Monday, November 17, 2008

तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में !

तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में !

तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में
तुम हमेशा मुस्कुराती रहती हो वहाँ
मुझे देखती हुई

तुम्हारी मुस्कान,
जिसे मैने अभी लाख चाहा
कैनवास पे उतारने की
पर रहा नाकाम,
आँखों के पानी में हरकत करती रहती है हमेशा

ये तो अच्छा है के कुछ तस्वीरें तुम्हारी
हैं मेरे पास
जो तुम्हारे मुस्कान को
जीवित बनाये रखती है आस-पास

अब जब सपने ज्यादा बेचैन होने लगते हैं
छोड़ देता हूँ अपना बदन
तुम्हारे बनाए हुए सलवटों के पास
रात के विस्तर पे, जहाँ
सपनो को तेरी छुअन मिल जाती है

तुझे किए वादे तोड़े हैं मैने
और तेरे जाने के बाद रोया है कई बार
और सिगरेट अब सिर्फ़ इसलिए पीता हूँ
के तुम कभी मना नही करती थी
हां, अब जलता खुद हूँ हमेशा,
वो तो बुझ जाती है.

अब दिन बिना इंतेज़ार के गुजारनी पड़ती है
क्यूँकी शाम को
तुम ऑफीस से लौट कर नही आती
और खाने के समय
हाथ में नीवाला लेकर
दौड़ना नही होता
जैसा की तुम्हारी थाली छोड़ के
उठ जाने पे किया करता था
मैं लगभग रोज
और तुम कभी-कभी बेसिन में उगल आया करती थी
और हम लड़ते थे फिर।

आज ये सब याद करके
लिखते हुए देख रहा हूँ
होठों पे मुस्कुराहट आ गयी है

बेशुमार इस्क बहा करता था साहिल पे
हर तन्हाई भरी रहती थी
इश्क की लहरें दूर तक भिगो आया करती थि ज़मीन.
आज याद करता हूँ वो सब्ज़ शामें तो
आँखों में खारापन उतर आता है
और सारा समंदर एक बूँद में खाली हो गया लगने लगता है.

खबर मिलती रहती है तेरे shahar की
टेलिविज़न से
आज कल पारा ज़रा ज़्यादा गिर गया है वहाँ
मैने तो तुम्हारी दी हुई रज़ाई ओअध लेता हूँ
जब ज़्यादा ठंध होती है.

तुम kuch नये तस्वीर
internet पे अपलोड कर देना
वो नयी तस्वीर देखी थी तुम्हारी
जिसमे तुम पार्क में बेंच पे अकेली बैठी हो।

2 comments:

pallavi trivedi said...

अब जब सपने ज्यादा बेचैन होने लगते हैं
छोड़ देता हूँ अपना बदन
तुम्हारे बनाए हुए सलवटों के पास
रात के विस्तर पे, जहाँ
सपनो को तेरी छुअन मिल जाती है
bahut khoob...achchi lagi apki kavita.

मीत said...

बहुत अच्छा लिखा है भाई ... खूबसूरत रचना.