Thursday, April 22, 2010

लडकियां चोटी बांधना भूलती जाती थीं

मेरे अन्दर एक डार्क जोन बन गया था
वहां पानी नहीं पहुँचता था
और मुझे पसीझने के लिए भी
पानी दूर से लाना पड़ता था

नदियाँ एक थीं
पर उनका पानी बंटा हुआ था
पानी को बिना महसूस किये नहा लिए जाना
आम बात थी

आज की रात आप एक औरत हैं
ऐसा उसे किसी ने न तो कहा था
और न हीं महसूसा था

वो अपने चुम्बनों को
होठों से नहीं उतार पायी थी कभी
वो अकेली कमाऊ लड़की थी उस घर के लिए

दहेज़ विरोधी कानून उनंचास साल पहले बन गया था
पर बहुत सारे लड़कियों की शादी अभी भी नहीं होती थी
और बहुत जन्म भी नहीं ले पाती थी

बच्चे सुबह से उठ कर खेलने लगते थे
या काम करने लगते थे
आम जनों में यह बात फ़ैल गयी थी
कि पढ़-लिख कर आदमी बेकार हो जाता है

स्कूली युनिफोर्म पहने बच्चे
ढाबों पे चाय पिलाते थे
या साईकिल की दुकानों पे
पंक्चर ठीक करते थे

या फिर वे ऐसी जगहों पे भेंड चराते हुए देखे जाते थे
जहाँ मुश्किल से कोई घास होती थी

स्कूल का मास्टर कभी -कभी आता था
उसके दारू की दूकान बहुत चलती थी

दूध वाले, सब्जी वाले और परचून की दूकान वाले सभी को
तकनीकों का बहुत अच्छा ज्ञान था
और वे उसका भरपूर इस्तेमाल भी करते थे
कोई घोंड़े की लीद से धनिया बनाता था
तो कोई हीपोलीन से पनीर

कुछ लोग जिन्दगी के इस पार रह जाते थे
कुछ उस पार
सरकार पुल नहीं बना पाती थी

सरकार को जब भ्रष्टाचार करना होता था
तो वो विकास की परियोजनाएं लाती थीं

लडकियां चोटी बांधना भूलती जाती थीं
चोटी बाँधने वाली लडकियां अब प्यार नहीं की जाती थीं

देह से ऊपर गया प्यार
और पैसे से ऊपर गयी मानवता
दोनों हीं उनके ज्ञान में नहीं था
या वे इसे मूर्खतापूर्ण मानते थे

मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा मिल जाती थी
पर लोगों का
कानून से भरोसा उठा हुआ हीं रहता था

वे जानते थे कि एक दिन सब मारे जायेंगे
पर वे अंतिम व्यक्ति होना चाहते थे
मरने के मामले में ...

26 comments:

सुशीला पुरी said...

अनगिनत विम्बो को समेटे आपकी कविता बीते हुए से चल कर आने वाले तक जाती है ....और बहुत सारी भयावह सच्चाईयों से पर्दा उठाती है....बधाई ।

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

kshama said...

Ateet ,wartmaan aur anagat...ek vistrut canvas ,jispe mano wishw kee tasveer hame dikhayi deti hai..

महफूज़ अली said...

लडकियां चोटी बांधना भूल जातीं थीं.....

ओह! हो.... पर क्यूँ ?

हे हे हे हे .....

चलिए यह तो एक हल्का मज़ाक रहा.... पर बहुत ही संवेदनशील कविता लिखी आपने.... बहुत अच्छी लगी...

कुश said...

सेल्यूट मार लु क्या इस पर..
झन्नाटेदार लिखा है आपने.. बदतर होती ज़िन्दगी को भी अंतिम सांस तक जिए जाने की ललक.. पर जो जी रहे है उसमे ज़िन्दगी का अनुपात कितना है.. ? कुछ भी तो नहीं.. !

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

ॐ भैया .....मैंने भी पढ़ ली जिंदगी की असल कविता ..................आपको पढ़कर बेशक अच्छा इंसान हो पाउगा एक दिन ................

pallavi trivedi said...

दिल खुश हो गया ये कविता पढ़कर....वाकई क्या लिखा है!

Sonal Rastogi said...

पहले पढ़ा तो लगा उलझ गई ,एक एक तिनका जोड़ा तो तस्वीर साफ़ हो गई ,बहुत खूब

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आम जनों में यह बात फ़ैल गयी थी
कि पढ़-लिख कर आदमी बेकार हो जाता है
वाह!! लीक से हट कर लिखी गई कविता. सुन्दर.

M VERMA said...

सरकार को जब भ्रष्टाचार करना होता था
तो वो विकास की परियोजनाएं लाती थीं
वाकई कितना विरोधाभासी दुनिया है
सुन्दर रचना

boletobindas said...

हर लाइन अलग अलग चित्र प्रस्तुत करता हूआ है, पर मतलब एकदम साफ..बेहतर रचना लिखी है......अपने अंदर के डार्क जोन का क्या कहें.

विनोद कुमार पांडेय said...

स्कूली युनिफोर्म पहने बच्चे
ढाबों पे चाय पिलाते थे
या साईकिल की दुकानों पे
पंक्चर ठीक करते थे,



अत्यंत भावपूर्ण रचना...ओम जी इस सशक्त कविता की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..

सन्ध्या आर्य said...

आपकी रचनाओ को पढ्कर ........मानस पर कुछ भाव ऐसे ही दस्तक दे जातेहै जो समाज मे घटित हो रहे होते है हमारे आस पास..... जिनसे रुबरु हम से कई लोग होते है अकसर .........जिनसे इंकार नही किया जा सकता .......एक छोटी सी कोशिश........



