Sunday, September 19, 2010

रोने के लिए हमेशा बची रहे जगह

लोग झिझके नहीं गले लगने में
और गले लगना इसलिए हो कि रोया जा सके

कंधें बचे रहें
रो कर थके हुओं के सोने के लिए

हँसना एक फालतू सामान हो
और हर इतवार हम निकाल दें इसे रद्दी में
ताकि रोने के लिए हमेशा बची रहे जगह

कवितायें तभी हों
जब भर जाएँ उनमें दुःख पूरी तरह
और कहानियों में भी
रुला देने की हद तक हो अवसाद

किसी भी तरह
बचा ली जाए रोने की परंपरा
ताकि जब पता चले कि
तुम्हें प्यार में इस्तेमाल किया जा चूका है
तो तुम रो सको,
पढ़ सको कवितायें
और कहानियों का सहारा हो.


_____________

29 comments:

cmpershad said...

‘लोग झिझके नहीं गले लगने में’

लोगों में महिलाएं भी हैं ना :)

मो सम कौन ? said...

आपके ब्लॉग के बारे में कुछ दिन पहले ही महफ़ूज़ मियां ने बताया था, सही बताया था। गहरी बातें थोड़े से शब्दों में लिख जाते हैं आप।
जब तक जीवन रहेगा धरा पर, निश्चिंत रहिये रोने के लिये जगह रहेगी, और हंसने के लिये भी।
खूबसूरत अभिव्यक्ति।

AlbelaKhatri.com said...

बढ़िया कविता ..........

अच्छा लगा बाँच कर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हँसना एक फालतू सामान हो
और हर इतवार हम निकाल दें इसे रद्दी में
ताकि रोने के लिए हमेशा बची रहे जगह

रोना तो यूँ ही आजाता है ..जगह की कहाँ ज़रूरत होती है .


ताकि जब पता चले कि
तुम्हें प्यार में इस्तेमाल किया जा चूका है
तो तुम रो सको,
पढ़ सको कवितायें
और कहानियों का सहारा हो.

जब कविता या कहानी में अपने दर्द को पढते हैं तो आराम स लगता है ...बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

वन्दना said...

ताकि जब पता चले कि
तुम्हें प्यार में इस्तेमाल किया जा चूका है
तो तुम रो सको,
पढ़ सको कवितायें
और कहानियों का सहारा हो.

ओह! एक कटु सत्य कितनी सरलता से कह दिया और यही तो आपकी खूबी है किसी भी बात को सहजता से कह जाते हैं ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मनोभावों की अच्छी अभिव्यक्ति की है आपने भाई. मुबारक.

निर्मला कपिला said...

ओम जी बहुत दिनों बाद फिर से इतनी उत्तम रचना पढी। सच कहूँ तो जगह हो न हो मगर आपकी रचना पढ कर हमेशा आँख नम होती है। बहुत संवेदनशीलता से लिखते हैं। बहुत बहुत शुभकामनायें

सुशीला पुरी said...

उनका दारुण विलाप सुन
वे लोग भी हो गए है उदास
जिनकी आँखों मे हमेशा
खटकती रही हैं प्रेमिकाएं ...!!!

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरा और उसी छोड़ी जगह पर बैठा मेरा मन।

अनामिका की सदायें ...... said...

बहुत गहरा लिखते है आप.
सुंदर अभिव्यक्ति.

शरद कोकास said...

अच्छी कविता है भाई , थोड़ा शिल्प पर और काम करें ।

mukti said...

आज फिर आपकी कविता पढ़कर रोने का जी हो आया...

Archana said...

आओ मुझसे मिलो
बिना झिझके गले भी लगो
मैने बना लिया है
मौन का एक खाली घर
जहाँ मैं हूँ और मेरे कंधे
रो कर थके हुओं को सोने के लिए
एक जादू की झप्पी के बाद
रोने की नहीं होती कोई वजह
और इसीलिए मेरे घर में
हमेशा बची रहती है जगह...

अजय कुमार said...

सुंदर और गहरे भाव ।

वन्दना said...

आज के चर्चामंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

ओम भाई, आप हमेशा लाजवाब कर देते हैं।

अनुपमा पाठक said...

hridaysparshi abhivyakti...!
subhkamnayen...

Parul said...

manthan se upji maulik rachna...awesome !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 22 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

संध्या आर्य said...

रिश्तो के पहलु मे भी
तन्हाईयो की
झप्पियाँ पलती है
दर्द भी पिघलते है
होठो की मुस्कुराहट से

कपकपाती चौडी होठ भी
छुपाती है
कई मौसमो के बादल
आकाश का भी
सीना फट जाता है
बादलो की चौडाई से!

संध्या आर्य said...

रिश्तो के कंधो पर
अश्को के बादल होते है
जो ढोते है
नजरो के काजल
और बचा लेते है
बुरी आत्माओ से !

सागर said...

आखिर में क़यामत ही छांटते हैं भाई

monali said...

सच जब दर्द बढ जाये तो ये कविता और कहानियां ही तो ढांढस बंधाती हैं...बेहद सच्ची कविता...

अमिताभ मीत said...

बहुत बढ़िया ओम भाई ..... क्या बात है !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कल गल्ती से तारीख गलत दे दी गयी ..कृपया क्षमा करें ...साप्ताहिक काव्य मंच पर आज आपकी रचना है


http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/17-284.html

Majaal said...

hehe, बात तो सही कही है आपने ! अच्छा रचना. लिखते रहिये ...

M VERMA said...

कंधें बचे रहें
रो कर थके हुओं के सोने के लिए

रूदन और हास्य मानव और मानवता को संजोने के लिये जरूरी है.
सुन्दर भाव की कविता

अपूर्व said...

कविता पढ़ कर न रो पाने पर खुद पर शर्म आती है..यहाँ रोना किसी दीर्धकालिक हँसी की प्रक्रिया की प्रस्तावना भर नही है..न यहाँ हँस पाना किसी रोने की प्रक्रिया का संभावित उपसंहार ही है..यहाँ ध्यान देने वाली बात मुझे लगी कि खुद रोना ऐच्छिक और इस लिये स्वीकार्य हो सकता है..मगर दूसरों को रोते हुए देखना एक त्रासद और कठिन अनुभव हो सकता है ...सो जब हम प्रथ्वी पर रोने के लिये हमेशा बची जगह के बारे मे सोचते हैं तो दुनिया के बारे मे कोई आश्वस्ति नही होती है..
हमारी जिंदगियों के तमाम अधूरेपन और आसपास बिखरी अपूर्णताओं के बीच रोना अगर दुनिया को बेहतर बनाता हो तो यही सही...:-)

indianrj said...

रोने का मतलब अभी तक हमारी संवेंदंशीलता बरकरार है.