Monday, July 20, 2009

आवाज शोर की तरफ़ जा चुकी है

एक ऐसी दुनिया थी
जहाँ
आवाज कानो में नही गिरते थे
जब तक कि उसे शोर से भारी न बना दिया जाये

क्यूँकि वहां के लोग
धीरे-धीरे अपने कान मौके के अनुसार
ढालने में सक्षम हो गए थे

उसी दुनिया में
कुछ लोग
अपनी खामोशी लेकर खड़े हो जाते थे
सुने जाने के इन्तिज़ार में

उन खड़े लोगों को
उस दुनिया से
समय रहते निकाल लिया जाना जरूरी था

पर उन लोगों को
वहां से निकाल लेने का हुनर
किसी के पास नही बचा था.

23 comments:

सागर said...
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सागर said...

और हम खड़े रहे; मोड़ पर रुके-रुके
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे...

... जब लोग खामोशियाँ सुनने को तैयार होते है देर हो चुकी होती है मेरे दोस्त...

बहुत गौर से पढना होगा इससे, यह सिर्फ वो नही है जो लिखा गया है...
हम समझते है... यह भी खामोशी....

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

एक बहुत ही सटीक कविता के लिये दिल से बधाईयाँ।

यह सच कि उन लोगों को उस दुनिया से निकाल लिया जाना चाहिये;

ना जाने कब
सुने जाने का इंतजार करती खामोशियाँ
बदलने लगे आवाजों में
कान से भी भारी, आवाजों में
और सुनी जाने लगे।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

विनोद कुमार पांडेय said...

aaj har aawaj shor ban gayi hai..
pyari aur mithi baat kho se gayi hai..

aur log bhi isi shor me dhalate ja rahe hai..jaisa ki aapne kavita ke madhdhyam se darshaya..

vicharon ka badhiya sangam..
sundar kavita..badhayi..

दिगम्बर नासवा said...

वाह........... आप भावों को इतनी आसानी से शब्दों का जामा पहना देते हैं की गहरी बात भी सहज ही नया रूप ले लेती है.......... बहूत ही खूबसूरत है यह रचना

M VERMA said...

ओम जी
गहराई इतनी कि ---
शायद आपकी इस कविता ने जो कुछ कहा है उससे ज्यादा ही सुनायी दे रहा है
बहुत खूब

raj said...

khamoshio ki bhi zuban hoti hai....

mehek said...

aaj ke haalat bhi kuch aise hi tho hai,ek sashakt rachna badhai

Suman said...

good

Nirmla Kapila said...

खामोशी कुछ ना कह कर भी बहुत कुछ कह देती है और आपके इस मौन के खाली घर मे तो ज़िन्दगी की बहुत सी सी संवेदनयीं हैं बहुत बडिया पोस्ट आभार्

Nirmla Kapila said...

खामोशी कुछ ना कह कर भी बहुत कुछ कह देती है और आपके इस मौन के खाली घर मे तो ज़िन्दगी की बहुत सी सी संवेदनयीं हैं बहुत बडिया पोस्ट आभार्

अल्पना वर्मा said...

उसी दुनिया में
कुछ लोग
अपनी खामोशी लेकर खड़े हो जाते थे
सुने जाने के इन्तिज़ार में

- gahan bhaav लिए हुए यह rachna..जहाँ तक samjh aayi... आज की vastvik paristhityon पर एक kataksh है.

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओमजी,
आपकी टिप्पणी के लिए आभारी हूँ. 'जनता पूछती है...' तात्कालिक प्रभाव की प्रतिक्रिया मात्र है. फिर भी वह आपको प्रीतिकर लगी; यह जानना मुझे अच्छा लगा. शुक्रिया !
'man ke khaali gahar me' tahal aaya hun, 'aawaz shor ki taraf ja chuki hai' jaandaar, shaandaar rachna hai. badhai sweekaar kare.

Prem said...

bahut sunder rachna hai.

sada said...

ना जाने कब
सुने जाने का इंतजार करती खामोशियाँ

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Razi Shahab said...

bahut behtareen

Dhiraj Shah said...

om bhai aap itani khubasurat rachana khaa se likha lete hai mujhe bhi apana gur hame bhi de

nice post

'अदा' said...

मौन को मुखर करती हुई आपकी रचना
बहुत भली लगी..
बधाई...

संध्या आर्य said...

आवाजो के शोर मे खामोशी कही खो गयी है ......जहाँ सिर्फ खमोशी है ....खमोशी शायद अपनी आवाज लिये मौन मे है ........शुभकामनाये

महामंत्री - तस्लीम said...

Bahut khoob lokhte hain aap.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

vishnu-luvingheart said...

akatya satya....aaj ke parivesh mein...
Dhnyavad....

vikram7 said...

अति सुन्दर रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

Prem said...

बहुत सुंदर भावः हैं --बधाई