अक्सर वह छेड दी जाती थी तकलिफो से
जिसे वह सहती आयी थी
पृथ्वी की शुरुआत से

दर्द की आग ने उसे
पिघला दिया था
उड रहे थे कुछ रिश्ते
गर्म होकर उसके अंदर से बाहर आकर

उसे यह नही पता था कि
मानविय रिश्ते जो समाज से बनती है
उसमे अपने और पराये मे
बहुत अंतर होती है

प्यार जिसमे वह डुबना चाहती थी
उसे समझा नही पायी थी
उन समाजिक रिश्तो को
समझाने की शिक्षा
समाज से बखूबी मिली थी
पर कुछ लोग नसमझ पाने
के आदत से लाचार थे
थोप देते थे
कुछ भी अपनी मर्जी से


वह एक लड्की थी जिसे
अपने घर के लिये कमाना था बहुत सारा इज्जत
उसे निवाहना था उन विसन्गतियो को अकेले ही
जो ससुराल से दहेज मे मिला था
लड्नी थी एक और लडाई
पत्ति के प्यार के वास्ते
वह भी एक ऐसी जगह थी जहाँ
कोई भी चीज मानविय आधार पर नही मिलती थी


वह कुछ काल खंडो से खिसक चुकी थी
किसी दिन वह तरल हो गयी थी
दर्द की उमस से
एक रुह उससे होकर कभी गुजरी थी
जिसमे वह जम गयी
पृथ्वी सी शितलता का एहसास लिये हुये थी

सागर said...

क्या लिख रहे हैं आजकल कुछ पता भी है ?

सागर said...

किसी की जान बार-बार नहीं लेनी चाहिए

हिमांशु । Himanshu said...

हम सब खड़े हैं हृदय खोले इन कविताओं की सराहना में !
अदभुत रचते हैं भाई ! आभार ।

ktheLeo said...

वाह ओम जी,वाह!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह भई आर्य जी , बहुत सुंदर रचना है

शिव कुमार "साहिल" said...

आपका जवाब नहीं........
बहुत खूब !!

अपूर्व said...

कविता शुरू करने के बाद आगे पढ़ते-पढ़ते जैसे किसी मूक स्लाइड-शो की तरह लगती रही जिसमे फ़्रेम-दर-फ़्रेम दृश्य स्वतः तेजी से बदलते जाते हैं..और कविता की विषयसमृद्धि से चमत्कृत और कुछ कन्फ़्यूज्ड भी होता रहा..मगर अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे ग्यारह हजार वोल्टेज के तार की तरह जेहन से छू गयीं..सच इतना निर्मम..मारक!..और इसी के साथ फिर पढ़ने पर प्रथम पंक्तियों का निहितार्थ समझ आता है..और पसीजने के पानी की कमी भी..!
सच हर पंक्ति अपने मे इतना सजीव और व्यंग्यात्मक विरोधाभास समेटे है कि कविता की माला तोड़ कर अलग-अलग मोती चुगने का जी चाहता है..
शानदार कहना काफ़ी नही होगा कविता के लिये..इसको फिर-फिर पढ कर मनन करना ही इसकी अर्थवत्ता को स्वीकार करना है..आपकी सबसे परिपक्व कविताओं मे से एक..निःसंदेह

अपूर्व said...

कहते हैं ना कि किसी पहाड़ी की चोटी से किसी झाड़ के सहारे लटके इंसान को गहरी खाई मे गिर कर समा जाने के लिये हवा का एक झोंका ही काफ़ी होता है..आपकी कविता पर आदरणीय संध्या जी की प्रतिकविता हवा का ऐसा ही झोंका है..कातिल!

ओम आर्य said...

@अपूर्व
अपूर्व एक ऐसे चिठ्ठाकार हैं जो अपनी टिप्पणियों से रचना करते हैं और मुझे तो कई बार उनकी टिप्पणियों के बाद कविता के कई नए आयाम खुलते दिखाई देते हैं. खासियत यह है कि वे तब तक टिप्पणी करते भी नहीं..जब तक कि पूरी तरह रचना पर गहन विचार न कर लें. मैं मन में हमेशा धन्यवाद करता हूँ उनका..आज सोंचा, शब्दों में कर लूं.

सागर said...

Satya Vachan magar Apoorv tak yeh baat pahunche !!!

अबयज़ ख़ान said...

ओमजी.. अब तक मैंने आपके ब्लॉग के बारे में सुना ही था.. आज पढ़ने का मौका भी मिल गया.. बहुत उम्दा और भावनात्मक कविता है.. बधाई हो आपको..

डॉ .अनुराग said...

एक सोच को लिबास .मिला है .....ओर .एक गुस्से को आवाज.....
कितना कुछ है आस पास नजरअंदाज करने को...... जानबूझ के आँख मूँद ने को ....दो चोटिया वाली लड़की रोज कितनी आवाजो को अनसुना करती है .....कितनी नजरो को अपनी पीठ पर चिपका कर चलती है .....
ये कविता आज का रिफ्लेक्शन है ....

DC said...

दर्पण ने इसे ब्लॉग की सबसे बेहतर कविता बताया अपने फेसबुक प्रोफाइल पर , तो फिर पढने आना ही पड़ा और अब कह सकता हूँ कि ये कोई अतिशयोक्ति नहीं थी ..यथार्थवाद किस हद तक सुन्दर हो सकता है , ये आपकी कविता पढने से मालूम होता है ..