Thursday, February 12, 2009

बहरा आसमान !

चाँद ने,
लगाई बिंदी माथे पे
ओढे गहने और कपड़े
मेंहदी लगे हाथो में पहने कंगन
मन पे, पहले का सारा पहना हुआ
उतार दिया
और सूरज की लपटों के सात फेरे ले लिए

खामोश लबों पे उठती हुई टीस
और कंठ में रुकी हुई हूक
अनसुनी कर दी गई थी पहले हीं

बहरा आसमान !

6 comments:

रंजना said...

Waah !! Lajawaab !! adbhud shabd chitran hai...

MUFLIS said...

मन के अन्दर कहीं गहरी बैठी हुई उलझन को
लफ्जों का बहुत खूबसूरत लिबास ........
एक अच्छी नज़्म . . . .. .
बधाई
---मुफलिस---

महावीर said...

बहुत सुंदर रचना है। शब्दों और भावों का सुंदर सामंजस्य!
महावीर शर्मा

संध्या आर्य said...

celestial love ki adbhut varanan hai.man ka har ek kona sunn ho gaya hai .
par kyo hai?
बहरा आसमान !

vandana said...

aah!
dil se ek aah nikalti hai.
kya khoob chitran kiya hai aapne.
nishabd kar diya.
adbhut.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

खामोश लबों पे उठती हुई टीस
और कंठ में रुकी हुई हूक
अनसुनी कर दी गई थी पहले हीं


अच्छी लगी आपकी यह रचना