Thursday, December 30, 2010

कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है

जब से प्रेम और कविताओं के बारे में
यह कहा जाने लगा है कि
वे अब महज वस्तुएं हैं
मैं बाजार में पड़े उत्पादों से
आँख मिलाने से कतराता हूँ

मेरे लिए प्रेम, कवितायें हैं
उनका अभाव कचोटती हुई कवितायें हैं
और प्रेम के पश्चात
अस्तित्व में आया प्रेम का अभाव
और भी ज्यादा कचोटती हुई कविता

और कभी जब तुम्हें भेजने के लिए
मैंने 'पैक' की थीं कवितायें
तब भी वे वस्तुएं नहीं थीं
वे कभी भी वस्तु नहीं हुईं मेरे लिए

तुम्हारी आँखें,
जहाँ मैं मजबूत दीखता था
वहां भी झांकते हुए डर लगता है
जिसकी वजह वो अंदेशा है
कि प्रेम तुम्हारी आँखों में डूब गया हो सकता है
और वहां उन आँखों के समंदर में
कविताओं की तैरती हुई लाश देखना
बेहद डरावना होगा

पर अंजाम से बेपरवाह होकर
मुझे देखना है एक बार तुम्हारी आँखों में
जहाँ मेरी तैरती हुई लाश हो सकती है
या फिर वो विश्वास
जिसे आँख भर, भर कर
मैं भष्म कर सकूं वो आवाजें
जिनमें कहा जाता है कि
प्रेम और कवितायें महज वस्तुएं हैं अब

और तब देखना चाहूँगा
बाजार में पड़े वस्तुओं की लिजलिजी स्थिति !!

_______________

16 comments:

सागर said...

dusra paira,

Marhaba

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

प्रेम प्रेम है वस्तु नहीं ..खूबसूरती से लिखी नज़्म

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

aafareen

shikha varshney said...

कहाँ कहाँ तक जाती है आपकी सोच ....

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम और कवितायें भी वस्तु हो जाती हैं यदि जीवंत नहीं रहती हैं।

kshama said...

Sach hai...prem kabhi wastu nahi ho sakti!
Aapki rachana ne Gulazaar ji ka wo mashhoor geet yaad dila diya," Hamne dekhi hai us aankhon ki mahakti khushboo...!"Mana ki,aapka content alag hai,phirbhi...

daanish said...

प्रेम .. और कविता
वस्तुएं हैं .....
... ......... .... ...... ..... !!
बाज़ार
और बाज़ारवाद के परिणाम को
सही ढंग से परिभाषित करते हुए
सटीक शब्द .....
एक...प्रभावशाली कविता .
अभिवादन स्वीकारें .

mukti said...

काश उन आवाजों को भष्म किया जा सकता, जो ये कहती हैं कि प्रेम और कविताएँ वस्तुएँ हैं.

वन्दना said...

हमेशा की तरह गहन बेहद गहन्……………दिल को छूने की काबिलियत है ।
नव वर्ष मंगलमय हो।

pukhraaj said...

प्रेम और कवितायें वस्तुएं बन गयी हैं और हमने वस्तुओं से प्यार करना सीख लिया है .,..

pukhraaj said...

WISH YOU A VERY VERY HAPPY NEW YEAR 2011 ...

सुशीला पुरी said...

आपकी व्यंजना ने अभिभूत किया ! हार्दिक बधाई !

डिम्पल मल्होत्रा said...

हर व्यक्ति की तरह चीजों की भी एक उम्र होती है पर कविताएँ इनसब से परे की चीज़ है.उन्हें कभी न कभी पढ़ा ही जायेगा.

अपूर्व said...

प्रेम का इन बाजारी मापदंडों पर काव्यात्मक ’इवैल्युएशन’ काफ़ी सोचने पर विवश करता जान पड़ता है..पैकेजिंग के दौर मे जहाँ हर चीज की परिभाषा मे बाजारी आंकड़े शामिल होते हैं..वहाँ प्रेम की यह निस्पृहता आपकी कविता मे भली लगती है..और उम्मीद जगाती भी....बशर्ते कविता मे आशावाद कायम रहे..

Kavita Prasad said...

सच कहा है अपने ॐजी , प्रेम और कविता कभी वस्तुयें नहीं हो सकते... यह सिर्फ एहसास हैं. एक जीवित होने का और दूसरा अपने आप को जीवन-माला में जोड़ने का!

बधाई!