Tuesday, July 14, 2009

चीजें जो कभी करती है खुश और कभी उदास !

इस कायनात के
बहुत सारी चीजों में से
कुछ चीजें ऐसी हैं
जो कभी कर देती है खुश और
कभी उदास, वही चीजें

वे चीजें करीब होती हैं दिल के

इतने करीब कि
निकलती हैं साँसों को छूते हुए

मोहल्ले के चौराहे से
निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए
उन पर अक्सर अपने ख्वाबों को चलते देखा है

उस बरगद के नीचे अक्सर बैठी मिल जाती है मेरी छाँव
जो तुम्हारे स्कूल के रास्ते में पड़ाव था

गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम

और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास

29 comments:

श्यामल सुमन said...

और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास

बहुत खूबसूरत भाव चित्र ओम भाई। गहरी बात। वाह

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

MANVINDER BHIMBER said...

गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम

और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास
सच में ये पंक्ति इतनी सशक्त तरीके से अपने आपको प्रस्तुत कर रही है के कुछ कहते नहीं बन रहा है

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सही .. बहुत सुंदर भाव !!

mehek said...

गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम
sahi kuch yaadein bahut kareeb hoti hai dil ke,sunder rachana.

sada said...

ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास

बहुत सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

सागर said...

चंद कलियाँ निशात की चुनकर
मुद्दतो महवेयास रहता हूँ
तुमसे मिलना खुशी की बात सही
तुमसे मिलकर उदास रहता हूँ

--- साहिर लुधियानवी

नीरज गोस्वामी said...

निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए
उन पर अक्सर अपने ख्वाबों को चलते देखा है
लाजवाब...क्या बात कही है...

नीरज

awaz do humko said...

गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम

और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के

bahut sundar

डॉ. मनोज मिश्र said...

और ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास...
बहुत खूबसूरत भाव.

‘नज़र’ said...

बहुत बेहतरीन प्रस्तुति

vandana said...

nikalti thi jo raah tumhare ghar ke liye
un par aksar apne khwabon ko chlte dekha hai

poori rachna ki jaan ban gayi hain ye panktiyan.bahut badhiya.

संध्या आर्य said...

बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर भाव से गुथी हुई पंक्तियाँ

जिसमे यादे झुले झुल रहे है .........इन यादो से पैदा हुई भाव बहुत ही सुन्दर है ......एक सुन्दर रचना के लिये बधाई

दिगम्बर नासवा said...

मोहल्ले के चौराहे से
निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए
उन पर अक्सर अपने ख्वाबों को चलते देखा है

Vaah... man ko choo liyaa in panktiyon ko .... aksar kabhi kabhi deevaanepan mein insaan pratiskhaa kartaa hai chip chip kar unke ghar ke aas paar aur fir door tak jaata hai saath.....

Aise hi pal sachmuch kabhi khush aur kabhi uds kar jater hain.... saarthsk, jivit pal hain aapki kavitaa mein...

pukhraaj said...

खुशी यूँ भी मुझे ढूँढा करती है....

anil said...

बहुत ही सुन्दर रचना लाजवाब !

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

बहुत सुंदर ॐ भाई कितनी सुन्दरता से आप ने भावो की प्रवहता को व्यक्त किया है अतुलनीय है
उस बरगद के नीचे अक्सर बैठी मिल जाती है मेरी छाँव
जो तुम्हारे स्कूल के रास्ते में पड़ाव था

सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

सुन्दर अभिव्यक्ती, यादों के दायरे में सिमटे हुये उन अप्रतिम पलों कि जिन की महक अक्सर तनहाईयों में भिगो जाती है।

सुन्दर चित्रण और प्रतीकों का प्रयोग।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

KK Yadav said...

गर्मी की दुपहरी में
मिल जाते हैं मन के झूले
उस आम के पेड़ से झूलते हुए
जहाँ झूला करती थी अपनी सहेलियों के साथ तुम
...apne to purani yadon men dubo diya. ab nahin puchh baithiyega ki kiski !!

अनिल कान्त : said...

भावनाओं का सागर परोसा है आपने

M VERMA said...

मोहल्ले के चौराहे से
निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए
उन पर अक्सर अपने ख्वाबों को चलते देखा है
===
काश उस राह पर कुछ दूर चल लेते.
बहुत सुन्दर रचना

Mrs. Asha Joglekar said...

ऐसी ही कुछ और चीजे बहुत करीब हैं दिल के
जो कभी करती रहती है खुश और कभी उदास
सही कहा और खूबसूरती से कहा ।

जितेन्द़ भगत said...

ऐसा लगा जैसे कुछ छूट गया हो। भाव जगाने के लि‍ए आभार।

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