Thursday, July 23, 2009

चिमटे से बस इतना हीं पकड़ा गया...

(1)

पहले

तो तुमने छेड़ दी तार

और अब

जब संगीत बजने लगा है तो

कान बंद कर लिए तुमने !

(2)
जो हाथ

कभी दूर से हींबुलाने लग जाते थे,

पास आकर

कंधे पे आ जाते थे

वे अब यूँ हीं जेब में पड़े रहते हैं.

(३)

शामें

अब कुछ यूँ गुजर जाती है

कि बैठना नही हो पाता
अपने
पास

ख़ुद को महसूसते हुए

(५)

दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है

24 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

sundar vicharon ki sundar kavita..
kisi ke dene ke baad bhi ek dukh aa jata hai..wo isliye ki kisi apne ne diya..

behad umda rachana..badhayi..ho om ji..

sada said...

बहुत ही अच्‍छा लिखा है बधाई ।

adwet said...

विचारों को सुंदर तरीके से माला में पिरोया है।

नीरज गोस्वामी said...

सारी क्षणिकाएं ग़ज़ब की हैं..आप की लेखनी का ये चमत्कार देख चकित हूँ...वाह...मेरी बधाई स्वीकारें...
नीरज

रंजन said...

पहले तो तुमने छेड़ दी तार और अब जब संगीत बजने लगा है तो कान बंद कर लिए तुमने !!

क्या बात है.. जोरदार

रंजन said...

१, २, ३, और ५.. ४थी कहां है.. वो भी पढेगें..

दिगम्बर नासवा said...

दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है

सब लाजवाब......... कुछ ही शब्दों में कही गहरी बात.......... दिल में सीधे उतार गयीं सब की सब....... मन से अपने आप निकलता है ..... वाह कितना सच लिखा है

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या-क्या कह जाते हैं आप!!! इतनी सहजता से?

AlbelaKhatri.com said...

omji dukh wali baat toh gazab ki hai
bhaai kamaal ho
aur kamaal karte ho.................
abhinandan !

तरूश्री शर्मा said...

gajab ke teer mare hain aapne in shanikaon ke madhyam se.... Khaskar jeb me haath pade rahte hain...wali to behad sateek aur marak!!!

Udan Tashtari said...

शामें
अब कुछ यूँ गुजर जाती है

कि बैठना नही हो पाता
अपने पास

ख़ुद को महसूसते हुए


-वाह!! आज पूरे रंग मे दिखे भाई.आनन्द आ गया.

Dhiraj Shah said...

चिमटे से बस इतना पकडने का भाव निराला है । आभार

M VERMA said...

सहजता को सलाम!!!
पहले तो तुमने छेड़ दी तार
और अब जब संगीत बजने लगा है
तो कान बंद कर लिए तुमने !
वाह

Nirmla Kapila said...

शामें
अब कुछ यूँ गुजर जाती है

कि बैठना नही हो पाता
अपने पास

ख़ुद को महसूसते हुए
हमेशा हे जिन्दगी के करीब होती है आप्की अभिव्यक्ति गज़ब की क्षणिकायें बधाई

Nirmla Kapila said...

शामें
अब कुछ यूँ गुजर जाती है

कि बैठना नही हो पाता
अपने पास

ख़ुद को महसूसते हुए
हमेशा हे जिन्दगी के करीब होती है आप्की अभिव्यक्ति गज़ब की क्षणिकायें बधाई

अवाम said...

सुन्दर रचना..
अच्छा लिखा है आपने..

BrijmohanShrivastava said...

अच्छी रचना |दुःख की अभिव्यक्ति भी उत्तम

महेन्द्र मिश्र said...

अच्छी रचना बधाई...

सैयद | Syed said...

दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है.

.... बेहतरीन ..

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

sandhyagupta said...

जो हाथ कभी दूर से हीं बुलाने लग जाते थे,
पास आकर कंधे पे आ जाते थे वे अब यूँ हीं जेब में पड़े रहते हैं.

Bahut khub.

संध्या आर्य said...

दुःख भी दो तरह के होते हैं
एक तो होता है
और दूसरा, कोई देता है

बहुत ही मर्मस्पर्शी है यह रचना.......

शामें अब कुछ यूँ गुजर जाती है कि बैठना नही हो पाता
अपने पास ख़ुद को महसूसते हुए


बहुत ही सुन्दर भाव .........जब इंसान खुद से नाराज होता है तो अपने आप से रु-ब-रु नही हो पाता है शायद ......बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति .........
आभार

ओम आर्य said...

रंजन जी, आप जिद कर रहें हैं तो...

४)
मैं बेकार था, तुम छोड़ गयी

अब , जब तुम छोड़ गयी हो

तो फिर मेरे पास फिर काम है
तुम्हें पाने का!

raj said...

dukh kitni bhi tarah ka ho sahna khud ko hi padta hai.....