Wednesday, July 29, 2009

कुछ कोशिशें अपने कदम रोक लेती हैं

कुछ फ़ासले पर कोहरा है थोड़ा
जिसके उस पार जाने की लगातार कोशिश कर रहा है
एक एहसास
पर चीर कर पहुँच नही पा रहा.

जज्बों में धूप शायद उतनी तेज नही

कोहरे के उस पार
जीवन
दरवाजे के पल्ले भिडाये
कमर तक रजाईया लपेटे
इंतेज़ार कर रहा है किसी खटखटाहट का
दरअसल, उसी एहसास के दस्तक का.

सब कुछ कितना आसान सा है
पर नही मालूम क्यूँ
कुछ कोशिशें अपने कदम रोक लेती हैं,
या फिर कदम बढाने में बहुत वक़्त लगता है.

(यहाँ शायद यह बता देना जरूरी है कि ये कविता कभी जाडे के मौसम में लिखी गई थी.)

21 comments:

sada said...

जज्‍बों में शायद धूप उतनी तेज नहीं, बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

AlbelaKhatri.com said...

mujhe toh ab bhi aapki kavita ne jaade ka ehsaas kara diya............

waah
waah

bahut khoob kavita !

सागर said...

धूप निकली है मुद्दतों के बाद...
गीले ज़ज़्बे सूखा रहे है हम...


बहुत अच्छी कविता... आप लगातार अच्छा लिख रहे है... बहुत बेहतर...
हाँ जाड़े वाली बात नही भी लिखते तो चलता... भाई हम आपके सीरीयस रीडर है... कुछ काम पाठकों पर छोड़ दीजिए...

Science Bloggers Association said...

बहुत शानदार लिखा है आपने। बहुत बहुत बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

raj said...

ek or khoobsurat ahsaas...koshish insaan jaha nakaam hai...uske aage bus khuda ka naam hai....

डा. श्याम गुप्त said...

ओम जी, सुन्दर रचनायें,
बस हिन्दी लिपि को और सुधार करें।

awaz do humko said...

बेहतरीन

दिगम्बर नासवा said...

दरवाजे के पल्ले भिडाये
कमर तक रजाईया लपेटे
इंतेज़ार कर रहा है किसी खटखटाहट का

खुश नुमा मौसम में लिखी लाजवाब रचना............बेजोड़ हैं आपके शब्द..........जज्बों की धुप में वो तेजी नहीं.......... दरवाजे भिडाये प्रतीक्षा करता है कोई.......... क्या खूब लिखा है

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर भाव भरी रचना.

आपकी कविता पढ कर एक शेर याद आ गया

एहसास मर न जाये तो इन्सान के लिये
काफ़ी है राह की इक ठोकर लगी हुई

लिखते रहिये

kshama said...

Koshishen nakaamyaab nahee...! Jab itne sab bloggers ne padha aur saraha...! Har jazbeme dhoop tez hai..!

http://kshama-bikharesitare.blogspot.com

शोभना चौरे said...

kohre aur jajbato ka achha smmishran hai.
abhar

'अदा' said...

कुछ कोशिशें बिना कामयाब हुए बगैर रह जाती हैं,
या फिर कामयाब होने में बहुत वक़्त लगता है.
bahut badi sacchi ka bayan karti hai aapki kavita...
saarthak, sajeev....
badhai..

kshama said...

Behad sundar alfazon me dhalee rachana...!

योगेश स्वप्न said...

कुछ कोशिशें बिना कामयाब हुए बगैर रह जाती हैं,
या फिर कामयाब होने में बहुत वक़्त लगता है.

sunder rachna, omji, uprokt panktion men se "bina" ya "bagair" ek shabd hata den.

संध्या आर्य said...

ek sundar abhiwyakti........bhagawan kare aap apani jindagi me sahi disha me hamesha aage badhe huye kamyab howe
........jab kabhi bhi aapane yah rachana likhi hai .....par sundar abhiwyakti hai.....aabhar

ओम आर्य said...

Yogesh Ji, Dhanyawaad..correction ke liye..aur maine thoda jyada hin correction kar diya hai. aap dekh sakte hain.

Aapke pita jee ka dehant ho gaya, Mata-pita ke dehant ke baad vyakti 'Beta' nahi rah jaata hai. yah dukh ki baat hai..

काजल कुमार Kajal Kumar said...

गर्मी के मौसम में पढ़ कर भी अच्छा लगा. सुंदर रचना के लिए धन्यवाद.

अर्चना तिवारी said...

बेहद खूबसूरत रचना...अब तो सर्दी का इन्तजार होने लगा इसे पढ़कर

सैयद | Syed said...

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति !

Prem said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .पहला कदम मुश्किल होता है ,वह एहसास का ही क्यूँ न हो .मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया ।

adwet said...

garmi mein aksar jada yad ata hai, is tipani ke sath, ki yeh garmi se vehtar