा की
कुछेक जरूरी चीजों के हेर-फेर में

***
बहुत तेजी से
बदल रही हैं कुछ जरूरतें
सपनो में

जैसे घर एक जरूरत था पहले
पर अब एक सपना है

****
वक्त भाग कर
जल्दी-जल्दी दिन गुजारता है
जब उसे
इक रात की जरूरत होती है

और रात
नींद की जरूरत में
वक़्त को सो कर गुजार देती है
*****

15 comments:

kshama said...

Phir ek baar gazab kiya hai aapne!

सुशीला पुरी said...

बहुत सुंदर रचना !!!

Suman said...

उन्ही जरूरतों ने
कर दिया था उसका खून पानी
nice................................

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

har ek kashanika bahut sundar hai ...aur mujhe khas taur pe pehli aur akhir wali pasand aayi .... realistic approch liye hue hai aap ki poetry ....

डॉ .अनुराग said...

तुम बार-बार खोओगे
विश्वास
कहीं सुरक्षित रख के

वे इधर-उधर हो जाते हैं
रोजमर्रा की
कुछेक जरूरी चीजों के हेर-फेर में



सबसे अच्छी यही लगी.....


आपका ब्लॉग कुछ प्रोब्लम कर रहा है .पूरा नहीं खुलता है .....देखिएगा जरा .....टिपण्णी करने में परेशानी हो रही है

चंदन कुमार झा said...

बेहतरीन लगी !!!

वन्दना said...

ओम जी
हर बार एक अलग ही रंग लिये होती हैं आपकी रचनायें।

अनामिका की सदाये...... said...

har shanikha khoobsurat gehre rango se sajayi hai.
badhayi.

सन्ध्या आर्य said...

जिन जमीनो पर कभी
फूलो के बहार होते थे
आज कचरा से भरा पडा है
सडांधो के अधिकार मे है
हमारे जमीन और जमीर
ऐसी प्रदूषण की उफ्फ्फ्फ्फ्!

Archana said...

"जरूरतें होने लगती हैं
सपनों पर हावी
पर विश्वास
जिन्दा रखता है
सपनों को भावी....."
या
" जरूरतें होने लगती है
हावी--- सपनो पर ...
और विश्वास जिन्दा रहता है
भावी सपनों पर .....

singhsdm said...

आर्य जी
बहुत सुन्दर रचनाएँ हमेशा की तरह......!ये छोटी छोटी कवितायेँ बहुत मारक असर रखती हैं.....

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

ओम ॐ भैया .............बहुत दिनों बाद मैं फिर से ब्लॉग पर जिंदा हुआ हूँ .............और क्या पढ़ रहा हूँ ...............ज़रूरते ...........विश्वाश और सपना ....................@ आपकी कलम से ,नहीं मालूम जिंदगी मेरा सपना हैं याकि ज़रूरत ............पर जितने दिन मैं ब्लॉग (मुख्य धारा) से दूर रहा ये विश्वाश अवश्य था की आपकी कलम जिंदगी को ज़रूर लिख रही होगी ..............प्यारे ॐ भैया ...........प्रणाम .............आप बहुत ज़हीन हो यार .......और पता हैं मेरा आपके साथ होना नितांत ज़रूरी हैं ........दिलकश और खुबसूरत इरादों को हमेशा नज़र से बचना चाहिए .......थोडा सा काला कपड़ा या काला जूता baandh देते हैं न ऐसे ही मैं भी आपकी कला का काला जूता हूँ ..........

अपूर्व said...

वक्त भाग कर
जल्दी-जल्दी दिन गुजारता है
जब उसे
इक रात की जरूरत होती है

और रात
नींद की जरूरत में
वक़्त को सो कर गुजार देती है

और हम अपनी आपाधापी मे दिन-रात की इस चक्की के बीच पिसते रहते हैं..जिंदगी गुजर जाती है...
बेहतरीन कविताएं

संजय भास्कर said...

ओम जी
हर बार एक अलग ही रंग लिये होती हैं आपकी रचनायें।

neera said...

सुंदर! प्रभावशाली! मन को भेदने वाली!