Monday, April 25, 2011

उसके बरसने तक

वह बिस्तर के दूसरी तरफ बैठी है
मैं लेटा हुआ हूँ

वह कई बार आयी है
और इसी तरह बैठ कर गयी है बिस्तर के कोने पे
मैंने लेटे-लेटे कई बार बुलाया है उसे

घर की आवाजें बहुत देर खड़ी रह कर थक गयी है
और अब बैठी है
रौशनी गला दबा कर बीच-बीच में चीखती है

काफी देर हो गयी है
हम एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते

बाहर आसमान में रात से हीं घने हो रहे हैं बादल

मैं जानता हूँ
उसे आते-आते देर हो जायेगी
और तब तक बारिश को हो जाना है

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5 comments:

kshama said...

Uf! Raushanee kee cheenkh bhee kaisee hotee hogee?

शिव कुमार "साहिल" said...

Namskar Om Ji ,

akpi rachnayein dil ko shu leti hein.... ek alag andaz hein aapka.

GAJANAN RATHOD said...

मन की तड़प का सुन्दर शब्दों में बयां........बधाई ....बहूत सटीक रचना ....

वन्दना said...

बहुत कुछ कह दिया हमेशा की तरह्।

प्रवीण पाण्डेय said...

घुमड़ रहे बादल बरसेंगे,
शीत मिलेगी तो बरसेंगे।