Friday, October 8, 2010

वो वक्त अतीत में गिर गया है

यह बिलकुल हीं रात है
और इसकी परिधि के भीतर
ठीक चाँद इतनी खाली जगह है
और बाकी सभी जगह अमावस बिछी हुई है

इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है

पर तुमने जाते हुए
वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
लिखी जानी थी,
अतीत में गिर गया है

___________

28 comments:

वन्दना said...

इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है

क्या ख्याल लिखा है…………बेहतरीन्।

सुरेन्द्र बहादुर सिंह " झंझट गोंडवी " said...

waah! dil se nikli hui rachna hai

सागर said...

हम अतीत को खींच लायेंगे, आप रेगुलर रहिये बस

संजय कुमार चौरसिया said...

sundar kavita

्नवरात्रि मंगलमय हों…………

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

सुज्ञ said...

बेह्तरीन भाव निरूपण

डॉ .अनुराग said...

इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है


क्या बात कही है...

pallavi trivedi said...

पर तुमने जाते हुए
वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
लिखी जानी थी,
अतीत में गिर गया है

एकदम अलग अंदाज़ है इस बार...और बहुत खूब है !

संध्या आर्य said...

तेरे खत से आज गिरते
सुखे अक्षरो की खुशबू
भींगा जाते है अलको को
पन्नो की नमियो मे
आज भी जिंदा है
तेरे लम्स !

संध्या आर्य said...

अमावसी राते उसकी आंखो के
काजल है जो
नजरो से बचा लेती है

आज वह माथे का
टीका है
जिसे तू चाँद कहता है
और अतित सुहागन सी
चाँदनी की चादर पर रौशन है
महसूसी गयी कविताओ मे !

डिम्पल मल्होत्रा said...

कविता मायूस है...जैसे कोई सदमे उठा रही हो...

mukti said...

ऐसा कैसे सोच लेते हैं आपलोग? बहुत ही अच्छे बिम्ब हैं.

महफूज़ अली said...

आज तो बिलकुल हट कर लिखा है आपने तो..... कमाल है....

अनामिका की सदायें ...... said...

गहरे भावो से भरी कविता.

अनिल कान्त said...

एक लम्बे समय के बाद आपकी रचना पढ़ी
अच्छा लगा

S.M.MAsum said...

नवरात्री की शुभकामनाएं
मकड़े की चाल देखें यहाँ
धर्म का हाल यहाँ देखें

mahendra verma said...

और वक़्त का वो हिस्सा जिसमें कविताएं
लिखी जानी थी
अतीत में गिर गया हे।

वाह...सच्चे अर्थों में सम्पूर्ण कविता है यह, कविता का एक भी शब्द हटाया नहीं जा सकता ...एक एक शब्द गहन अर्थों से संयुक्त है...बधाई।

शरद कोकास said...

इसमे कविता की के नई परिभाषा है ।

प्रवीण पाण्डेय said...

उफ, यह ज़ालिम अतीत।

Parul said...

waah....

सुशीला पुरी said...

ओह !!!!!!!!!!! वह खाली जगह !

monali said...

Ek alag kism ki kavita.. pasand aayi.. :)

अमिताभ मीत said...

बेमिसाल !! इस पर कुछ कहने की औकात नहीं मेरी

Shaivalika Joshi said...

Bahut Khoob ..........

उस्ताद जी said...

6/10

गहरे भाव के साथ ऊंचे दर्जे की उत्कृष्ट रचना

नीरज गोस्वामी said...

आपके शब्द और भाव एक बार फिर मौन कर गए...अद्भुत लेखन...बधाई
नीरज

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

behtareen hain is kavita ke khayaal hai ...achha hai ki aap ateet me gaye aur us hisse me ja kar jisme kavitayen likhi janee theen aapne yah kavita likhi .... :)

अपूर्व said...

जीवन चंद्र-कलाओं के तर्कों को नही मानता..यहाँ एक बार अमावस्या होने के बाद चाँद फिर सिर्फ़ काली रोशनाई तले सफ़ेद सफ़्हों मे ही निकलता है..मगर इस कागज की खेती की यह खासियत भी है..कि जिन कविताओं की कलमें मन के प्यासे गमलों मे सूख जाती हैं..वे पीड़ा की मिट्टी मे अनायास पैदा होती हैं..और फिर कागज पर चाँद की जगह खाली नही रह जाती..

रंजना said...

वाह.....
लाजवाब !!!!! इससे अधिक कुछ कहने की गुंजाइश कहाँ बची है..