Friday, July 10, 2009

पर तब सिर्फ राख बची थी

सालों साल
सूखता रहा दरख्त
धूप में खड़ा, अकेला

पहले पत्ते छूटे हाथ से
फिर एक एक कर छूटीं टहनियां
उधडी फिर खाल भी

पर सावन की आँख उमड़ी नहीं

सूखा दरख्त और कितना सूखता
जल गया एक दिन

जला जब दरख्त
तो बादल काला हुआ धुएँ से
और तब बरसा सावन

पर तब सिर्फ राख बची थी गीली होने के लिए...

28 comments:

Dhiraj Shah said...

खुबसुरत अन्दाज बयाँ करने का

mehek said...

bahut achhi lagi rachana

awaz do humko said...

आप को पढना हमेशा अच्चा ही लगता है , आप के लिखने का अंदाज़ दिल को भाता है , खुदा आप की कलम को और ताक़त दे ताकि हम और अच्छी , उम्दा रचना से लुत्फ़अन्दोज़ हो सकें ..

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर.

Nirmla Kapila said...

पर सावन की आँख उमड़ी नहीं

सूखा दरख्त और कितना सूखता
जल गया एक दिन
ओम जी हर बार एक नये अन्दाज़ मे और नये एहसास ले कर आती आपकी इस कविता ने मन छू लिया बधाई और आभार्

सागर said...

यह दुखांत किस्सगोई है भाई. कवि के जिस्मरूपी पेड़ के साथ किसने 'ग्लोबल वार्मिंग' का खेल खेला!!!
खैर अब कवि अपने पूरे शबाब पर है... और कविता भी शिखर पर....

raj said...

kitna badnseeb tha darakht ke sawan uspe barsa nahi...par sawan ki badkismati ke kisi kam na aya..tab barsa jab darakht ko uski jaroorat na thi....very sad....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सूखा दरख्त और कितना सूखता
लगता है, दर्द की स्याही में डुबो कर लिखा है...

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब लिखा है आपने ........... पेड़ की तड़प और सावन की प्यास का इंतेज़ार करती राख......... शब्दों की सहज प्रस्तुति

तीसरी आंख said...

दरख्त की सिर्फ राख ओह . बहुत बढ़िया रचना आर्य जी

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ..

आप जो भाव दर्शाते है अपनी कविता मे
बहुत ही गहन होता है..

शब्दों का बहुत ही सटीक और सुंदर प्रयोग..

मन करता है बार बार पढ़ते रहो..

संध्या आर्य said...

एक दर्दभरी दास्तान ..............और क्या कहे ............

.......शब्दो की सरलता और भावो की सहजता आपकी रचना को बेमिशाल बना देती है........शुभकामनाये

Prem Farrukhabadi said...

aapne bahut kuchh kahne ki koshish ki
aur aap safal bhi hue hain. badhai

अभिषेक ओझा said...

ओह ! बड़ी देर से बरसा.

Kumarendra Singh Sengar said...

bahut KHOOB

Harkirat Haqeer said...

जला जब दरख्त
तो बादल काला हुआ धुएँ से
और तब बरसा सावन

पर तब सिर्फ राख बची थी गीली होने के लिए...

शानदार नज़्म.....!!

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बेहद प्रभावशाली रचना !!!

M VERMA said...

इतना खूबसूरत अन्दाज -- इतना दर्द ---

वाह चुप रहने को दिल करता है दो मिनट के लिये

अर्चना तिवारी said...

जला जब दरख्त
तो बादल काला हुआ धुएँ से
और तब बरसा सावन

पर तब सिर्फ राख बची थी गीली होने के लिए...

बहुत ही दर्दीला

Dev said...

Tab shirg rakh bachi thi , gile hone ke liye...bahut ahari kavita....

Regards..
DevPalmistry : Lines Tell the Story Of ur Life

अमिताभ श्रीवास्तव said...

chamtkrat hu//
bahut sungar andaaz.
jeevan ko chhuti hui rachna.../yaa yu kahu yahi to jeevan he.
ek ek kar sab kuchh chhootataa chalaa jaataa he fir tab jab sabkuchh khatm ho jaataa he, ek naya jeevan peda ho jaataa he blkul aapke saavan saa.

vikram7 said...

बहुत ही सुन्दर

कंचनलता चतुर्वेदी said...

sundar rachana

हया said...

ओम जी बहुत खूबसूरत लिखा है आपने...बधाई.
मेरे ब्लॉग पर आने और हौसला अफजाई का शुक्रिया.
हया

Babli said...

बहुत लाजवाब रचना! मन की भावना को आपने बड़े ही सुंदर रूप से व्यक्त किया है! लिखते रहिये !

sada said...

पहले पत्ते छूटे हाथ से
फिर एक एक कर छूटीं टहनियां
उधडी फिर खाल भी

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

'अदा' said...

पर तब सिर्फ राख बची थी गीली होने के लिए...
behtareen..
lajawaab...

水煎包amber said...

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